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Sunday, August 26, 2007

हमसफ़र पर विजय दवे के चार विचार


आज हम हमसफर पर विजय दवे के चार विचार, चार क्षणिकाओं में लेकर प्रस्तुत हैं। विजय दवे जी हमारे सक्रिय पाठक रहे हैं। जुलाई माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता का स्थान चौदहवाँ रहा है। इन्होंने परिणाम को हमेशा सकारात्मक लिया है। यह हमारे लिए खुशी की बात है।

रचना- हमसफ़र (चार विचार, चार क्षणिकाओं में)

रचयिता- विजय दवे

नश्वर दुनिया को छोड़कर
चले जायें हम
किसी शाश्वत सत्य की शोध में
जो हम दोनों को
बांधे हुए है
पिछले कई जन्मों से...
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किसी नदी के किनारे बैठा था मैं
तू ने आहिस्ते से मेरे बगल में
जगह बना ली.
हम देखते रहे ....
उठती, ठहरती, रुकती, दौड़ती लहरों को.
शाम ढले चल दिए हम -
मैं उत्तर में तुम दक्षिण में.
----

एक मोड़ पर हुई
एक छोटी सी मुलाक़ात के बाद
हम चल दिए साथ - साथ .
एक मोड़ पर आकर
तुमने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया.
एक मोड़ पर
तू ने कहा -
मुझे अब पूर्व की ओर जाना है.
तुम चल दिए.
मैं अकेला पश्चिम की ओर डूबने लगा.
---

समंदर के किनारे
हम चने चबाते-चबाते
देख रहे थे "सन-सेट".
सूर्य को क्षितिज को चुम्बन देते हुए देख
तू ने धर दिया मेरे भाल पर
एक ठंडा, हल्का सा चुम्बन.
आज भी अपने भाल पर
वही ओंठों के " फिन्गर-प्रिन्ट" लेकर
ढूँढ़ता हूँ तुम्हें
क्षितिज पर डूबते हुए
सूरज के उस पार.
तुम कहाँ?

रिज़ल्ट-कार्ड
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प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ६॰५, ९, ७
औसत अंक- ७॰५
स्थान- चौथा
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द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक-
८॰५, ६॰५, ७॰५, ७॰२५, १, ७॰५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰३७५
स्थान- चौदहवाँ

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

shobha का कहना है कि -

विजय जी
आपने अपने जीवन अनुभव को व्यक्त किया है । भाव अच्छे हैं किन्तु क्षणिकाओं
में जो आनन्द आना चाहिए था वह नहीं आया ।

RAVI KANT का कहना है कि -

विजय जी,
सुन्दर प्रयास पर थोड़ी और निखार की जरूरत है।

एक मोड़ पर हुई
एक छोटी सी मुलाक़ात के बाद
हम चल दिए साथ - साथ .
एक मोड़ पर आकर
तुमने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया.
एक मोड़ पर
तू ने कहा -
मुझे अब पूर्व की ओर जाना है.
तुम चल दिए.
मैं अकेला पश्चिम की ओर डूबने लगा

ये भाव पसंद आए।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अच्छी क्षणिकायें हैं, इस विधा को साधिये।

*** राजीव रंजन प्रसाद

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आपकी क्षणिकाओं को पढ़कर लगता है कि आप इसमें बहुत उत्कृष्ट कृतियाँ दे सकते हैं। हर क्षणिका में निखार देना आवश्यक है। कई क्षणिकाएँ बहुत लम्बी हो गई हैं। भाव ज़्यादा और शब्द कम कीजिए

विपिन चौहान "मन" का कहना है कि -

विजय जी..
जीवन का मौलिक तत्व सिर्फ निराशा या उदासी ही नहीं होता..
आप का प्रयास अच्छा है लेकिन लगभग हर जगह निखार की जरूरत है..
शब्द कम कीजिये और भाव पर ध्यान दीजिये..
कवि धर्म सिर्फ रुदन का नाम नहीं है..
कवि समाज को दिशा देने वाला होना चाहिये..
अगर बुरा लगा हो तो छमा कीजियेगा
आभार

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