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Friday, March 07, 2008

प्रश्‍नोत्‍तर खंड 4 मेरी बात को सजीव जी ने पकड़ा और उन्‍होंने ये भी जान लिया कि वो पोस्‍ट लगाने के पीछे मेरा क्‍या कारण था ।


सबसे पहले तो मैं ये कह दूं कि तीन दिन में मैंने कोई भी जवाब क्‍यों नहीं दिया । उसके पीछे भी एक कारण है और वो ये है कि मेरे गुरू कहा करते थे कि आप जब अपनी बात कह चुके हो तो उसके बाद खामोश हो जाओ और दूसरों को प्रतिक्रिया देने दो । अगर आप दूसरों के बोलते समय भी उनको टोक कर आपनी बात को पुन: रखने का प्रयास करोंगें तो उससे एक फिजूल की बहस का जन्‍म होता है कुछ भी सार्थक नहीं निकल पाता है । तो उस हेतु ही मैं दो दिन से विषय पर कुछ नहीं बोला । प्रसन्‍नता है कि लोगों ने अब प्रतिक्रिया दी । और सजीव ने जो कहा मैं जानता हूँ कि आप खिन्न अवश्य हैं पर नाराज़ नही, यह एक wake up call है आपका, मुझे लगता है कि आज के बाद हर रचनाकार अपनी रचना डालने से पहले और भी सतर्क हो जाएगा, वो बिल्‍कुल सही है । मेरा ऐसा मानना है कि ये कविताएं या रचनाएं आप अपनी डायरी में नहीं लिख रहे हैं ये आप सार्वजनिक कर रहे हैं और इसलिये बहुत ध्‍यान रखा जाना जरूरी है । आप पर दुनिया की नज़रें हैं । मान लीजिये किसी ने अचानक ही पहली बार हिन्‍द युग्‍म आगमन किया और पहली बार में ही आपकी वो रचना मिली तो  उसकी नजरों में आपके प्रति और हिन्‍द युग्‍म के प्रति कया भाव जाएगा । अब जबकि हम खुद ही संपादक हैं तो हमारी जिम्‍मेदारी ज्‍यादा होती है कि हमारी संस्‍था का मान बढ़े ।
और माहिन्‍दर जी चूंकि ब्‍लागिंग में एक जाना माना नाम है इसलिये उनकी तो जिम्‍मेदारी ज्‍यादा है । लोग उन पर ज्‍यादा नजर रखते हैं जिनका नाम होता है ।  पूर्व में भी एक स्‍थान पर से बातचीत देखी थी
मोहिन्दर जी,
अब जबकि पंकज सुबीर जी, रदीफ और काफिया के बारे में बता चुके हैं, आपसे काफिये की गलती होना थोड़ा अटपटा-सा लगता है। आप खुद हीं देखें मतले में काफिया "ओ" था( खो , हो)और रदीफ "गया" , अगले दो शेर तक वही रहा, लेकिन आगे जाकर काफिया" आ" हो गया और रदीफ " हो गया" बन गया। बहर के बारे में नहीं बता पाऊँग क्योंकि गुरूजी अभी तक वहाँ नहीं पहुँचे हैं। आप जैसे वरिष्ठ रचनाकार से ऎसी गलती की उम्मीद नहीं रहती है। कृप्या आगे से ध्यान देंगे।
भाव अच्छे हैं लेकिन शिल्प के दोष ने थोड़ा गड़बड़ कर दिया है।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
मोहिन्दर कुमार तन्हा जी,
मैं भी सोच रहा हूं कि गजल लिखना छोड दूं.. कौन रदीफ़, काफ़िये, मक्ते, मतले और तक्खलुस के चक्कर में पडे...
अपुन ठहरे देसी आदमी... मक्खन निकालने भर से काम है... चाहे मधानी टेडी चले या सीधी.
रदीफ़ और काफ़िया फ़िट करने के चक्कर में अपनी गजल आऊट हो जाती है :)मोहिन्दर जी,
-विश्व दीपक 'तन्हा'  लगता है कि आप मेरी बातों का बुरा मान गए। मेरे कहने का यह मतलब नहीं था कि आप लिखना छोड़ दें। अगर आप यह मतलब निकालेंगे तो आगे से मैं ऎसी टिप्पणियाँ नहीं लिखूँगा और बाकी मित्रों की तरह हीं अच्छा और बहुत खूब कहकर निकल जाऊँगा। अब आप जैसा सोचें।

