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Thursday, October 18, 2007

पत्थर और इंसानियत


पिछली बार के तीसरे पायदान के कवि विनय मघु की कविता इस बार १२वें स्थान पर है। सितम्बर माह की प्रतियोगिता के टॉप १० कवियों में ८ नवोदित कवियों के सेंध लगाने से बहुत से बढ़िया कवि इस बार टॉप १० की लिस्ट से बाहर हैं। लेकिन कोशिश फिर से उन्हें स्थापित कर सकती है।

कविता- पत्थर और इंसानियत

कवयिता- विनय मघु, जम्मू (जम्मू एवम् कश्मीर)



मैं,
कभी हुआ करता था,
एक कौड़ी का इंसान।
अंधेरे में गुम, मेरी पहचान।
निकल पड़ा मैं,
आग उगलती दोपहरी में,
नंगे पाँव,
तन जलाती थी,
नौजवान पेड़ों की छाँव।
क्योंकि,
तन पर कपड़ों के
नाम पर चिथडे़ थे -
या,
यू कहो कपड़ों के नाम पर
चिथड़ों से भद्दा मजाक।
उन्हीं दिनों की बात है,
हाँ..... उन्हीं दिनों की बात
जब मैं,
भटका करता था
सड़कों पर।
कोई आँधी की तरहा आया,
हाथों में कुछ पकड़ा कर
तूफान की तरहा निकल गया।
मै निस्तब्ध,
जैसे किसी ने कर दिया हो
आँखों की रोशनी का वध।
पुकारना चाहता था,
चीखना चाहता था,
लेकिन, मैं ऐसा नहीं कर पाया।
ऐसा लगा जैसे किसी ने बांध दिये हो, मेरे शब्द।
एक पत्थर को हाथों में पाया
जब होश आया।
वह पत्थर था
नहीं........ नहीं........ बच्चा था,
नहीं........ नहीं........ पत्थर था,
हाँ,
पत्थर ही तो था वह
मगर,
वह पत्थर हँसता था,
हम इंसानों पर,
सच मानो
मेरा विश्वास करो
मैं सच कह रहा हूँ
वह पत्थर हँसता था
एक,
खामोश हँसी.......
मगर क्यूँ?
मैं नहीं जानता.
शायद
इस भय से की कहीं छीन ना ली जाए
उसकी हँसी, इंसानों के द्वारा।
मगर,
वह हँसता था
क्यूँ?
किस पर?
दुनिया वालों पर
जिनके दिल पत्थर के हो गए है।
या मुझ पर
मै नहीं जानता।
मैं,
तो बस उसे देखता रहा,
सोचता रहा, क्या करूँ इस पत्थर का?
फेक दूँ सड़क की एक तरफ
लावारिस बच्चे की तरहा
ताकि,
मर जाए इस की भी संवेदना
इंसनों की तरहा।
खत्म हो जाए इसका जीवन
आरम्भ से पहले।
मुरझा जाए इसकी हँसी
खिलने से पहले।
नहीं... नहीं... मैं ऐसा नहीं कर सकता,
मैं उसे ले गया
पास के एक छोटे से मंदिर में।
और,
रख आया उसे
दो पत्थरों के बीच।
आज बरसों बाद
सब कुछ बदल गया हैं,
समय के साथ - साथ।
मैं भी
और
वह पत्थर भी।
मैं अनाथ हो गया हूँ
और,
वह आबाद।
मैं उस इलाके
का ठेकेदार बन बैठा हूँ।
उस इलाके के हर आदमी की
जिंदगी का ठेका करता हूँ मैं
खुद का पेट भरने के लिए
भूखे पेटों को
बारम्बार खाया है मैंने।
सपनों को पूरा करने के लिए
दौलत की लाशों पर
आत्मा को बारम्बार सजाया है मैंने।
कई धरों को निगल कर
अपने धर को बनाया हैं मैने।
रक्त से रंगा हैं
चरित्र को अपने मैंने।
और,
वह पत्थर
देवता बन बैठा है।
लोग पूजते हैं उसे।
तिलक करते हैं उसका।
दूध से नहलाते हैं उसे।
विश्वास करते हैं उस पर।
और ,
मुझ से घृणा करते हैं।
डरते हैं मुझ से
दूर भागते हैं मुझसे।
मैंने एक बार फिर से
सड़कों पर भटकना आरम्भ कर दिया हैं।
इंसानियत की प्यास में,
इस आस में,
कोई इंसान मुझ से टकरा जाए,
ताकि,
वो मुझे इंसान बना दें।
और
मैं उसे इंसान बना दूँ।

रिज़ल्ट-कार्ड
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प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ८॰५, ८॰५, ५॰५, ६॰१५, ६॰४
औसत अंक- ७॰०१
स्थान- छठवाँ
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द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक-६॰९, ८॰५, ७॰४, ७॰०१ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ७॰४५२५
स्थान- पाचवाँ
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तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-कविता को अनावश्यक खींचा गया है, वाक्यों-शब्दों की पुनरावृत्तियों ने कविता को और बोझिल बनाया है। किंतु कथ्य सशक्त है इसे एक बेहतरीन कविता में परिवर्तित किया जा सकता है।
अंक- ५॰७
स्थान- बारहवाँ
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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

विनय जी
बहुत ही करूण रस से भरी कथा है । हाँ कथ्य सशक्त है किन्तु कुछ अधिक विस्तृत । कविता में
चित्रात्मक शैली होने के कारण कविता प्रभावशाली बन गई है । बधाई स्वीकार करें ।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

कवि नें खुल कर लिखा है, कविता प्रभावी है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

सुन्दर लेख्ननी .

बधाई...

रंजू का कहना है कि -

बहुत ही सुद्नर कविता है आपकी ..अच्छा लगा पढ़ना

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

विनय जी

एक सुन्दर प्रयास

Gita pandit का कहना है कि -

विनय जी !

सशक्त किन्तु विस्तृत ........।

बधाई

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह बिल्कुल अगर तरह से मर्म को व्हुती है कविता, और अंत बहुत ही प्रभावी है बहुत बहुत बधाई

tanha kavi का कहना है कि -

सुंदर कविता। गहरे भाव और बढिया प्रस्तुतिकरण।
बढाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

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