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Friday, March 07, 2008

बेकार की बला !!


एक पंखुड़ी का आलिंगन करती
भारी भरकम काया
लो चील ने फैला दिये अपने डैने
मंडराया अंधियारे का साया

निर्दयी सांपों की तरह घेरते
तमाशबिनों का नाच
रोती चिल्लाती लज्जा से
दरिंदे पाते आंच

खिलखिलाहट करती प्रेतात्मायें अब
मौत का इश्तिहार टांगती
जीती जागती लाश से
उसके लहू-मांस का हिसाब मांगती

चोंट के निशान से क्षतविक्षत शरीर
अंधियारे ढंक रहे घाव
तरस खाकर दुर्गन्ध करती
शरीफ नजरो से बचाव

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)

- हरिहर झा

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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

dr minoo का कहना है कि -

खिलखिलाहट करती प्रेतात्मायें अब
मौत का इश्तिहार टांगती
जीती जागती लाश से
उसके लहू-मांस का हिसाब मांगती.....waah harihar ji...bahut khoob...

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

रचना मेरे लिए नवीन लगी |
सुंदर...

अवनीश तिवारी

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)

हरिहर जी, आपकी रचना गहरी चोट करने में सक्षम है। बहुत सशक्त बिम्बों के माध्यम से कही गयी बेहद गंभीर रचना...


*** राजीव रंजन प्रसाद

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

हरिहर जी,

एक पंखुड़ी का आलिंगन करती
भारी भरकम काया
लो चील ने फैला दिये अपने डैने
मंडराया अंधियारे का साया

निर्दयी सांपों की तरह घेरते
तमाशबिनों का नाच
रोती चिल्लाती लज्जा से
दरिंदे पाते आंच

बड़ा ही वीभत्स चित्रण है आपकी रचना में

seema gupta का कहना है कि -

चोंट के निशान से क्षतविक्षत शरीर
अंधियारे ढंक रहे घाव
तरस खाकर दुर्गन्ध करती
शरीफ नजरो से बचाव

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)
" सही कहा , इन्सानीयत का बहुत मार्मिक और विचित्र चित्रण , कोई किसी की बला लेने को तैयार नही, "
Regards

anju का कहना है कि -

बहुत खूब हरिहर जी ,

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)
अतिसुन्दर

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

हरिहर जी,
सशक्त बिम्बों का प्रतिबिम्ब लिये हुए ह्रदयेभेदी रचना है

खिलखिलाहट करती प्रेतात्मायें अब
मौत का इश्तिहार टांगती
जीती जागती लाश से
उसके लहू-मांस का हिसाब मांगती.....

इन पंक्तियो ने दिल को झंकझो्र दिया है बधाई हो

रंजू का कहना है कि -

खिलखिलाहट करती प्रेतात्मायें अब
मौत का इश्तिहार टांगती
जीती जागती लाश से
उसके लहू-मांस का हिसाब मांगती

एक सच को बयान करती है आपकी यह रचना अच्छा लगा इसको पढ़ना हरिहर जी !!

sahil का कहना है कि -

सच्चाई को मुखरता से उभर है आपने
आलोक सिंह "साहिल"

सजीव सारथी का कहना है कि -

मर्म को भेदती कविता हरिहर जी ....

tanha kavi का कहना है कि -

बेहतरीन रचना है हरिहर जी।

एक-एक बिंब मर्मस्पर्शी है।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

mehek का कहना है कि -

निर्दयी सांपों की तरह घेरते
तमाशबिनों का नाच
रोती चिल्लाती लज्जा से
दरिंदे पाते आंच
बहुत खूब

EKLAVYA का कहना है कि -

मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)
वाकई में वर्त्तमान स्थिति को स्पष्ट रूप में प्रदर्शित करने का प्रयाश किया है ....

RAVI KANT का कहना है कि -

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)

हरिहर जी, सशक्त रचना।

आलोक शंकर का कहना है कि -

achchi kavita

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