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Friday, January 11, 2008

आकाश की ओर


हरिहर झा हिन्द-युग्म के प्रवासी पाठकों में बहुत पहले से जुड़ने वाले व्यक्ति हैं। हमारी हर गतिविधि में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। कई बार इनकी कविताएँ टॉप १० या टॉप २० में स्थान नहीं भी बना पाई हैं, मगर इन्होंने परिणामों को सदैव ही सकारात्मक लिया है। दिसम्बर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इन्होंने भाग लिया और इनकी कविता तीसरा स्थान बनाने में सफल रही।

जन्म- ७ अक्टुबर १९४६
जन्मस्थान- बांसवाडा (राजस्थान)
शिक्षा- उदयपुर विश्वविद्यालय से M.Sc ।
रुचि- हिन्दी व अंग्रेजी में कविता लेखन
विद्यार्थी-जीवन में लेख व कवितायें प्रकाशित करवाने के बाद BARC में कम्प्यूटर की खटर-पटर में ऐसा फंसे कि लेखन ही छूट गया। धन्यवाद हो अनुभूति की संपादिका पूर्णिमाजी को व मेल्बर्न की साहित्य-संध्या को जिनकी प्रेरणा से लेखन फिर से शुरू हुआ ।
कार्यक्षेत्र- भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के कम्प्यूटर विभाग में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्य करने के पश्चात १९९० से मेलबर्न के मौसम-विभाग में वरिष्ठ सूचना तकनीकी अधिकारी के पद पर।

सरिता में लेख व अनुभूति़, हिन्दीनेस्ट, कृत्य़ा(हिन्दी), कृत्य़ा(अंग्रेजी) , बोलोजी(अंग्रेजी), poetry.com, काव्यालय, हिन्द-युग्म आदि में कवितायें प्रकाशित। टी वी(चेनल-31) व ऑस्ट्रेलिया के रेडियो कार्यक्रमों में कवितायें प्रसारित। इन्टरनेशनल सोसाइटी आफ पायेट्स की सदस्यता ।
ब्लॉग- ( क्रमश: हिन्दी व अंग्रेजी कविताओं का )
http://hariharjhahindi.wordpress.com/
http://hariharjha.wordpress.com/
मुख्य कवितायें:
http://boloji.com/writers/hariharraijha.htm
विवरण:
http://hariharjhahindi.wordpress.com/about-2/
पता: 2, Beilby Street, Moorabbin, Melbourne Australia-3189
पता ( भारत में) : मोतीवाव के सामने, नागरवाड़ा , बांसवाड़ा ( राजस्थान) - ३२७००१

पुरस्कृत कविता- आकाश की ओर

पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |

निर्णायकों की नज़र में-


प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ८॰५, ५॰५, ६॰९
औसत अंक- ६॰९६७
स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ४॰३, ६॰९६७ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰६३३
स्थान- उन्नीसवाँ


तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-महात्वाकांक्षा और उसके साथ आने वाला अकेलापन और अंत में जीवन की त्रासदी और उसकी निस्सारिता के ईर्द-गिर्द घूमती ये कविता कई बार अच्छे बिम्ब बनाती है लेकिन कविता कसावट और यथोचित सघनता में कुछ जगहों पर चूकती है।
मौलिकता: ४/२ कथ्य: ३/१॰५ शिल्प: ३/२
कुल- ५॰५
स्थान- पाँचवाँ


अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
पीडा, मन:स्थिति की मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति। अच्छी रचना।
कला पक्ष: ६॰२/१०
भाव पक्ष: ६॰५/१०
कुल योग: १२॰७/२०


पुरस्कार- ऋषिकेश खोडके 'रूह' की काव्य-पुस्तक 'शब्दयज्ञ' की स्वहस्ताक्षरित प्रति

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
"हरिहर झा जी आपकी कवितायें हिंद युग्म पर बहुत बार पडी , पर आपके बारे मे आज ही जाना और इतनी माहन हस्ती के बारे मे जान कर बडा ही अच्छा लगा. मुझे आपकी कविता कुछ देर से समझ आए , और इन पंक्तियों मे सारा अर्थ समझ आया"
आपको बहुत बहुत बधाई
With Regards

sahil का कहना है कि -

हरिहर जी एक एक पंक्ति इतने सुंदर ढंग से पिरोई गई है इस रचना में की किसी एक पंक्ति को उठाकर उसका बखान करना मुनासिब नहीं.
तीसरे स्थान को प्राप्त करने हेतु, बहुत बहुत साधुवाद
आलोक सिंह "साहिल"

Alpana Verma का कहना है कि -

हरीहर झा जी,तीसरे स्थान को प्राप्त करने हेतु बधाई.
*आप की कविता में भाव जैसे सागर की लहरों की भांति उठते गिरते जा रहे हैं-कभी गहराई में पकड़ आते हैं तो कहीं सतह पर तैरते मिलते हैं.ये शायद उन सभी के दिल के ख्याल होंगे जो आगे बढ़ने की दौड़ में बहुत कुछ पीछे छोड़ जाते हैं और जब रूक कर देखते हैं तो कुछ इसी तरह से कहते होंगे-'' ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
लेकिन फ़िर से व्यस्त हो जाते हैं---क्योंकि
''मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने । ''
*कविता प्रस्तुति सुंदर है.
-भावों का चित्रण बहुत खूब किया गया है.
ऐसा लगता है शायद बहुत से प्रवासियों की मनोगाथा हो.
-मैं हैरान हूँ-कितना कुछ कह गयी है आप की कविता!.

shobha का कहना है कि -

हरिहर जी
क्या खूब लिखा है.
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |

badhayi

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

हरिहर जी,

बहुत ही उत्कृष्ट रचा है आपने..

मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता

सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई..

रंजू का कहना है कि -

तीसरे स्थान की बधाई आपकी हरिहर जी ...बहुत सुंदर लगी आपकी यह रचना !!

mehek का कहना है कि -

badhai ho jha ji,taar par baithi chidiya sa chehchahana chaha,behad achhi lagi ye pankti.

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

हरिहर झा जी,
आपकी कविता पढ़ कर ऐसी अनुभूति हुई जैसे... मै किसी झरने के पास अकेला काफी देर से खडा सोच रहा हूँ. देख रहा हूँ उसका प्रवाह... फिर जो जो ख्याल मेरे मन मै आते है.. वही ख्याल कविता बन कर उभर गए है.. अंत मै हर इंसान प्रकृति के इन सत्यो को अपने ऊपर जोड़ कर देखने की कोशिश करता है और वही आपकी कविता भी कर रही है
" मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु"
आपकी कविता के बारे मै और ये कहना चाहूँगा की
१) आपने प्रकृति को आस पास की चीजों से बहुत अच्छी तरह जोडा है.. जो पाठक को बंधे रखती है जैसे
" निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की"
२) भाव इतने गहरे है.. की मै जितनी बार पढ़ रहा हूँ कुछ नया सा निकल कर आ रहा है
३) ऐसे लगता है.. आसमान छूने की चाह भी है और छोटा होने का हीन भाव भी...
४)थोडी लम्बी है कविता ... भाव गहरे होने की वजह से पाठक उलझ जाता है
पृष्कार लायक तो सचमुच थी कविता... बधाई स्वीकार कीजिए
सादर
शैलेश

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

यह कविता एक बार में बहुत अच्छे से समझ में नहीं आती। शब्दों के मामले में आपको बहुत आम होना पड़ेगा तभी आप आज के लोगों की आवाज़ बन पायेंगे।

vuong का कहना है कि -

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