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Tuesday, November 13, 2007

ओ पिता !




ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो ‘तुम’

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वाशन बचपन का,
आज फिर …
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल …
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी …
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजू का कहना है कि -

बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना है यह श्रीकांत जी ..पिता का स्थान कोई नही ले सकता
बहुत ही सुंदर ढंग से आपने इस भाव को शब्दों में पिरोया है ...
ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वाशन बचपन का,
आज फिर …
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

.सुबह सुबह इसको पढ़ के दिल भावुक हो उठा !!

Joshi5 का कहना है कि -

ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें
कवि‍ता को बहुत ही सुंदर ढंग से शब्दों में पिरोया है

खास कर शिर्षक बहुत ही अच्‍छा है।

Anish का कहना है कि -

सुंदर बना है.
बधाई.
अवनीश तिवारी

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

श्रीकान्त जी,

मां, पिता और गुरू का स्थान जीवन में सब से ऊंचा होता है....आपने बहुत ही सुन्दर शब्दों मे अपनी भावनाओ को उजागर किया है .. बधाई

shobha का कहना है कि -

श्रीकान्त जी
भावुक कर देने वाली रचना है । माता और पिता दोनो ही जाब पास होते हैं तो वह अनुभूति नहीं होती किन्तु उनसे दूर होने पर और स्वयं उस स्थान पर आने पर हम उस गहन प्रेम को समझ पाते हैं । यह एक अटूट सम्बन्ध है और इसको शब्दों में बाँध पाना सचनुच कठिन है ।
हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है । चित्र का चयन बहुत कुछ कह रहा है । बधाई स्वीकारें ।

नमस्कार .... का कहना है कि -

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल …
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी …
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
वह श्रीकांत जी ...बहुत खूब ..बहुत ही सुंदर रचना है ...

सजीव सारथी का कहना है कि -

ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वाशन बचपन का,
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

tanha kavi का कहना है कि -

दर्द से आकुल …
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी …
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.

कांत जी,
भाव-विभोर कर देने वाली रचना है। एक-एक शब्द अपनी हीं जिंदगी की कहानी सुनाते लगते हैं। घर से दूर हूँ, इसलिए पिता की याद आ गई। आँखों से आँसू निकल पड़े हैं। और कुछ नहीं कह सकता...

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

पितृप्रेममय कर देने वाली, भावुक, ह्र्दय-स्पर्शी, अतुलनीय रचना के लिये बधाई स्वीकार करें.

नमस्कार
-राघव्

"राज" का कहना है कि -

श्रिकांत जी!!
ओ पिता ! पढके बहुत अच्छा लगा...बहुत ही मार्मिक रचना है...भाव बहुत-बहुत अच्छे है...
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लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

दर्द से आकुल …
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,

केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
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शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

एक सत्य रचना

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