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Saturday, July 21, 2007

अब तक की सफलतम ब्लॉगर-मीट (विस्तृत रिपोर्ट)


१४ जुलाई २००७ को दिल्ली में आयोजित हिन्दी-ब्लॉग मीट अब तक की सबसे बड़ी और सफल मीट रही। कुल ३० लोग शरीक़ हुए। यद्यपि ममता॰टीवी चाहकर भी नहीं आ सकीं क्योंकि उनके पास किसी भी ब्लॉगर का मोबाइल नं॰ और आयोजन-स्थल की सही जानकारी नहीं थी। होटेल सरवन के बाहर अपनी गाड़ी में वो दोपहर १२ बजे तक इंतज़ार करती रहीं। जीतू जी व्यक्तिगत कारणों से दिल्ली नहीं पहुँच पाये।

स्थान निर्धारित हुआ था जनपथ स्थित 'कैफ़े कॉफ़ी डे' और समय १०:३० सुबह। समय निर्धारण के पीछे अमित गुप्ता थे। १०:३० बजे या उससे भी पहले से सजीव सारथी और अफ़लातून वहाँ मौज़ूद थे। १० मिनट विलम्ब से मैं भी वहाँ पहुँच गया। ११ बजे तक अजय यादव और अरविन्द चतुर्वेदी पहुँच चुके थे। आयोजक स्वयम् १२:०५ तक पहुँचे। वैसे अफ़लातून ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि यह किसी की तरफ़ से आयोजित नहीं है। एक गेदरिंग है। इसलिए कोई आये या न आये, यह चिंता की बात नहीं है। स्वेच्छा है।

११:१५ तक रंजना भाटिया और मोहिन्दर कुमार पधार चुके थे।

[नीरज शर्मा, सुनिता चौटिया एवं रंजना भाटिया]
इसी मध्य सुनीता चोटिया और नीरज शर्मा जी का अवतरण हुआ। अभी तक एक-दूसरे के परिचय का आदान-प्रदान हो रहा था। लोग अपने-अपने कार्यक्षेत्र के बारे में बता रहे थे। रचना सिंह आ चुकी थीं। वो जो फ़ोटो में दिखाई देती हैं, उससे अलग हैं। उनका कहना था कि वहाँ मैं और हूँ और यहाँ और। अफ़लातून जी ने गूगल द्वारा दी जाने वाली छोटी-छोटी सुविधाओं (जैसे नोटबुक, गूगल एलर्ट आदी ) के बारे में सूचना दी और जानकारी और सूचना के बीच के अंतर के दर्शन पर प्रवचन दिया।

रचना जी ने मोटा-मोटी यह बात रखी कि उनके अनुसार सारथी हिन्दी का अधिकतम सूचना देने वाला ब्लॉग है। यदि आप वहाँ छप गये तो हिट हो जायेंगे। तुरंत ही इस पर सभी लोगों ने अपनी मतभिन्नता व्यक्त कर दी।

इसी बीच मैथिली शरण गुप्ता, अरुण अरोड़ा, काकेश और घुघुती बासूती का आना हुआ। भीड़ बढ़ने लगी थी।

[मैथिलि, शैलेश एवं संजय बैंगाणी]
केवल इसी चर्चा के लिए अहमदाबाद से तशरीफ लाए संजय बेंगाणी सार्थक चर्चा के लिए इस जगह को उपयुक्त नहीं मान रहे थे। मैंने उन्हें इंडिया गेट या सेन्ट्रल पार्क के पास के घास के मैदान में बैठकर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा, मगर दिल्ली में रात के २ बजे से सुबह के ११ बजे तक काफ़ी बारिश हुई थी, इससे सबके कपड़ों के गीले हो जाने का डर था। सृजनशिल्पी, अमिताभ त्रिपाठी, राजेश रोशन, अविनाश, भूपेन आ चुके थे।

