मुसाफ़िर सा जीवन सफ़र दर सफ़र
बदलती रही मंज़िल यूँ ही उम्र भर
कभी थी वो मंज़िल खिलौनों को पाना
कभी माँ के आँचल में सर को छुपाना
वो मासूम बचपन की प्यारी शरारत
वो भाई से लड़ना बहन को सताना
कहाँ अब वो बचपन के शामो-सहर
जवानी का मौसम जब आने लगा
कोई अज़नबी दिल पे छाने लगा
था हर वक्त सपनों में खोया हुआ
गीत मीठा सा, मन गुनगुनाने लगा
गये फिर वो सपने न जाने किधर
आये थे मेहनत के वो दिन सनम
वो रोज़ी के मसले, ज़माने के गम
खुद अपने हाथों मुकद्दर बनाया गया
दूर हो पाये फिर भी न रंज़ो-अलम
चाँद-तारों तक उठने लगी थी नज़र
देह थकने लगी, मन भरा ही नहीं
उम्र का था अंतिम चरण आ गया
तन था जर्जर हुआ नित नये रोग से
आगे अंतिम सफ़र था, मरण आ गया
चल पड़ा एक दिन फिर जहाँ से गुज़र



























5 टिप्पणी:
अजय जी,
शिल्प के तौर पर एक और अच्छी प्रस्तुति। छोटी छोटी पंक्तियों में गीत के एसे तत्व हैं कि गुनगुनाने वाला कवि का कायल हो रहेगा।
भाव के तौर पर कविता विश्लेषणात्म ही है। केवल इतना ही कह पाती है अपने चारों पदों में कि "बदलती रही मंज़िल"।
संपूर्णता में गीत अच्छा है। बधाई।
*** राजीव रंजन प्रसाद
अजय बहुत सुंदर कविता है जीवन के हर मौसम को ख़ुद में समेटे, दार्शनिक अंदाज़ वाली, एक ग़ज़ल याद आ गई,
अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर में हम हैं,
रुख हवावों का जिधर का है उधर के हम हैं,
मुझे अच्छी लगी.... अजय जी......
जीवन की सुबह, दोपहर ....शाम को समेटती हुई....सरस,सरल शब्दों में...सीधे-सादे ढंग से....एक मीठी-मीठी काव्यात्मक प्रस्तुति.....
आभार
बधाई
स-स्नेह
गीता पंडित
अजय जी,
जीवन के तीनों पहरों का सुन्दर चित्रण किया है आपने अपनी रचना में.
समय इतनी जल्दी गुजरता है कि बस पता नहीं चलता कब चलने का वक्त आ गया...
वाह अजय जी बहुत खूबसूरत कविता लिखी है भाई...एक ही कविता में सारा जीवन का मर्म लिख डाला...
बधाई स्वीकार करें...
सुनीता(शानू)
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