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Tuesday, October 09, 2007

कागज की नाव




न छ्त - कोई छाया
न दीवार - कोई पर्दा
न फ़र्श - जहां बैठूं

न अस्तर - ढके तन
न दस्तर - भरे पेट
न बिस्तर - कहां लेटूं

इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे

पलों की नहीं बातें
यह वर्षों की कहानी है
इक बिगडी हुई किस्मत
क्या करके संवारोगे

खुशी के एक पल से
कटता नहीं यह जीवन
जो छपा मन पर
उसे कैसे बिसारोगे

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

बहुत सुन्दर प्रयोग है मोहिन्दर जी। आरंभ की छ: पंक्तियाँ और शेष पूरी रचना अंतर्संबंधित भी हैं और अलग भी। यह एसा ही है जैसे दोहा-चौपाई पढने का आनंद था।

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

बहुत भीतर तक डुबोती है आपकी यह रचना। बहुत उत्कृष्ट।

*** राजीव रंजन प्रसाद

पारुल "पुखराज" का कहना है कि -

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

बहुत सुदंर भाव्………

रंजू भाटिया का कहना है कि -

कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

बहुत सुंदर अलग सा लगा आपका लिखा पढने में :)
बधाई मोहिंदरजी

शोभा का कहना है कि -

मोहिन्दर जी
बहुत ही सुन्दर और भावभरी रचना है। जीवन में यथार्थ बोध होना तो आवश्यक है किन्तु सपनो का भी
अपना ही महत्व है । सपने भी देखना बन्द कर देंगें तो जीवन बहुत नीरस हो जाएगा । इसलिए यह
बहुत ही आवश्यक है कि दोनो का समन्वय किया जाए । एक सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना के लिए बधाई ।

SahityaShilpi का कहना है कि -

इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे

सरल शब्दों में गंभीर भाव! बधाई!

विपुल का कहना है कि -

आपकी नई शैली में लिखी रचना बहुत अच्छी लगी ...
वाह...

"इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे"

कमाल की कविता है...
पर एक बात कहना चाहूँगा की यह जो अंतिम अंश में आपने लिखा है - "नीर भरे नयनों को दिव्य स्वप्न दिखाते हो"| इसमें "दिव्य" शब्द मुझे कुछ जॅंच नही रहा|ऐसी मेरी व्यक्तिगत सोच है के यदि दिव्य स्वप्न की जगह दिवास्वप्न होता तो अधिक अच्छा होता|ख़ैर.. आपकी रचना बड़ी कमाल की है बधाई स्वीकारें..

"राज" का कहना है कि -

मोहिन्दर जी!!!
बहुत अच्छा....बहुत ही शब्दों का प्रयोग करके आपने बहुत ही गहरी बात कही है...शुरू की ६ और अंत की ४ पन्क्तियां बहुत ही अच्छी लगी...
***********************
न छ्त - कोई छाया
न दीवार - कोई पर्दा
न फ़र्श - जहां बैठूं

न अस्तर - ढके तन
न दस्तर - भरे पेट
न बिस्तर - कहां लेटूं

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे
************************
शुभकामनायें!!!!

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत सुन्दर रचना, उत्कृष्ट, प्रशंसनीय

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

भावपूर्ण शब्द संयोजन.

Nikhil का कहना है कि -

मोहिंदर जीं,
वाह...

"इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे"

इस बार तो आपकी रचना की जितनी तारीफ की जाए कम है...चोटी और सम्पूर्न्म रचना के लिए बधाई...

Udan Tashtari का कहना है कि -

बहुत खूब, मोहिन्दर भाई. बढ़िया रचना है, आनन्द आया. बधाई.

गीता पंडित का कहना है कि -

इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे


नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

गंभीर भाव....
सुन्दर रचना.....


मोहिन्दर जी।
बधाई

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

नीर भरे नयनों को
दिव्य स्वप्न दिखाते हो
कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे


-- बडा सुदर लिखा हॆ ।
अवनीश

Sajeev का कहना है कि -

खुशी के एक पल से
कटता नहीं यह जीवन
जो छपा मन पर
उसे कैसे बिसारोगे
बहुत ही अच्छा लिखा है मोहिंदर जी, और सच भी

दिवाकर मणि का कहना है कि -

मोहिन्दर जी,
"कागज की नाव" से तो आपने समुद्रतरण की कला सीखा दी. श्वेत-श्याम स्वप्नों को विभिन्न रंगों से युक्त बनाने हेतु बधाई स्वीकारें...
अल्प शब्दों के साथ विषय को पूरा कर "गागर में सागर" भर दिया है.
एक महोदय ने "दिव्य-स्वप्न" के स्थान पर "दिवास्वप्न" के रखने की बात कही है, लेकिन (मेरे अनुसार) रचना "दिव्य" की ही माँग करती हुई लग रही है.
विशेष तो कवि महोदय ही जानें, आखिर सन्तति तो उन्ही की है !!
धन्यवाद
मणि

Unknown का कहना है कि -

बन्धु मोहिन्दर जी
सबसे पहले देर से उपस्थिति के लिये क्षमायाचना
अब बात कविता की तो इसके बिम्ब एवं भाव मेरे हृदय को मर्मस्पर्शी
लगे। विशेषकर यह पंक्तियां
इच्छाओं व कामनाओं का
जीवन एक अंधा कुआं
प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे
एक सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना के लिए बधाई

विश्व दीपक का कहना है कि -

न छ्त - कोई छाया
न दीवार - कोई पर्दा
न फ़र्श - जहां बैठूं

न अस्तर - ढके तन
न दस्तर - भरे पेट
न बिस्तर - कहां लेटूं

प्रेम की झाडू से कब तक
भीतर बाहर बुहारोगे

कागज की नाव कैसे
दरिया में उतारोगे

मोहिन्दर जी,
बहुत हीं खूबसूरत रचना है। यथार्थ और स्वप्न दोनों को आपने बखूबी शब्द दिए हैं। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।

@विपुल ,
अब तो दिव्य को बख्श दो। "दिव्य वातावरण" की बातों में अभी तो उलझे हो क्या? :)

-विश्व दीपक 'तन्हा'

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