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Thursday, March 27, 2008

रंगमंच



तुम हो या नही
हो भी तो कहाँ हो??
देख रही हूँ बिटर -बिटर
तेरी पत्थर की मूरत को
तेरे दर्शन की यह प्यासी आँखे
थंक गयीं है अब पंथ निहार के
क्या सच में अपनाओगे मुझे??
और हैं न ऐसे ही
कई अनसुलझे से सवाल......
या मीरा सी मैं यूं ही
एक आस पर ....
बस यूं ही जीती जाऊँगी
दर्शनों की इन प्यासी आंखो को
आंसुओं में डुबोती जाऊँगी
और कर दूंगी ....
अपने जीवन का अंत यूं ही
किसी दुखद नाटक के अंत सा
बंद पलकों में समेटे बस तेरी मूरत को
तेरे नाम को दिल में चुपचाप ले के
इस दुनिया के रंगमंच से जुदा हो जाऊँगी !!

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29 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

कई अनसुलझे से सवाल......
या मीरा सी मैं यूं ही
एक आस पर ....
बस यूं ही जीती जाऊँगी
दर्शनों की इन प्यासी आंखो को
आंसुओं में डुबोती जाऊँगी
और कर दूंगी ....
अपने जीवन का अंत यूं ही
"क्या कहूँ . एक विरह वेदना का अत्यन्त ही मार्मिक चित्रण, ये पंक्तीयाँ दिल को छु गई, "

Harihar का कहना है कि -

देख रही हूँ बिटर -बिटर
तेरी पत्थर की मूरत को
तेरे दर्शन की यह प्यासी आँखे
थंक गयीं है अब पंथ निहार के
क्या सच में अपनाओगे मुझे??

वियोग रस की बहुत सुन्दर रचना

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

प्रभु से सहज प्रश्न,
मन कि बात करना .....मीरा कि तरह जीना
काफी ह्रदयस्पर्शी है

masoomshayer का कहना है कि -

meera ban gaee ho to jane ka prhan nahee to krishn ko khud emn kyon khoj rahee ho tum krishn men ho kavita ati sundar

Anil

डाॅ रामजी गिरि का कहना है कि -

"या मीरा सी मैं यूं ही
एक आस पर ....
बस यूं ही जीती जाऊँगी"

मीरा के विरह को नए आयाम दिया है आपकी रचना ने..

मीनाक्षी का कहना है कि -

आपकी रचना ने बरसों से उलझे सवाल को सुलझा दिया.....दिल में बसे हैं, पलकों में बन्द मूरत है तो फिर दर्शन कैसे....? ऐसी प्रीत के साथ अंत भी सुखद होता है.

तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -

वियोग में बहुत अच्छी कविता लिखी है रंजना जी। प्रेम पर आपने बहुत सी रचनायें लिखी हैं और इस बार प्रेम वियोग।बहुत उम्दा। बस मुझे इस कविता का शीर्षक इससे मिलता जुलता नहीं लगा। आपका क्या ख्याल है?

loke का कहना है कि -

gr8 ranju ji kaafi dino ke baad aapki kavita padi or itni achi kavita padne ko mili sach bhut sunder hai

Anonymous का कहना है कि -

बहुत गहन और मार्मिक रचना है ,उधाहरण जो है मीरा का प्रभु प्रति विरह भाव विभोर करता है बहुत सुंदर रचना है

anuradha srivastav का कहना है कि -

विरह भाव की तीव्रता संवेदित करती है।

RAVI KANT का कहना है कि -

आह! बस चंद आँसू और! फ़िर इन आँसूओं से धुलकर नयन स्वच्छ हो जाएँगे और स्र्वत्र उसी प्यारे के दर्शन होंगे।

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

आपकी रचना , चित्र के साथ अर्थ पूर्ण हो रही है |
अच्छा लिखा है |

अवनीश तिवारी

Sanjeet Tripathi का कहना है कि -

:)

Mukesh Garg का कहना है कि -

bahut sunder . subhkamnaye

शोभा का कहना है कि -

रंजू जी
रचना सुन्दर है और लौकिक में अलौकिक की छवि अति सुन्दर झलक रही है। बधाई स्वीकारें

anju का कहना है कि -

अति सुंदर
देख रही हूँ बिटर -बिटर
तेरी पत्थर की मूरत को
तेरे दर्शन की यह प्यासी आँखे
थंक गयीं है अब पंथ निहार के
क्या सच में अपनाओगे मुझे

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

रचना में आध्यात्मिक अहसास है। "बिटर बिटर" का प्रयोग अच्छा बन पडा है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Anonymous का कहना है कि -

बधाई रंजू जी , सुंदर रचना है, पर ना जाने क्यों अधूरी सी लगती है, क्या आप इसकी दूसरी कड़ी भी लिखेंगी ?
पूजा अनिल

