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Thursday, December 20, 2007

कविता का विषय


चलिए १५वीं कविता की बात करते हैं, मतलब प्रतियोगिता के तीसरे दौर में पहुँची अंतिम रचना की चर्चा। इस कविता के रचनाकार हिन्द-युग्म के स्थाई पाठक व प्रतिभागी हैं। पिछले ६ महीनों से लगातार पढ़ रहे हैं और लिख भी रही हैं। सितम्बर माह के यूनिपाठक भी रह चुके हैं। आई. आई. टी कानपुर में कैंसर जीनोमिक्स (ड्रोसोफिला माडल) पर शोधकार्य कर रहे हैं। जी हाँ, इनका नाम है रविकांत पाण्डेय

पुरस्कृत कविता- कविता का विषय

विरह-मिलन के छंद सजाऊँ
या ज्वाला के गीत लिखूँ
स्वर बनूँ श्याम की मुरली का
अथवा विप्लव की रीत लिखूँ

हरसिंगार के फूलों सा
पथ में प्रिय, तेरे बिखर जाऊँ
या विपदाओं के अग्निस्नान में
तप कुंदन सा निखर जाऊँ

अहंकार के रक्तबीज का
उचित यही कि नाश करूँ
या दे मशाल उन हाथों को
उनके घर में भी प्रकाश करूँ

यों कुछ काल व्यतीत हुआ
इस वैचारिक उलझन में
सहसा अंतर से नाद उठा
मंद-मंद मुखरित मन में-

ऊँच-नीच सब भेद-भाव
जड़ता, ज्वाला की भेंट करो
फ़िर शांत स्वच्छ निर्मल मन में
आनंद प्रेम की नींव धरो

खोल हृदय के द्वार तभी
कोई तितली फूल खिलाएगी
द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी

जजों की दृष्टि-


प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ६॰८, ६॰५
औसत अंक- ६॰६५
स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ७॰५, ७॰७, ६॰४, ६॰६५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ७॰०६२५
स्थान- तीसरा


तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी- नवीनता और समकालीनता नदारद है
मौलिकता: ४/० कथ्य: ३/१ शिल्प: ३/१॰५
कुल- २॰५
स्थान- पंद्रहवाँ


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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी

भई वाह! कविता लिखना भी
योग साधना से कम नहीं है

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अहंकार के रक्तबीज का
उचित यही कि नाश करूँ
या दे मशाल उन हाथों को
उनके घर में भी प्रकाश करूँ

खोल हृदय के द्वार तभी
कोई तितली फूल खिलाएगी
द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी

बहुत अच्छी रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Avaneesh Tiwari का कहना है कि -

वाह वाह.
बहुत शुद्ध विचार है |
सुंदर

बधाई
अवनीश तिवारी

seema gupta का कहना है कि -

खोल हृदय के द्वार तभी
कोई तितली फूल खिलाएगी
द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी
" wonderful thots and beautifully composed"
regards

anuradha srivastav का कहना है कि -

विरह-मिलन के छंद सजाऊँ
या ज्वाला के गीत लिखूँ
स्वर बनूँ श्याम की मुरली का
अथवा विप्लव की रीत लिखूँ
रवि जी ,श्याम की मुरली का स्वर बनिये और इसी तरह से लिखते रहिये।

रंजू का कहना है कि -

खोल हृदय के द्वार तभी
कोई तितली फूल खिलाएगी
द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी

बहुत सही और सुंदर लिखा आपने ....

shobha का कहना है कि -

रवि जी
छायावादी कविता लिखी है । बहुत सुन्दर-
स हरसिंगार के फूलों सा
पथ में प्रिय, तेरे बिखर जाऊँ
या विपदाओं के अग्निस्नान में
तप कुंदन सा निखर जाऊँ
स्वर आशावादी है । सच्ची कविता वही हो सकती है। बधाई स्वीकारें ।

vipin "mann" का कहना है कि -

विरह-मिलन के छंद सजाऊँ
या ज्वाला के गीत लिखूँ
स्वर बनूँ श्याम की मुरली का
अथवा विप्लव की रीत लिखूँ

अहंकार के रक्तबीज का
उचित यही कि नाश करूँ
या दे मशाल उन हाथों को
उनके घर में भी प्रकाश करूँ


ऊँच-नीच सब भेद-भाव
जड़ता, ज्वाला की भेंट करो
फ़िर शांत स्वच्छ निर्मल मन में
आनंद प्रेम की नींव धरो

वाह ,,,
बस थोडा सा प्रयास अगर हो सके तो और कर लीजिये
आनंद आ गया कुल मिला कर

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

विरह-मिलन के छंद लिखो
या ज्वाला के तुम गीत लिखो
मुरली के सुर बनकर गूँजो
या विप्लव की रीत लिखो
फूलों से बिखरो अवनी में
या अग्निकुड़ में गिरो बिखर
अहंकार का नाश लिखो या
तप कुन्दन सा बनो निखर

बस,

ऊँच नीच का भेद बेध कर
निर्मल मन के भाव लिखो
शब्द प्रेम सिंचित हो कविता
भर अंतर में चाव लिखो
लिखो लिखो तितली आयेगी
तितली कविता बन जायेगी

बहुत सुन्दर लिखा है आपने
लिखते रहें.. शुभकामनायें

alok kumar का कहना है कि -

रविकांत जी हम तो आपके इस काव्य साधना के कायल हो गए.
बहुत ही प्यारी रचना.
शुभकामनाओं समेत
आलोक सिंह "साहिल"

Divya Prakash का कहना है कि -

"द्रष्टा मात्र रहेगा तब तू
कविता खुद बन जाएगी"
सच पूछिये तो हिंदुस्तान का सारा दर्शन आपने आखिरी दो पंक्तियों मैं व्यक्त कर दिया है,दृष्टा हो जाना अपने आप मैं बहुत बड़ी उपलब्धि है ,बहुत अच्छे !!

Alpana Verma का कहना है कि -

बेशक विषय पुराना है लेकिन प्रस्तुति अच्छी लगी.ख़ुद अपने विचारों से लड़ते हुए अगर कवि एक सही निर्णय पर पहुँचता है तो कविता को अपना लक्ष्य मिल जाता है.

आप की कविता अपना संदेश पहुँचाने में सफल है.
कविता में सरलता और प्रवाह विशेष लगे.
शुभकामनाओं समेत

sunita yadav का कहना है कि -

हरसिंगार के फूलों सा
पथ में प्रिय, तेरे बिखर जाऊँ
या विपदाओं के अग्निस्नान में
तप कुंदन सा निखर जाऊँ

अहंकार के रक्तबीज का
उचित यही कि नाश करूँ
या दे मशाल उन हाथों को
उनके घर में भी प्रकाश करूँ

ये पंक्तियाँ अच्छी लगी...
सुनीता

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

रविकांत जी,

अरे कब तक विषय चुनते रहेंगे, अब आप वयस्क है, कुछ राष्ट्रीय चेतना की बात कीजिए। कविता की परिभाषा बहुत बार दी चुकी है।

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