एक बात जो मैं कहना चाहता हूं कि अगर आप चीते को ये कह कर बिल्‍ली कहेंगें कि मैं तो इसको बिल्‍ली कह कर प्रस्‍तुत कर रहा हूं तो उससे चीता बिल्‍ली हो नहीं जाएगा वो चीता ही रहेगा । कई लोगों ने कहा है कि मोहिन्‍दर जी ने उसे कविता कह कर प्रस्‍तुत किया है ग़ज़ल कह कर नहीं तो मेरा कहना वही है कि फार्मेट तय करता है हम नहीं । मोहिन्‍दर जी की रचना पूरी तरह से ग़ज़ल के फार्मेट पर ही है तो उनके कहने भर से वो ग़ज़ल ना हो तो ये तो बात वही हो गई कि ये चीता नहीं है ये तो बिल्‍ली है क्‍योंकि हम कह रहे हैं । फिर भी मेरा कहना है कि मेरी बात को सजीव जी ने सटीक पकड़ा है मेरा वही कहना है कि जब कोई संपादक नहीं है हम खुद ही संपादक हैं तो हमें ज्‍यादा ध्‍यान रखना है । मेरा इरादा किसी को नीचा दिखाने का नहीं है । जब हम कक्षा में होते हैं तो हमको जो डांट पड़ती है उसका एक ही उद्देश्‍य होता है हमारा सुधार । कोई भी डांट किसी मास्‍टर का भला नहीं करती बुरा जरूर करती है कि उस छात्र के मन में मास्‍टर के प्रति खटास आ जाती है ।

SURINDER RATTI का कहना है कि - पंकज जी, यह तो दिख रहा है दांव और आसान काफिया नहीं मिल रहे इस रचना में रदीफ़ मोहिंदर जी ने मिला दी है, मोहिंदर इस रचना को ग़ज़ल मानते है तो काफिया ग़लत है, अगर वो इस रचना को एक साधारण रचना की तरह लेते हैं तो चलेगा, हाँ ये हो सकता है मोहिंदर जी ने ये रचना पहले लिखी हो और वह ध्यान न दे पाए हों मैं उनका बचाव नहीं कर रहा, पंकज जी आपने जो कार्य शुरू किया है वह जारी रखें, खिन्न होने की बात नहीं है, आपने जो सिखाया उसके लिए धन्यवाद.

उत्‍तर :- रचना ईश्‍वर का उपहार होती है उसे साधारण कहना सरस्‍वती का अपमान होता है । भाग्‍यवान होते हैं वे लोग जिनको सरस्‍वती शब्‍दों का उपहार देती है । हम उनमें हैं तो हमें सावधानी तो रखनी ही होगी ।

