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Thursday, September 13, 2007

हिंद-युग्म साप्ताहिक समीक्षा :8 14 सितंबर 2007 (शुक्रवार)।


हिंद-युग्म साप्ताहिक समीक्षा : 8
(03 सितम्बर 2007 से 09 सितम्बर 2007 तक की कविताओं की समीक्षा)


मित्रो!
साप्ताहिक समीक्षा पर आपकी आत्मीयतापूर्ण प्रतिक्रियाएँ पढ़कर आप सभी से निकट का रिश्ता महसूस होने लगा है। सच बात तो यह है कि आपको जितनी इस स्तंभ की प्रतीक्षा रहती है, आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति स्तंभकार की उत्कंठा उससे अधिक है। यह बात अलग है कि आपकी हर टिप्पणी का चाहकर भी वह अलग से उत्तर नहीं दे पाता है। इसे आप धृष्टता और उपेक्षा नहीं समझेंगे और स्नेह बनाए रखेंगे, ऐसी आशा है।

आगे वृत्तांत यह है कि 14 सितंबर को हम "हिंदी दिवस' मनाते हैं। उत्सवप्रिय भारतवर्ष में सरकारी कार्यालयों में यद्यपि यह पर्व भी रूढ़ि बनता जा रहा है, तथापि हमारे विचार में यह एक राष्ट्रीय पर्व है जिस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के विलंबित/स्थगित पड़े संवैधानिक अधिकार की बहाली के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रयास करते रहेंगे। सुदीर्घ विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिंदी को भारत-संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी। वोटों की राजनीति के कारण आगे चलकर इस अनुच्छेद को सहराजभाषा अंग्रेज़ी के प्रावधान के बहाने निष्प्रभावी बना दिया गया - भारतीय लोकतंत्र की इस त्रासदी से सभी परिचित हैं। उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मेलन के 1953 में नागपुर में संपन्न पाँचवे अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि हिंदी को व्यवहारत: उसके संवैधानिक स्थान की प्राप्ति होने तक 14 सितंबर को "हिंदी दिवस' मनाया जाएगा। इस तरह 14 सितंबर 1954 को पहला हिंदी दिवस मनाया गया। बाद में यह सरकारी राजभाषा-क्रियान्वयन के कार्यक्रम का हिस्सा बन गया और संभवत: इसीलिए रूढ़ि में ढल गया जबकि होना यह चाहिए था कि यह दिन भारतीय भाषाओं के संवैधानिक अधिकार की बहाली के व्यापक जन-आंदोलन का आधार बनता। स्मरण रहे कि संविधान के अनुच्छेद-345 में राज्यों की राजभाषाओं की व्यवस्था है तथा अनुच्छेद-346 में राज्य-संघ-संबंध के संदर्भ में भाषिक व्यवहार की व्याख्या है। त्रासदी यह है कि हिंदी के अधिकार स्थगित होने के कारण ये सारी व्यवस्थाएँ अर्थहीन हो गई हैं। आज जब हम हिंदी को विश्व-भाषा का दर्जा दिलाने की बड़ी-बड़ी बातें सुनते हैं तो सहज ही पूछने का मन होता है कि आप हिंदी को देश में कब उसकी प्रतिष्ठा लौटाएँगे ?

"हिंदी दिवस' पर सब राष्ट्रप्रेमियों को शुभकामनाएँ देते हुए हम इस सप्ताह की कविताओं पर चर्चा शुरू करते हैं।
जी हाँ, इस बार बारह रचनाएँ विचारार्थ आई हैं।

