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Thursday, December 13, 2007

शिवानी सिंह की एक कविता


हिन्द-युग्म पर कभी पाठक के रूप में तो कभी कवयित्री के रूप में शिवानी सिंह दीख ही जाती हैं। इस बार हम उनके भीतर के रचनाकार को आपके समक्ष लेकर उपस्थित हैं। जैसाकि हमने पहले ही दिन बताया था कि इस बार की टॉप १० लिस्ट में ६ कवयित्रियाँ हैं, तो शिवानी सिंह नौवें स्थान की विजेता व टॉप १० की आखिरी कवयित्री हैं।

कवयित्री का प्रसिद्ध नाम शिखा है परन्तु लेखन जगत में यह शिवानी सिंह के नाम से जानी जाती है। इन्होंने दिल्ली विश्वविधालय के मिरांडा हाउस से स्नातक की डिग्री तथा हिन्दू कॉलेज सोनीपत से बी.एड की डिग्री ली है। पढ़ाई के दौरान इनकी रूचि लेखन की और बढ़ी। अपने कॉलेज की वार्षिक पत्रिका मिरांडा मूड्स में इनकी कहानी 'स्मृति' श्रीमती मन्नू भंडारी द्वारा चयनित की गयी व प्रकाशित हुई। हिन्दी काव्य से इन्हें बहुत प्रेम है। अब तक इन्होंने ३५० से अधिक कवितायें लिखी हैं, जिनमें से ९० कविताओं का एक संग्रह 'यादों के बगीचे से' प्रकाशित हुआ है तथा दूसरा संग्रह 'कुछ सपनों की खातिर' प्रकाशनार्थ तैयार है। अपनी इन्हीं रचनाओं से चुन कर इनका एक ग़ज़ल और गीत का एल्बम 'तुम' भी बन कर तैयार हुआ है। इनकी काव्य-पुस्तक तथा म्यूजिक एल्बम अक्तूबर २००३ में दिल्ली के जाने माने अस्पताल राजीव गांधी कैंसर अस्पताल के वार्षिकोत्सव पर रिलीज़ हुआ तथा काफी सराहा गया। इनके बीमार हो जाने के बाद इनके जीवन में एक मोड़ आया और इन्होंने समाज सेवा की राह चुन ली तथा कैंसर सहयोग नामक संस्था से जुड़ गईं ।

पुरस्कृत कविता- सागर की व्याकुलता

सीधा,सपाट,रेतीला मैदान
सामने फैला विशाल सागर ।
दूर से मैंने जब भी देखा
शांत और सूना नज़र आया ।
दिल ने चाहा क्यूँ न
दो पल सागर किनारे गुजारूं ।
हैरान सी रह गयी
उस शांत सागर की बेचैनी
बेताबी और कोलाहल देख कर !।
मैं देख रही थी -
सागर से उठने वाली हर छोटी लहर
कितनी बेचैन है किनारे छूने के लिए ।
लगता है कुछ दर्द सा है लहरों के दिल में ।
बहुत नमकीन है पानी सागर का
मानों आंसू समेट रखे हैं बरसों से ।
लगता है ये लहरें कुछ कहना चाहती हैं ।
बांटना चाहती हैं अपना दर्द इंसानों से।
मगर जब देखती हैं कि आज का इन्सान
खुद डूबा है अपने ही गम में ।
कहाँ वक़्त है कि सुने किसी का दर्द ।
खुद बांटना चाहता है वह अपने गम
सागर की आने वाली लहरों से ।
शायद यही सोच कर सारी लहरें
अपना दर्द छुपा कर दिल में
चल पड़ती हैं फिर पलट कर
वापिस सागर में क्षितिज के पार ।

जजों की दृष्टि-


प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ६॰२, ६॰५
औसत अंक- ६॰३५
स्थान- तेरहवाँ


द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ८, ७॰१५, ५॰२, ६॰३५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰६७५
स्थान- बारहवाँ


तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-अभिव्यक्ति को और सांद्रता की आवश्यकता थी।
मौलिकता: ४/२ कथ्य: ३/२ शिल्प: ३/२
कुल- ६
स्थान- पाँचवाँ


अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कवि अपनी वेदना के साथ सागर के किनारे था या कि केवल एक ओबजर्वर की तरह यह स्पष्ट नहीं हुआ चूंकि जहाँ कविता "आज का इंसान" से जोड़ी जाती है वहाँ से पाठक भ्रमित हो जाता है।
कला पक्ष: ५/१०
भाव पक्ष: ५/१०
कुल योग: १०/२०


पुरस्कार- प्रो॰ अरविन्द चतुर्वेदी की काव्य-पुस्तक 'नक़ाबों के शहर में' की स्वहस्ताक्षरित प्रति

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

लगता है कुछ दर्द सा है लहरों के दिल में ।
बहुत नमकीन है पानी सागर का
मानों आंसू समेट रखे हैं बरसों से ।
लगता है ये लहरें कुछ कहना चाहती हैं ।
बांटना चाहती हैं अपना दर्द इंसानों से।

really heart touching lines.wonderful. congrates.