तपन शर्मा का कहना है कि - अभी अभी हिन्दयुग्म खोला तो पंकज जी की निराशा को पढ़ा। और फिर जब मोहिन्दर जी की रचना को पढ़ा तो लगा कि हाँ, पंकज जी की नाराजगी सही है। काफिये के नियमों का सीधा उल्लंघन है। पर पंकज जी, पाठकों की परीक्षा तो अब शुरू हुई है। मोहिन्दर जी और पढ़ने वालों से गलती हुई, आपने टोक दिया।सही किया। अब दोबारा अगर गलती होती है तो सजा के हक़दार हैं। पर आपसे निवेदन है कि आप अपनी कक्षायें जारी रखें। यहाँ हम पाठकों को काफिये की प्रेक्टिकल सीख मिल गई है। असली परीक्षा तो प्रेक्टिकल कर के ही होती है। हम फेल हुए पर बार बार नहीं होंगे ये हम पर यकीन रखें। आप युग्म पर पोस्ट हो रहीं गज़लों पर नज़र रखें। आप इनमें सुधार अवश्य देखेंगे। अगली कक्षा का इंतज़ार रहेगा।
धन्यवाद
उत्‍तर :- तपन जी आपकी भावनाएं छू गई हैं मुझे । गलती को मान लेना सुधार की और बढ़ने का पहला कदम होता है । जब हम ग़लतियों को जस्‍टीफाई करने में लग जाते हैं तो वास्‍तव में हम पीछे की और जाने लगते हैं ।
 
मोहिन्दर कुमार का कहना है कि - पंकज जी,
शायद आपने मेरी रचना का लेबल ध्यान से नहीं देखा मैने उसे गजल नहीं कहा है गीत कहा है...
आप मुझे नालायक विद्यार्थी समझ कर जो सीखना चाह रहे हैं उन्हें सीखाना जारी रखें.. एक के लिये सब का नुकसान हो यह ठीक नहीं होगा.
 
उत्‍तर :- मोहिन्‍दर जी मैंने पहले भी कहा है कि आपके तय करने से तय नहीं होगा तय तो फार्मेट करता है । और जहां तक मेरा प्रश्‍न है मैं क्रुद्ध केवल इसलिये हुआ कि जब आपके पास भाव हैं शब्‍द हैं विचार हैं सब कुछ सरस्‍वती ने दिया है तो एक व्‍याकरण और सीख कर अपने को संपूर्ण करने की दिशा में क्‍यों नहीं बढ़ रहे आप । आप के लिखें में अगर व्‍यकरण दोष हट जाएं तो आप खुद ही देखेंगें कि क्‍या हो गया है । मास्‍टर उस ही स्‍टूडेंट पर खीजता है जिसमें उसको प्रतिभा नजर आती है क्‍योंकि प्रतिभावान छात्र से उसे भी उम्‍मीदें होती हैं ।
SURINDER RATTI का कहना है कि - प्रिय कवि मित्रो, मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूँ, अगर आपको किसी की कोई रचना अच्छी न लगे तो अच्छा हो आप उनको ईमेल कर सूचित करें क्या ग़लत था उस रचना में, यूं तो रचना कार कुछ सोच कर ही कोई लाइन लिखते हैं उसने वह लाइन क्यों लिखी ये तो वो ही जानता है, नए कवियों से गलती हो सकती है पर एक दिन कोई कवि नहीं बन जाता है अनुभव उसे सिखाते हैं, और वो लेखनी में सुधार लाता है, अगर मैंने कुछ ग़लत कहा हो तो क्षमा करे.
 
