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Saturday, August 11, 2007

पहले जैसा प्यार नहीं (प्रतियोगिता से)


जुलाई माह की प्रतियोगिता में बहुत से नये प्रतिभागियों ने भाग लिया था। उन्हीं में से एक थे मथुरा निवासी कवि संतोष कुमार सिंह जिनकी कविता 'पहले जैसा प्यार नहीं' छठवें पायदान पर रही। आज हम उनकी वहीं कविता लेकर आये हैं।

कविता- पहले जैसा प्यार नहीं

कवयिता- संतोष कुमार सिंह, मथुरा

सारा गाँव घूम कर देखा, दिखा न हमको प्यार है।
जहाँ फूल बोली में झरते, वहाँ मिले अब खार है।।
भाई-भाई पगा स्वार्थ में, घर-घर बैठा है।
देख पड़ौसी भी चलता अब ऐंठा-ऐंठा है।।
हास और परिहास खो गये भाभी के मुख से
दुःखी हो रहे देख-देख सब, दूजे के सुख से।।
दिन-दिन बढ़ता यहाँ जा रहा, कटुता का व्यवहार है।
अब न कोई करे खुशामद, जो परिजन हैं रूठे।
बेकदरी हो रही सत्य की, पूजते हैं अब झूठे।।
मिले वासना के छींटे भी, होली के रंग में।
विश्वासघात करती आली अब आली के संग में।।
प्रेमरोग भी अमरबेल-सा, फैल रहा मक्कार है।
मान और मर्यादा खोई, मुखिया पंचन की है।
राजनीति ठगनी ही लगती, कामिनी-कंचन-सी है।।
कुटिल वासना के पंजों में, अस्मत सिसक रही है।
लज्जित हुए खून के रिश्ते, शर्म न हया रही है।
बहु के मुख का घुँघटा गायब, जिह्वा बनी कटार है।

रिज़ल्ट-कार्ड


प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ५, ८॰५, ८
औसत अंक- ७॰१६६७
स्थान- नौवाँ


द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक-
७॰५, ७॰५, ८॰३, ७॰३५, ४, ७॰१६६७ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰९६९४४४
स्थान- नौवाँ


तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-
विषय सामयिक है। काव्यात्मकता की कमी है।
अंक- ४
स्थान- पाँचवाँ


अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
रचना में कथ्य का प्रस्तुतिकरण बेहद साधारण है और शिल्प कसे जाने की प्रतीक्षा में है। रचना अभी कच्ची है। कवि के पास भाव भी परिपक्व हैं और शब्दकोष भी संतोषजनक किंतु रचना में भावों को सही शब्द नहीं मिले।

कला पक्ष: ५/१०
भाव पक्ष: ५/१०
कुल योग: १०/२०


पुरस्कार- सुनील डोगरा ज़ालिम की ओर से उन्हीं की पसंद की पुस्तकें।

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

anuradha srivastav का कहना है कि -

बदलते परिवेश और बदलते रिश्तों की सही व्याख्या करी है आपने ।

Anonymous का कहना है कि -

संतोष जी, बहुत बहुत मुबारक हो आपको।
विचार उत्तम हैं। पर बीच में लय नहीं बन पाई है और मात्राओं में भी छिटपुट गलतियाँ हैं जैसे "बहु", "पड़ौसी"। पर अगर भावों पर ध्यान दें तो बिल्कुल सही हैं...

धन्यवाद,
तपन शर्मा

शोभा का कहना है कि -

सन्तोष जी
अच्छी कविता लिखी है । सचमुच अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा । ना गाँव ना शहर ।
ना इन्सान । परिवर्तन इस दुनिया का नियम है । फिर भी कुछ बातें हैं जिनका बदलना अच्छा
नहीं लगता । परिवर्तन के हर अंग पर आपकी नज़र पड़ी है । बधाई

Nikhil का कहना है कि -

संतोष जी,
हिंदयुग्म पर स्वागत....आपकी कविता में नया तेवर है....मगर शब्द पुराने हैं....मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ, इसीलिये मेरी टिपण्णी को आप एक पाठक की जिज्ञासा ही समझें...आपके भीतर का असंतोष बाहर तो आता है मगर चुंकि आपकी कविता प्रतियोगिता के लिए थी, तो वहाँ नए उदाहरण भी दिया जाते तो अच्छा था.....
सबसे अच्छी पंक्तिया लगी-
राजनीति ठगनी ही लगती, कामिनी-कंचन-सी
कुटिल वासना के पंजों में, अस्मत सिसक रही है।

बहुत आशा हैं

निखिल....

Anonymous का कहना है कि -

कविता मेरे मत से सुंदर ही है परंतु चूँकि अंतिम पद मे शरआटी पदों की तरह ही चांतक नही उत्पन्न हो सका इसलिए ही शायद जज यह कह रहे हाए हैं की कसावट नही है............
भाव बेहद परिपक्व है......
कविता मुझे अत्यंत ही अच्छी लगी पता नही जज जी ने इस पैर नकारात्मक टिप्पणी की

Anonymous का कहना है कि -

कविता मेरे मत से सुंदर ही है परंतु चूँकि अंतिम पद मे शरआटी पदों की तरह ही चांतक नही उत्पन्न हो सका इसलिए ही शायद जज यह कह रहे हाए हैं की कसावट नही है............
भाव बेहद परिपक्व है......
कविता मुझे अत्यंत ही अच्छी लगी पता नही जज जी ने इस पैर नकारात्मक टिप्पणी की

RAVI KANT का कहना है कि -

संतोष जी,
कुल मिला-जुला कर अच्छी कविता बन पड़ी है हालांकि मैं कुछ बातों में भिन्न दृष्टिकोण रखता हूँ जैसे मेरे देखे प्रेम्रोग अनुचित शब्द है क्योन्कि प्रेम रोग नही बल्कि दवा है और बाकी सभी रोग इसके अभाव में उतपन्न होते हैं।

सारा गाँव घूम कर देखा, दिखा न हमको प्यार है।
जहाँ फूल बोली में झरते, वहाँ मिले अब खार है।।

बिल्कुल सही कहा आपने।आगे भी आपकी कविताएँ पढ़ने को मिलेंगी ऐसी अपेक्षा है।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

कवि में असीम संभावनायें हैं, चूंकि भावों पर कवि सुलझा हुआ है। बहुत बधाई।

*** राजीव रंजन प्रसाद

अभिषेक सागर का कहना है कि -

कविता अच्छी है।

विश्व दीपक का कहना है कि -

अच्छी रचना है। पढ कर मजा आ गया।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कविता का प्रस्तुतिकरण बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करता। कवि ने लयात्मकता रखने की कोशिश तो की है। मगर पूरी तरह सफल नहीं हुआ। एक बिम्ब बहुत पसंद आया-

प्रेमरोग भी अमरबेल-सा, फैल रहा मक्कार है।

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