1. 'योग गैर ईसाई है' (राजीव रंजन प्रसाद) में योग के संबंध में पिछले दिनों किन्हीं पादरी महाशय के अविवेक तथा सांप्रदायिक विद्वेष से भरे अतिशय बुद्धिमत्तापूर्ण वक्तव्य पर उत्पन्न आक्रोश को व्यंग्यात्मक शैली में प्रकट किया गया है। स्मरण रहे कि अतिशय बुद्धिमत्ता उतनी ही खतरनाक चीज है जितनी बुद्धिहीनता। कवि ने आधुनिक सभ्यता के दावेदार बनने वालों और उसी के नाम पर भारत को पिछड़ा, असभ्य और असंस्कृत देश बताने वालों के बौद्धिक दिवालियेपन पर उपहास के सहारे सीधा प्रहार किया है। कविता के प्रारंभिक तीन अंश बड़े नाटकीय अंदाज में इस प्रहार को क्रमश: धार प्रदान करते हैं और चौथे अंश में मूल परिस्थिति को नेपथ्य से निकाल कर मंच पर ला खड़ा किया गया है। रामदुलारे, अल्लारक्खा और कालूराम जैसे नाम भी पर्याप्त व्यंजनापूर्ण है। लोक शब्दों और मुहावरों के प्रयोग से कथन में आक्रामकता आ सकी है जबकि उपहास का वातावरण बनाने में अंग्रेज़ी शब्द काफी सहायक हुए हैं। राम-दुहाई का खंडित प्रयोग आकर्षक है और सचोट भी : राम कहूँगा तो सांप्रदायिक हो जाएगा/पर दुहाई तो दुहाई है। अंतिम अंश में "मान्यवर' संबोधन भी सटीक व्यंग्य का आधार बना है। (इतना कहने के बाद क्या अलग से बधाई लिखने की भी जरूरत है - वह भी तो व्यंजित हो जाती होगी?)

2. कितना मुश्किल है "ग़ज़ल' (मोहिंदर कुमार) के कई शेर मार्मिक बन पड़े हैं। रचना नैरेटर की हताशा को तो अभिव्यक्त करती ही है, लेकिन यदि सामाजिक और राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में व्याख्या करें तो लोकतंत्र की विफलता और त्रासदी को भी कुछ स्थलों पर साफ-साफ देखा जा सकता है। आम आदमी के कष्ट और सत्ता/व्यवस्था के शोषक चरित्र पर यह शेर मौजूँ माना जा सकता है - ज़िंदगी धूप हुई दूर तलक कोई साया नहीं/मौसमे-बारिश के हैं छींटे आग लगाने वाले। (अर्थगर्भित होकर ही कविता फलवती होती है न?)

3. "क्यों मैं तुमसे प्यार करता हूँ' (पंकज) में सौंदर्य, आकर्षण, प्रेम और समर्पण की शाश्वत उलझनों को व्याख्यायित करने का प्रयास खूब बन पड़ा है। यह खास तरह से देखने की अदा ही काव्यशास्त्र में "ध्वनि' और कामशास्त्र में "चितवनि' है। (दीरघ अनिपारे नयन, किती न तरुनि समान/वह चितवनि और कछू, जिंहि बस होत सुजान। - बिहारी)

4. "तुम ज़िंदा हो' (गौरव सोलंकी) में प्रेमपात्र की संवेदनहीनता की व्यंजना जड़ पदार्थों की संवेदनशीलता के वैपरीत्य के कारण चमत्कारी बन गई है। उपालंभ, पीड़ा, कटाक्ष और व्यंग्य ने मिलकर अभिव्यक्ति को पैनापन प्रदान किया है। "तुम' और "उस' की विरोधी समांतरता तथा ""तुम उससे तो ज्यादा ही जिंदा थे'' की ""उससे लाख गुना ज्यादा जान है तुममें'' के रूप में अर्थ स्तरीय आव़ृत्ति कविता के पूरे पाठ को बांधने में समर्थ है। (नीर भरी दुख की बदली!)

5. "कुछ यूँ ही' (रंजना भाटिया) के अंतर्गत प्रस्तुत 12 क्षणिकाएँ सचमुच कई तरह से क्षणबोध को शब्दबद्ध कर सकी हैं। खामोशी, जिंदगी और प्रेम की एक नई भाषा - को अगर एक साथ पढ़ा जाए तो यह बोध घनीभूत होता है कि वाचालताओं की संधि में स्थित मौन में ही प्रेम अधिक मुखर होता है। (कई बार हम इस मौन में उभरने वाले आनंद को अपनी वाचालता के प्रवाह में डुबोकर व्यर्थ कर देते हैं न?) उलझन और एकांत के बोध को भी कुछ क्षणिकाएँ व्यक्त करती हैं। दर्द और तनहाई का मानवीकरण पर्याप्त बिंबात्मक है। पांचवी क्षणिका को अगर मोहिंदर कुमार की ग़ज़ल के छठे अंश के साथ पढ़ा जाए तो वियोग और संयोग में उद्दीपनों के विपरीत प्रभाव की जानकारी मिल सकती है। वहाँ मौसमे बारिश में भी आग बरस रही है और यहाँ रंजना भाटिया को गरम हवा के बावजूद फॢजा महकी-महकी लग रही है! (हमारा साथ जब हमें अहोभाव से भरता है तभी तो ठेठ जेठ में भी इस तरह वसंत खिल उठता है!)