उत्‍तर :- अगर आपने ये कड़वी बात मुझे इंगित करके लिखी है तो आगे से मैं भी ध्‍यान रखूंगा कि युग्‍म पर लगने वाली कविताओं की शान में लम्‍बे लम्‍बे कसीदे पढ़ कर आगे बढ़ लूं ।
Kavi Kulwant का कहना है कि - Pankaj Ji is doing very good and appreciable job. His anger is also justified but rachnakar has not posted his poem as a Gazal.
उत्‍तर :- धन्‍यवाद मगर आपकी बात का उत्‍तर ऊपर आ चुका है ।
seema gupta का कहना है कि - पंकज जी मैं ये नही कहना चाहती की आपका कहना सही नही है, आप अपनी जगह सही हैं . मगर हाँ ये जरुर कहूंगी की मैं एक बहुत ही साधारण सी पाठक हूँ जिसको इन सब बातों का ज्ञान नही है, और एक साधारण सी रचना पढ़ कर भी मुझे बहुत अच्छा लगता है. जो दोष और कमियां आप देख सकतें हैं वो मैं कदापि नही देख सकती. आप की नाराजगी जायज है, मगर गुरु तो हमेशा गुरु होता है ना . आप अपना कार्य जारी रखें और हम भी कोशिश करेंगे की आप से सीख सकें.
उत्‍तर :- सीमा जी गुरू को कभी उन बातों पर नाराजगी नहीं आती जो बातें अभी उसने सिखाई नहीं हैं बल्कि उन पर आती है जो पाठ कक्षा में चल रहे हैं और उन पर ही छात्र गलती कर रहे हैं । मैं यहां हूं और ईश्‍वर ने जीवित रखा तो सभीको ग़ज़ल का उस्‍ताद बनाकर ही जाऊंगा पर कम से कम मेरा साथ तो दें ।
भोजवानी का कहना है कि - कबीर सा रा रा रा रा रा रा रा रारारारारारारारा
जोगी जी रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा री
उत्‍तर :- .............................
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि - गुरूजी,
मुझे भी यही लगा और मैंने यह शंका जताई भी है |
मोहिंदर जी जैसे किसी शख्स से ऐसा होना नही जंचा | :(
लेकिन ऐसी कोई कक्षा नही जन्हा गलती ना हो |
ऐसी ही सीखा जायेगा | गलती सुधर जायेंगी |
अवनीश तिवारी
उत्‍तर :- सुधार तों मैं भी चाहता हूं और उसीके लिये तो यहां हूं । आपकी बात मुझे अच्‍छी लगी कि मोहिन्‍दर जी जैसे शख्‍स से ऐसी गलती नहीं होनी चाहिये क्‍योंकि वे एक जाना माना नाम हैं ।
राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि - पंकज जी,
आपकी खिन्नता और उदासी समझी जा सकती है किंतु आपको हिन्द युग्म का मंच विश्वास अवश्य दिला सकता है कि आपकी कक्षायें वृथा नहीं जा रहीं। मोहिन्दर जी का स्पष्टीकरण पर्याप्त है।
आपकी कक्षाओं का ही असर है कि अपनी प्रकाशित करने के लिये लगभग तैयार पुस्तक से मैने अपनी सारी गज़ले हटा लीं है। जब तक उन्में यथोचित तत्वों का समावेश नहीं होगा, प्रकाशित नहीं करूंगा। आपकी कक्षाओं के कारण ही मैने अपनी कोई भी नयी गज़ल हिन्द-युग्म पर प्रकाशित भी नहीं की है...आपके सिखाये जाने को पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है। कृपया खिन्न न हों...
*** राजीव रंजन प्रसाद
उत्‍तर :- राजीव जी मैं नहीं जानता कि सरस्‍वती ने मुझे हिन्‍द युग्‍म से क्‍यों जोड़ा है पर ये तो जानता हूं कि उसकी इच्‍छा है तो फिर कुछ सोच कर ही उसने मुझे यहां भेजा है । जब सरस्‍वती का आदेश है तो फिर तो मुझे गम्‍भीरता से काम करना हे और आप चिन्‍ता न करें अभी भले आप ग़ज़ल नहीं लगा पा रहे हैं पर आने वाले समय में आप स्‍वयं उस्‍ताद होंगें ।
tanha kavi का कहना है कि - पंकज जी,
आपकी नाराज़गी जायज है। पर, छात्रों से भूल तो हो हीं जाती है। अब देखिए तो आपकी नाराज़गी को जानकर मोहिन्दर जी ने अपनी गज़ल के शुरू के दो शेर बदल दिए हैं। मेरे विचार से अब , रदीफ और काफिया दुरूस्त हो गया है। आप ऎसा न सोचें कि छात्र सीखना नहीं चाह रहे। आपने डाँट पिला दी ना। देखिए इसका असर कितना जल्द हुआ। इसलिए आप खिन्न न हों।