रंजू का कहना है कि -

कहाँ वक़्त है कि सुने किसी का दर्द ।
खुद बांटना चाहता है वह अपने गम
सागर की आने वाली लहरों से ।
शायद यही सोच कर सारी लहरें
अपना दर्द छुपा कर दिल में
चल पड़ती हैं फिर पलट कर
वापिस सागर में क्षितिज के पार ।


बेहद सुंदर लिखा है आपने शिवानी जी ....बधाई आपको !!

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

शिवानी जी

बहुत नमकीन है पानी सागर का
मानों आंसू समेट रखे हैं बरसों से ।
लगता है ये लहरें कुछ कहना चाहती हैं ।
बांटना चाहती हैं अपना दर्द इंसानों से।

बहुत ही सुन्दर, सागर की तरह ही गहरी रचना..

बहुत बहुत बधाई

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

सागर से उठने वाली हर छोटी लहर
कितनी बेचैन है किनारे छूने के लिए ।
लगता है कुछ दर्द सा है लहरों के दिल में ।
बहुत नमकीन है पानी सागर का
मानों आंसू समेट रखे हैं बरसों से ।

बहुत अच्छी रचना है शिवानी जी, बधाई स्वीकारें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Anish का कहना है कि -

शिवानी सिंह जी,
आपका प्रयास अच्छा है.
और स्पष्ट लिखते रहेंगे ऐसी आसा के साथ -
अवनीश तिवारी

मनीष वंदेमातरम् का कहना है कि -

शिवानी जी!

बहुत ही सुंदर रचना

सागर से उठने वाली हर छोटी लहर
कितनी बेचैन है किनारे छूने के लिए ।
लगता है कुछ दर्द सा है लहरों के दिल में

Alpana Verma का कहना है कि -

शिवानी जी,
आपने बहुत अच्छे तरीके से लहरों का दर्द बयां किया है जो अपना हाल सुनाने आयीं मगर आज के इंसान की बेचारगी को देख कर लौट गयीं -
यही तो होता है कवि का मन हर किसी की भावनाओंको समझ लेता है-
ये पंक्तियाँ ख़ास पसंद आयीं -
'बहुत नमकीन है पानी सागर का
मानों आंसू समेट रखे हैं बरसों से '
अच्छी रचना है -
-पुरस्कार के लिए बधाई-

सजीव सारथी का कहना है कि -

मगर जब देखती हैं कि आज का इन्सान
खुद डूबा है अपने ही गम में ।
कहाँ वक़्त है कि सुने किसी का दर्द ।
खुद बांटना चाहता है वह अपने गम
सागर की आने वाली लहरों से ।
शायद यही सोच कर सारी लहरें
अपना दर्द छुपा कर दिल में
चल पड़ती हैं फिर पलट कर
वापिस सागर में क्षितिज के पार ।
बहुत ही नाज़ुक और बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है शिवानी जी...... समुंदर का किनारा मुझे अक्सर अपनी और आकर्षित करता है, मैं पहरों यूहीं बैठा लहरों से बात करता रहता हूँ.... आज समझा हूँ क्यों ?

sahil का कहना है कि -

शिवानी जी बहुत ही अच्छी कविता लिख डाली है आपने
हालांकि आपकी कविता के बरक्स मेरी बधाई कहीं नहीं टिकती पर फ़िर भी, मेरी शुभकामना स्वीकार करें
आलोक सिंह "साहिल"

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

शिवानी जी मुझे आपकी कविता अच्छी लगी क्यों की
१) बहुत सरल शब्दों का प्रयोग किया है.. अतः आप जो कहना छह रही थी.. वो पाठको तक पहुचाने मै काफी हद तक सफल हुई है
२) अच्छी परिकल्पना एक अच्छे मकसद को ले कर की गयी है.. अतः आप एक अच्छी रचना बनाने मै कामयाब हुई है..
३) कविता थोडा लम्बी होते होते रह गयी.... मसलन.. इस से लम्बी ये कविता बोर हो जाती ...आप ने शायद इस बात का भी ख्याल रखा है

मुझे लगता है
१) दुःख बांटने से कम होते है.. चाहे दूसरा भी कुछ न भी कर पाए.. दुसरे के धीरज रखने के दो बोल भी होसला बढाने मै काम आते है.. चाहे दूसरा भी दुखी क्यों न हो.. हमे एक दुसरे से अपने दुःख और सुख बांटने चाहिए..
आप यहाँ पर शायद उलट कह रही है...
बाकी हर किसी की अपनी सोच है..
सादर
शैलेश

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

शिवानी जी,

सागर की लहरों के आगे-पीछे जाने को आपने बहुत बेहतर तरीके से परिभाषित किया है और साथ ही साथ मनुष्य की मौज़ूदा स्थिति पर व्यंग्य भी किया है।

बहुत-बहुत बधाई।

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