6. "रात' (सजीव सारथी) में रूपक का निर्वाह और बिंब का निर्माण प्रभावशाली है। सूरज की थकी हुई आँखों से बहती सपनों की शराब तथा बोलती तनहाइयों की महक से बनने वाले चित्र विशिष्ट प्रतीत होते हैं। अंतिम पंक्तियों में होठों को चूमकर गुनगुनाती रात कई संदर्भों को एक साथ याद दिलाती है। (तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन - कामायनी, निशा शांति का क्रोड - उर्वशी)।

7. "शाह बन नकल गया" (अजय यादव) में कवि का सामाजिक सरोकार ध्यान खींचता है। पाँचवें अंश का बिंब तथा अंतिम अंश का रूपक इस ग़ज़ल को विशेष बल प्रदान कर सके हैं। लय की दृष्टि से कुछ अंशों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। (माँजने से ही निखार आता है न?)

8. "न्याय' (मनीष वंदेमातरम्) बिच-हंट जैसी भयानक मूर्खता पर कुठाराघात करने वाली सार्थक कविता है। भारत ही नहीं, सारी दुनिया में लोग आज भी इतने पिछड़े और बर्बर हैं कि डाइन और चुड़ैल कहकर औरतों को सार्वजनिक / सामूहिक रूप से क्रूरतापूर्वक मार डालते हैं और इसे न्याय संगत भी ठहराते हैं - यह सारी मनुष्य जाति के लिए शर्म की बात है। इस प्रथा की अमानवीयता, क्रूरता और वीभत्सता, स्त्री की असहाय अवस्था तथा तज्जनित आक्रोश को कविता में आव़ृत्तियों और नाटकीयता के सहारे व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। मजा आया, मजा आया, मजा आया - अमानवीय आचरण की पराकाष्ठा है, तो हे माधव, लाज बचाओ - सामाजिक अन्याय के समक्ष कथित ईश्वरीय न्याय की त्रासद विफलता का सम्मूर्तन है। (द्रोपदी की लाज बचाने वाले माधव की पूजा करने वालों में एक भी माधव है क्या?)

9. "फिर भी' (तुषार जोशी) एकांत समर्पण का बयान करने वाला प्रेमगीत है। प्रेमी का अपनी साधना की सफलता पर चरम विश्वास विलक्षण है। प्रेमपात्र द्वारा अस्वीकृति के बावजूद प्रेमी अडिग है। (शायद इसे ही निरभिमानता, अहंकारशून्यता और अनकंडीशनल लव कहते हों !)

10. "मैं खुद मेरा सवेरा' (विश्व दीपक तन्हा) में व्यक्ति के आत्मदर्प और स्वाभिमान की गीतात्मक प्रस्तुति द्रष्टव्य है। स्वयं के तेज से विगत कल के अंधेरे को धोना सराहनीय और अनुकरणीय है। चलो! मुख खोलकर तुम भी हुंकार भर लो - वाले अंश में ओजगुण आह्वान की मुद्रा के सर्वथा अनुरूप है। (अप्प दीपो भव!)

11. "नियम' (गिरिराज जोशी) में विपथन की शैली वैज्ञानिक तकनीक के प्रयोग से कवित्व आ गया है। पहले छह अंशों में कवि ने मनुष्य द्वारा नियमों के निर्धारण के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जो बड़ी सीमा तक गद्यात्मक हैं। परंतु अंतिम अंश में जब विस्मय के साथ मनुष्य के अमानवीकृत होकर नियम भर बन जाने का सत्य निष्पन्न होता है तो लीक तोड़कर कथन कविता बन जाता है। (लीक तोड़ तीनों चलें शायर सिंह सपूत!)