Unknown का कहना है कि -

रंजना जी

अनुराग कब आसक्ति के रास्ते होते हुये पारलौकिक पथ की और उन्मुख कर देता है पता ही नहीं चलता ... और फ़िर रचनाकार तो वैसे भी चिर वियोग का आवाहन ही करते हैं. संयोग तो बहुधा काव्य का अंत लाता है ...... और कान्हा की भक्ति से अधिक तो प्रेम रस हो ही नहीं सकता .... शुभकामनाएं आपकी रचनाओं के नये मोड़ की .....

vivek "Ulloo"Pandey का कहना है कि -

रति प्रेम अऔर् वियोग का कितना मनमोहक वरदन किया है बहुत ही अच्छा प्रयाश है

"राज" का कहना है कि -

इस दुनिया के रंगमंच से जुदा हो जाऊँगी !

बहुत खूब रंजना जी.....
********
थंक गयीं है अब पंथ निहार के
क्या सच में अपनाओगे मुझे??
और हैं न ऐसे ही
कई अनसुलझे से सवाल......
या मीरा सी मैं यूं ही
एक आस पर ....
बस यूं ही जीती जाऊँगी
**************

आपकी लेखन कला का ज़वाब नही..

विश्व दीपक का कहना है कि -

रंजू जी , यह रचना सगुण है या निर्गुण? मतलब कि प्रियतम सचमुच में कोई प्रियतम हीं है या भगवान हैं या अपनी हीं जिंदगी। वैसे हर एक अर्थ में रचना सफल है।
शिल्प में मुझे लगा कि कुछ और अच्छा हो सकता था। आप शब्दों का और भी बढिया और सुगढ प्रयोग कर सकती थीं। वैसे यह मेरा मंतव्य है :)

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

seema sachdeva का कहना है कि -

मन को छू गयी आपकी कविता |अच्छी रचना के लिए बधाई ....सीमा सचदेव

सरस्वती प्रसाद का कहना है कि -

यह प्रश्न.......जाने कब से
पर हैं प्रभु तुमसे
.......तुम्हारी क्रीडा का जवाब नहीं
मरहम वहाँ लगते हो
जहाँ घाव नहीं
.........मीरा की प्रतीक्षा-मर्मस्पर्शी

GIRISH JOSHI का कहना है कि -

तुम हो या नही
हो भी तो कहाँ हो??
कण कण में बसे हो मगर सिर्फ कहने के लिए| भकत कि वेदना चिरंतर है|

देख रही हूँ ..........
.....क्या सच में अपनाओगे मुझे??
भक्ति के पथ पे या प्रेम के पथ पर चलना कितना विकट है|

और कर दूंगी ....
अपने जीवन का अंत यूं ही
किसी दुखद नाटक के अंत सा
मगर भकत भी जब जिद पर उतर आता है तो प्रभु को भी आना ही पड़ता है|

...........इस दुनिया के रंगमंच से जुदा हो जाऊँगी !!
काव्य के भाव कि चरम सीमा|

प्रेम लक्षणा भक्ति कि बात हो तो मीरा सा सहज इस भाव को और कौन व्यक्त कर शकता है| रंजू जी ने भी मिराभाव के सहारे, अपने मन कि भावनाओ को बड़े सुंदर एवं सुचारू रूप से वाचा दी है| रंजू जी को भाव में और सूक्ष्मता लाने कि जरुरत है|
गिरीश जोशी

kavita malaiya का कहना है कि -

मीरा ने पाया था अपने सावरे से श्याम को ..रख विश्वास अरे पगली , भक्तों के आंसू में गर न मुस्कायेंगे फिर भगवान् शरण कहाँ पाएंगे???..विश्वास है तो भगवान् को भी होना ही होगा ..प्रेम है तोह निर्गुण को रूप धरना ही होगा...
kavita malaiya

Unknown का कहना है कि -

वे प्रभु आपको अवश्य दर्शन देंगे या हो सकता है आप उनसे मिल भी चुकीं हों, क्यूं कि वे हमेशा हमारे पास उसी रूप में नही आते जिसमें हम उन्हें देखना चाहते हैं । सुंदर भावों को दर्शाती सुंदर कविता पर दुखांत नही सुखांत होना चाहिये ।

devanshukashyap का कहना है कि -

तेरे नाम को दिल में चुपचाप ले के
इस दुनिया के रंगमंच से जुदा हो जाऊँगी !!


Sunder Rachna

Mohinder56 का कहना है कि -

रंजना जी,

जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही प्रेम के भी.. आप की कविता पढ कर एक गाना याद आ गया...

इक राधा, इक मीरा
दोनों ने श्याम को चाहा
अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो
इक प्रेम दीवानी.. इक दरस दीवानी

जिसके साथ प्यार की यादें हों या दर्द हों वह अकेला कैसे होगा :)

सुन्दर कविता के लिये बधाई

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