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Wednesday, December 26, 2007

फर्ज..


वर्स हो या प्रोज़ हो
लिखना हमारा रोज़ हो
लेखनी को हर समय
अविराम चलना चाहिए!
तलवार का हो वार या
एटम का कोई वार हो
हर वार का उत्तर उन्हें
हर बार मिलना चाहिए।
हाथों में तेरा हाथ हो
हर क़दम तेरा साथ हो
इंसानियत को सिर्फ तेरा
प्यार मिलना चाहिए।
वसुधैव एक कुटुम्बकम
इस भाव को पूजेंगे हम
संसार रूपी वृक्ष को
फलदार मिलना चाहिए।
ये हवा जो निर्बंध है
इसमें बहुत दुर्गंध है
चलो "राघव" इस हवा का
रुख़ बदलना चाहिए।
लेखनी को हर समय
अविराम चलना चाहिए!

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

राघव जी
भाव बहुत बढ़िया है पर कविता के शब्दों पर भी थोड़ा ध्यान दें ।

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

ये हवा जो निर्बंध है
इसमें बहुत दुर्गंध है
चलो "राघव" इस हवा का
रुख़ बदलना चाहिए।
लेखनी को हर समय
अविराम चलना चाहिए!
--
सुंदर रचना
अवनीश

RAVI KANT का कहना है कि -

राघव जी,
लेखनी को हर समय
अविराम चलना चाहिए!

बहुत सही!!

सजीव सारथी का कहना है कि -

बिल्कुल सही सहमत हूँ राघव जी

Alpana Verma का कहना है कि -

लेखनी को हर समय
अविराम चलना चाहिए!
बिल्कुल सही कहा---कवि की लेखनी को कहाँ आराम?
कविता अच्छी लगी.सरल,सीधी सी कविता है
इस कविता को बच्चे भी आसानी से याद कर सकते हैं.

sahil का कहना है कि -

भुपेंदर जी आपका ये फ़र्ज़ अदयागी का अंदाज बहुत ही प्यारा लगा,
बहुत बहुत साधुवाद
आलोक सिंह "साहिल"

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

राघव जी,

कहते हैं लेखनी तलवार से भी ज्यादा धारदार होती है.. मगर वही लेखने जब पेट भरने के लिये चलती है तो उसकी धार कुन्द हो जाती है..

फ़लसफ़ो से कहां बदलते हैं रुख हवाओं के यारो
खून से मुस्तकबिल लिखे वो तलवार हमको चाहिये

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बिलकुल मज़ा नहीं आया। तुकबंदी का केवल मोह है इस कविता में। कथ्य केन्द्रित तो बिल्कुल भी नहीं है इस कविता का

Ambarish Dwivedi का कहना है कि -

अपने चेहरे को ढक के आदमी
सच को सच न कह कर के आदमी
कब तलक गैर को तकलीफ देगा
खुद की नजरो मे एक दिन गिर जायेगा
आप जैसा जो गर कोई मिल जायेगा

सच मे जिस दिन कोई आप जैसा मिलेगा टू हकीकत सामने आ जायेगी

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