12. "कह री दिल्ली' (निखिल आनंद गिरि) में एक ओर तो गाँव/कस्बे से विस्थापित होकर महानगर में बसने को विवश व्यक्ति की नॉस्टेलजिक प्रतीत होने वाली होम-सिकनेस को देखा जा सकता है तथा दूसरी ओर उस पीड़ा और त्रासदी का अहसास किया जा सकता है जो आत्मीय संबंधों और कुटुंब संस्कृति के संवेदना और प्रेम जैसे जीवन मूल्यों के ह्रास के रूप में आज हम सबको घेर रही है। सुबह का सूर्य थकता है तो खंभों पर चमक उठती हैं शामें, यहाँ हर शाम प्यालों में लचकती है, नहाती है, तथा थकी हारी जिंदगी की राजधानी जैसी उक्तियाँ अंधाधुंध आधुनिकीकरण की प्रवृत्ति पर गहरा कटाक्ष करती हैं। बाजारीकरण का असर इतना गहरा है कि अब सपनों के मरने पर भी मन में कोई टीस तक नहीं उभरती। इतना ही नहीं, राधा और मीरा अपने ऐतिहासिक संदर्भों को खोकर मात्र स्त्रीवाचक नाम बन कर रह गए हैं क्योंकि उन संदर्भों की सार्थकता तो प्रेम में थी जबकि प्रेम की गरिमा यहाँ पर देह के विस्तार में है। (शरीरमाद्यम् खलु "प्रेम' साधनम्! ऐं?)

अंत में, इसी बात पर हो जाए पाठकों के विमर्श हेतु डॉ रामधारी सिंह "दिनकर' की प्रसिद्ध कविता "दिल्ली' के कुछ अंशों का पाठ -

अंकित है कृषकों के गृह में तेरी निठुर निशानी
,दुखियों की कुटिया रो-रो कहती तेरी मनमानी;
औ' तेरा दृग-मद यह क्या है? क्या न खून बेकस का?
बोल, बोल, क्यों लजा रही, ओ कृषक-मेध की रानी?

वैभव की दीवानी दिल्ली !
कृषक-मेध की रानी दिल्ली !
अनाचार, अपमान, व्यंग्य की
चुभती हुई कहानी दिल्ली !

अपने ही पति की समाधि पर कुलटे ! तू छवि में इतराती ;
परदेसी-सँग गलबाँही दे मन में है फूली न समाती !
अरी, हया कर, है जईफ़ यह खड़ा कुतुब-मीनार,
इबरत की माँ जामा भी है यहीं अरी ! हुशियार !

इन्हें देखकर भी तो दिल्ली ! आँखें हाय फिरा ले,
गौरव के गुरु रो न पड़ें, हा, घूँघट ज़रा गिरा ले। X X

उठा कसक दिल में लहराता है यमुना का पानी,
पलकें जुगा रहीं बीते वैभव की एक निशानी,
दिल्ली ! तेरे रूप-रंग पर कैसे हृदय फँसेगा ?
बाट जोहती खँडहर में हम कंगालों की रानी !


अस्तु, आज इतना ही।
इति विदा पुनर्मिलनाय॥
आपका
- ऋषभदेव शर्मा
14.09.2007

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

अजय यादव का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभदेव जी!

आपकी समीक्षा का हर बार इंतज़ार रहता है क्योंकि समीक्षा न केवल पाठकों को रचना को आत्मसात करने के लिये एक नवीन अंतर्दृष्टि देती है अपितु कवियों को उनकी कमियाँ बता कर सतत-सुधार के लिये प्रेरित भी करती है. आप की समीक्षा अब तक दोनों ही उद्देश्यों की पूर्ति करती रही है, पर इधर लगता है कि आपने सिर्फ खूबियाँ ही गिनाने पर जोर दे रखा है. इस मंच के अधिकाँश कवि अभी काव्य-विधा के विद्यार्थी ही हैं, अत: आपसे विनम्र अनुरोध है कि रचना की कमियाँ तथा उसकी सौन्दर्य-वृद्धि के लिये कुछ विचार भी बताते रहें.
कुछ अधिक कह देने की धृष्टता के लिये माफ़ी चाहता हूँ.