उत्‍तर :- ग़लती को सुधार लेना और उसको मान लेना ये स्‍वयं अपने पर किया हुआ हमारा सबसे बड़ा उपकार होता है ।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि - गुरु जी की नाराजगी को ध्यान रखते हुये मैने अपनी रचना की पहली दो पंक्तियों में परिवर्तन किया है... साथ ही अब लेवल गीत से बदल कर गजल कर दिया है....... पता नहीं कितने प्रतिशत गजल बनी है... गुरु जी ही बता सकते हैं

उत्‍तर :- मोहिन्‍दर जी आपको मैंने पहले भी लिखा है कि आप में संभावनाएं हैं । और मैं यहां पर चिन्‍गारियों को शोले बनाने आया हूं । आप भी अपनी संभवनाएं पहचानिये और सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ करें । ग़ज़ल में कोई मां के पेट से सीख कर नहीं आता पर शब्‍द विन्‍यास से ज्ञात हो जाता है कि प्रतिभा तो है बस तराशे जाने की ज्‍रूरत है ।

anju का कहना है कि - पंकज जी आप की निराशा जायज है किंतु गुरु अगर शिष्य से ऐसे रूठ जाए तो अच्छा नही होगा
हम चाहेंगे की आप अपनी कक्षा जारी रखे , शिष्य तो गलती करता है मगर गुरु सुधार देता है
यह गलती आम गलती थी किंतु आप निराश न होए आप अपनी कक्षा दे हम ध्यान से और लगन से सीखेंगे
दुःख है की आप निराश हुए
आगे आपको निराशा नही होगी
 
उत्‍तर :- नाराज होने का अर्थ छोड़ना नहीं होता है आगे परीक्षाओं में तो आप सबकी भी ऐसी ही डंटाई होनी है अभी तो बेचारे मोहिन्‍दर जी अकेले ही फंस गए ।
mehek का कहना है कि - गुरूजी आप सिखाना जरी रखे ,हम भी सीम्स जी की भाति
साधारण से कविता को अच्छा जन लेते है ,कोई नुक्स दिखता ही नही ,अभी तो ग़ज़ल समझना शुरुवात है हमारी ,धीरे धीरे ही सीखेंगे ,कुछ छात्रों को बार बार एक ही चीज़ बतानी होती है ,तब जाके सीखते है ,हम भी उन में से है
उत्‍तर :- हम अपने लिखे को हमेशा ही अच्‍छा मानकर चलते हैं पर जाने लें कि कलाकार, रचनाकार का अपना मूल्‍यांकन मायने नहीं रखता क्‍योंकि मूल्‍यांकन तो पढ़ने वालों को करना होता है ।
बरबाद देहलवी का कहना है कि - पंकज जी आप निराश न हों आपकी मेहनत जरूर सफ़ल होगी आप हुमें युं ही सिखाते रहियेगा गज़ल लिख्नना सरल कार्य नहीं है धीरे धीरे हम सीख जायेंगे
और आप्को यकीन दिलाते है एक दिन एक बेहतरीन गज़ल आपके सामने होगी
मोहंदेर जी आपने अपनी रचना मे जो बद्लाव किया है वाकई काबिल-ए-तारीफ़ है आपकी गज़ल मे जान आ गयी ह

उत्‍तर :- चलिये आपके कहे पर भरोसा कर लेते हैं वैसे मैंने भी मोहिन्‍दर जी की ग़ज़ल को देखा है अब वो बेहतर है । अब वहां काफिये का दोष नहीं है पर हां बहुवचन एकवचन का है तो वो तो मैंने अभी कक्षा में बताया नहीं है अत: वो माफ है ।

