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Saturday, July 21, 2007

जीवन (एक कविता प्रतियोगिता से)


जीवन के प्रति सभी का अपना-अपना नज़रिया होता है। जून माह की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भाग ले चुके कवि श्रीकांत मिश्र 'कांत' भी अलग ही दृष्टिकोण रखते है। आज हम उन्हीं की कविता 'जीवन' को लेकर प्रस्तुत हैं। इनकी यह कविता जून माह की प्रतियोगिता में नौवें या दसवें पायदान पर रही थी।

कविता- जीवन
कवयिता- श्रीकांत मिश्र 'कांत' , चण्डीगढ़

कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ाता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप-धूप चलते-चलते
सब झुलस चुकी है काया
फूट चुके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
तू चलता हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणी का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर आँखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू बावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन

रिज़ल्ट-कार्ड
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प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ६,९, ७
औसत अंक- ७॰३३३३३
स्थान- दूसरा
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द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ८, ८, ६॰५, ७॰३३३३३ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ७॰४५८२५
स्थान- छठवाँ
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तृतीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ६, ७॰४५८२५ (दूसरे चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰७२
स्थान- नौवाँ व दसवाँ
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पुरस्कार- कवि कुलवंत सिंह की ओर से उनकी पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

रचना का प्रवाह प्रसंशनीय है। बिम्ब भी सुन्दर है जैसे "कटी पतंग उड़ाता है क्यों, ओ मेरे चंचल मन"

ये पंक्तियाँ दर्शाती है कि कवि की भावों पर पकड गहरी है जैसे:

पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
तू चलता हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणी का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन

निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू बावरा मेरा मन

बहुत अच्छी रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद

piyush{abeer} का कहना है कि -

kavita antyat prwah may hai
bhav aur kala pash dono hi sundar hai
bahut dino baad nayi kavita chhod is prakar ki lay baddh kavita padi
aanand aa gay
dhanyawwad avam shubh kamnayen

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बहुत ग़ौर से कविता को पढ़ने पर समझ में आता है कि इसमें समान लयांत नहीं है। भाव पक्ष मजबूत है, मगर आँखों में, हाथों में, कानों में, भावों में' १००% समान ध्वनांत नहीं है। शायद यही कारण है कि कविता कुछ पिछड़ गई नहीं तो कविता के कई तत्व इसमें विद्यमान हैं।

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

कविता का प्रवाह इसे सशक्त बनाता है। अगली बार के लिए शुभकामनाएं।

shobha का कहना है कि -

कविता बहुत सुन्दर लगी । इतनी सुन्दर कि तुरन्त गाने का मन किया ।
गाने की कोशिश की है आप सुनिए और बताइए कैसी लगी । यहाँ देखें यहाँ

अजय यादव का कहना है कि -

सुंदर और प्रभावपूर्ण कविता है, श्रीकांत जी! अगली बार के लिये शुभकामनायें!

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

वाह!

श्रीकांतजी,

कविता में ग़ज़ब का प्रवाह है, बार-बार गुनगुनाने को मन करता है, एक अच्छा संदेश बहुत ही खूबसूरती से आपने काव्य में पिरोया है, आनंद आया।

बधाई!!!

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

मित्रो मेरी कविता जीवन पर आप सब की टिप्पणियों के लिये आभार. विशेष रूप से शोभा जी को स्वर प्रदान करने के लिये. जीवन मेरे हृदय के बहुत ही निकट है. अतः इसको प्रकाशित करने का साहस हिन्दयुग्म के अवतरण से पूर्व कभी न कर सका. इस गीत को मेरी पुत्री अमिता मिश्र 'नीर' ने बहुत पहले एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्वर दिया था. 'नीर' अब मेरे साथ नहीं है. किन्तु उसके स्वर में यह गीत मेरे कानों में गूंजता रहता है. शोभा जी को मेरा हार्दिक धन्यवाद एवं आप सब बन्धुओं का आभार.
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

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