विनीत:
अजय यादव

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभदेव जी!

हिन्दी दिवस की आपको भी हार्दिक शुभकामनायें।आपने लिखा है कि "बड़ी-बड़ी बातें सुनते हैं तो सहज ही पूछने का मन होता है कि आप हिंदी को देश में कब उसकी प्रतिष्ठा लौटाएँगे ?" छोटे छोटे प्रयास भी बडा काम कर सकते हैं। आप जैसे मनीषियों की कलम है तो अभी आशा है।

"योग गैर ईसाई है" पर आपसे आशीष पा कर अभिभूत हूँ।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Gaurav Shukla का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभदेव जी,
सादर प्रणाम के साथ आपका आभार प्रकट करना चाहता हूँ

प्रत्येक कविता पर इतनी सटीक और सारगर्भित समीक्षा!!!

आपकी साप्ताहिक समीक्षा मैं हमेशा ही पढता रहा हूँ क्योंकि यह किसी प्रशिक्षण संस्थान से कम नहीं है| हमारे कविमित्रों के लिये भी आपकी समीक्षा किसी वरदान से कम नहीं, कई मित्रों के लेखन में निरन्तर सुधार आया है ऐसा मैं युग्म का नियमित पाठक होने के कारण पूरे विश्वास से कह सकता हूँ|

युग्म को और स्तरीय बनाने मे आपका योगदान अतुलनीय है
पुनश्च आभार

सादर
गौरव शुक्ल

रंजू का कहना है कि -

ऋषभदेव जी...इस बार आपकी समीक्षा का बहुत बेसब्री से इंतज़ार था जैसे किसी विद्यार्थी को अपने रिजल्ट का इंतज़ार रहता है :)
पाठकों की राय तो मैं पहले पढ़ चुकी थी पर इस नई विधा के बारे में आपके विचार जानने की उत्सुकता थी
आपके द्वारा की गई समीक्षा से मुझे बहुत कुछ नया सीखने को मिला है ... आपका साथ हम सबको और नया और अच्छा लिखने की प्रेरणा देता है ...दिनकर जी यह पंक्तियां अभी कुछ समय पहले पढी थी आज इस के साथ पढने में अलग ही आनंद आया... शुक्रिया....रंजना

सजीव सारथी का कहना है कि -

क्या कहूँ कितना अच्छा लगता है आपको पढ़ना, आपकी समीक्षा आने के बाद मैं हर कविता को एक बार फ़िर पढता हूँ, वैसे अजय जी की बात पर विचार कीजियेगा, यूं तोः आप इशारों मे ही बहुत कुछ कह जाते हैं, फ़िर भी आपकी इन समीक्षाओं से हम सब को बहुत कुछ सीखने को मिलता है, आपने यक़ीनन युग्म का गौरव बढ़ाया है
धन्येवाद

RAVI KANT का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभदेव जी,
आपकी समीक्षा से कई ऐसे पहलू भी उभरकर सामने आ जाते हैं जो सामान्यतया छूट जाते हैं। ऐसे सार्थक श्रम के लिए धन्यवाद।

cmpershad का कहना है कि -

डा. ऋषभ देव शर्मा जी की टिप्प्णियों की प्रतीक्षा तो सभी को रहती है। हिंदी दिवस पर उनकी कथनी सही है कइ हमारी मात्रभाषा को हमारे नेताओं के कारण ही उपेक्षा झेलनी पड़ रही है। लेकिन अब स्थिति बदलती नज़र आ रही है।कम्प्युटर पर हिंदयुग्म जैसे वेब साइट हिंदी को आगे बढा़ने का काम कर रहे हैं। आशा है हमारे ये युवा साहित्यकार इस अभियान को आगे बढा़येंगे और हमारी भाषा अंतरराष्ट्रिय स्तर अपना मुका़म खुद बनायेगी। जय हिंदी....जय हिंद

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अजय जी,

मुझे लगता है कि ऋषभ जी सच्चे कुम्हार की तरह आपलोगों को अंदर से चोटकर और बाहर से पुचकारकर सुंदर घड़ा रूपी कवि बनाना चाहते हैं। मुझे इनकी समालोचना पसंद है। पुनः धन्यवाद।

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