अजय यादव का कहना है कि - पंकज जी! आपकी नाराज़गी जायज़ है, परंतु किसी छात्र के एक गलती कर देने भर से गुरु का कक्षा ही छोड़ देने का विचार कुछ समझ नहीं आता. और फिर मोहिन्दर जी ने पूरी विनम्रता से अपनी गलती मानकर अपेक्षित सुधार का प्रयास भी किया है.
इसके अलावा एक बात मैं यहाँ रचनाओं के संपादन के बारे में और कहना चाहूँगा. यद्यपि इस संदर्भ में अधिक व आधिकारिक जानकारी तो नियंत्रक महॊदय ही दे सकते हैं परंतु हिन्द-युग्म के विषय में जहाँ तक मैं जानता हूँ, यहाँ प्रकाशित प्रत्येक रचना को संपादित करने का दायित्व स्वयं रचनाकार का ही होता है. कोई अन्य संपादक विशेष इस काम को नहीं करता.
आपकी अगली कक्षा का मुंतज़िर

उत्‍तर :- नाराज होने का अधिकार सिखाने वाले को होता है और सीखने वालों को अधिकार होता है कि वो बलपूर्वक उसे रोक लें पर आपने तो बलपूर्वक नहीं बल्कि सनेह पूर्वक रोकने का प्रयास किया है ।

सजीव सारथी का कहना है कि -

पंकज जी, मैं जानता हूँ कि आप खिन्न अवश्य हैं पर नाराज़ नही, यह एक wake up call है आपका, मुझे लगता है कि आज के बाद हर रचनाकार अपनी रचना डालने से पहले और भी सतर्क हो जाएगा, यही तो फायदा है एक अच्छे गुरु का दूसरे छोर पर होने का, जैसा कि अजय जी ने कहा, कि यहाँ रचना कार ख़ुद अपनी रचना के लिए जिम्मेदार है और यही वो खूबी है जो युग्म, को दूसरों से अलग करता है, और यकीन मानिये पंकज जी यहाँ हर कोई इस जिम्मेदारी को बखूबी समझता है, मोहिंदर जी जिस विनर्मता का परिचय दिया, वो आपके सामने है, और फ़िर आप जो भी सिखा रहे हैं उनका असर होने में थोड़ा सा समय तो लगेगा गुरूजी, रातों रात हम बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, ....... नए परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है......

उत्‍तर :- मैं पहले ही कह चुका हूं कि आपने मुझे सटीक पकड़ लिया है । मैं चूंकि हिन्‍द युग्‍म परिवार का सदस्‍य हूं अत: मेरी भी इच्‍छा है कि परिवार के हर सदस्‍य को परिवार की प्रतिष्‍ठा ध्‍यान रहे ।

hemjyotsana का कहना है कि - गुरू जी आप कक्षा जारी रखिये और इम्तहान की तिथी बताईये ।
देखिये आपकी कक्षा के कारण हमने एक गज़ल लिखी हैं जो काफ़िये के नियम का पालन कर रही है ।
बहर का पता नहीं ।
उदास रात की कोई सुबह हसीन नहीं ।
नहीं आँसमां मेरा ,मॆरी कहीं ज़मीन नहीं ।
मैं खूशबू बन के हवा में नहीं बसती ,
मैं कोई किरणों की तरह भी महीन नहीं ।
मुझे ख्वाबों में मत तराश अभी ,
उडती तितली की तरह, मैं कोई रंगीन नहीं ।
दफ़न कर या जला दे अब मुझको ,
ज़िस्म में रूह नहीं ,अब कोई तौहीन नहीं ।
बुझ गया ये “दीप” ,सुबह के सितारे के लिये ,
खुश हूँ मिट कर भी , मैं कोई गमगीन नहीं ।
२ शेर और भी हैं । जो आप को हमारे ब्लोग पर मिलेगे ।
अब तो गुरू जी आप मानेगे के हम पढ रहे है और उपयोग भी कर रहें हैं ।
आप की प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा साथ ही हम समझे जायेगे के आप नराज़ भी नहीं है हम से

उत्‍तर :- काफिया तो ठीक है बहर की समस्‍या है वो भी आने वाले समय में हम दूर करना सीख ही लेंगें । आपने काफिया जमाना सीख लिया है उसके लिये बधाई ।

DR.ANURAG ARYA का कहना है कि - नही नही निराश न होए सच जानिए हम जैसे बहुत से पाठक है जो सचमुच अपने पुराने लिखे मे गलतियों को दुरस्त कर रहे है.ओर कुछ चीजे ऐसी है जिन्हें जानना ओर समझना बेहद जरूरी है ,वैसे भी लोग आलोचना तो कर देते है पर explain नही करते की क्यों आलोचना की है .वैसे भी लेखक ने गजल कहकर यहाँ पोस्ट नही की है........सच जानिए लोग आपको पढ़ रहे है.......आप जरी रहिये

 
उत्‍त्‍र :- डाक्‍टर आपको कोई सब्‍जी वाला गोभी मांगने पर आलू दे और ये कहे कि मैं कह रहा हूं इसलिये ये आलू हैं तो क्‍या आप मान जाएंगें और ले लेंगें ।
RAVI KANT का कहना है कि - गुरुजी..इतनी बड़ी सजा तो न दीजिए। आप का खिन्न होना समझ में आता है लेकिन आपकी डाँट का असर तो आप देख ही चुके ऐसे में उम्मीद है कि हमें निराश नहीं करेंगे।उत्‍तर :- चलिये आपकी बात मान लेते हैं और हम मिलते हैं अगले मंगलवार को अगली कक्षा में । सभी का आभार और ये भी कि जिस तरह से यहां पर पोस्‍ट लगाईं हैं उसी तरह से कक्षाओं में भी लगाएं ताकि मुझे लगे कि आप वहां भी आते हैं ।

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

पंकज जी,

यह जान कर प्रसंता हुई कि आपकी नाराजगी कुछ हद तक दूर हुई... कोशिश रहेगी कि आगे से आप को नाराज न करूं.. आप कक्षा जारी रखें.

anju का कहना है कि -

इस गलती से हमसब ने यह सबक तो लिया है की आगे से धयान से लिखेंगे प्रकाशित करने से पहले उसे १० बार पदेंगे सोचेंगे
मार्गदर्शन करने के लिए पंकज जी आपका बहुत आभार

AMIT ARUN SAHU का कहना है कि -

पंकज सुबीर जी मैं कविता कोष पर दिए हुए एक लिंक के सहारे आप तक पहुच गया और अब तक के सरे पाठ पढ़ डाले / आपके चरणों मी मेरा प्रणाम स्वीकार करे / मैं आप जैसे लोगो का बहुत कायल हू जो हिन्दी की इतनी सेवा करते है / मैं भी आज से आपका शिष्य हू / आपसे विनम्र निवेदन है कि mujhe अपना शिष्य स्वीकारे/ आपका : अमित अरुण साहू वर्धा महाराष्ट्र
८.३.०८. २.१० पम

AMIT ARUN SAHU का कहना है कि -

गुरूजी मैंने पढ़ा की ग़ज़ल के हर शेर मी कुछ अलग बात होती है / याने ग़ज़ल बहता पानी है जो कही भी निकल सकता है / प्रेमिका से शुरू होकर ग़ज़ल देश पर भी ख़त्म हो सकती है / क्या मैं सही हू ? ग़ज़ल के मतले मे काफिया मिलना चाहिए / फिर वही काफिया अंत तक चलना चाहिए/ यदि इसी विधा को अपनाकर दो - दो पंक्तियों के शेर एक ही टॉपिक पर कहे जाए , मसलन माँ पर , तो क्या उसे ग़ज़ल कहेगे ? समाधान चाहुगा / आशा है जवाब मिलेगा. आपका : अमित अरुण साहू वर्धा

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