सबकी आशंका थी कि इस चर्चा के लिए यह जगह उपयुक्त नहीं है।

[अविनाश एवं अफ़लातून]
शानू, अविनाश, अफ़लातून, घुघुती बासूती आदि ने मीट को मैथिली जी के ऑफ़िस में रखने की बात की। लोग इतने पर भी तैयार हो गये कि कुर्सियाँ कम पड़ीं तो वो ज़मीन पर दरी बिछाकर बैठ जायेंगे लेकिन हमें कैफ़े काफ़ी डे मुक्ति दीजिए। तुरंत ही मसिजीवी, नीलिमा, सुजाता तेवतिया और आलोचक का पर्दापण हुआ।

अमिताभ त्रिपाठी जी ने पुत्रीरत्न की प्राप्ति पर सबका मुँह मीठा किया तो नीरज शर्मा जी ने नाथद्वारा से लाया हुआ भगवान का प्रसाद बाँटा।

[रचना सिंह, सजीव सारथी, अरूण आरोड़ा, राजेश रोशन, मैथिली, शैलेश भारतवासी, संजय बेंगाणी, काकेश, अमित गुप्ता एवं रंजना भाटिया]
यह तय कर लिया गया कि मैथिली जी के ऑफ़िस चलना उपयुक्त होगा। मगर चर्चा अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि रचना सिंह और सजीव सारथी ने विदा माँग ली। ३ बजे तक सभी लोग मैथिली जी के दफ़्तर पहुँच चुके थे। वहाँ पहुँचने के बाद नीरज दीवान, जगदीश भाटिया और आलोक पुराणिक के चेहरे भी चमके।

सभी ने अपने-अपने तरीके से अपना परिचय दिया। यह भी खुलासा हुआ कि ब्लॉगवाणी के पीछे सारी की सारी मेहनत मैथिली जी के सुपुत्र सिरिल गुप्ता की है।

धीरे-धीरे बातचीत शुरू होने लगी थी। पहला मुद्दा उठाया घुघुती बासूती ने परिचर्चा के संदर्भ में। उनका सवाल अमित गुप्ता से था कि वो किसी भी थ्रेड को कितने समय अंतराल के बाद बंद करते हैं या कैसे निर्णय लिया जाता है कि अब इस थ्रेड को बंद कर दिया जाना चाहिए? अमित ने कहा कि कोई हार्ड एण्ड फ़ास्ट रूल नहीं है।

[रचना सिंह, सजीव सारथी, राजेश रोशन, सृजनशिल्पी, मैथिली, शैलेश भारतवासी, संजय बेंगाणी, अमिताभ त्रिपाठी, अमित गुप्ता (दिख नहीं रहे), रंजना भाटिया एवं सुनीता चोटिया]
यह नियंत्रक और मंदक की अपनी निर्णय क्षमता पर निर्भर करता है। संजय जी ने इस पर एक अच्छा सुझाव दिया कि नियंत्रक को कुछ भी निर्णय लेने से पूर्व उस प्रवर्ग के मंदक से बातचीत करनी चाहिए। राजेश रोशन ने कहा कि किसी भी थ्रेड में हो रही चर्चाओं के नियमों और शर्तों के बाहर होने के बावज़ूद थ्रेड के आरम्भक से कई बार सूचनार्थ निवेदन किया जाना चाहिए।

लोकमंच-प्रमुख अमिताभ त्रिपाठी ने बताया कि उन्हें हिन्दी और अंग्रेज़ी चिट्ठों के स्वरूप में भारी अंतर दिखलाई पड़ता है। अंग्रेज़ी चिट्ठों में इतनी विविधताएँ हैं कि गूगल का न्यूज़ एलर्ट भी किसी ताज़ा ख़बर से जुड़ी १० प्रविष्टियों में २ से ३ ब्लॉग का फ़ीड दिखाता है। हिन्दी-ब्लॉगिंग को अपना स्वरूप बदलना होगा। वैयक्तिक से डिमांड पर उतरना होगा। मसिजीवी ने जोड़ा 'साधुवाद से बाहर आना होगा'।


[अरूण अरोड़ा, आलोक, अमित गुप्ता एवं नीरज दीवान]
चर्चा गंभीर होती तब दिखी जब आलोक पुराणिक ने ब्लॉगिंग के पीछे छिपे मार्केट का कांसेप्ट रखा। उनके अनुसार दुनिया की हर चीज़ मार्केट का पार्ट है। कोई अपना नाम एनजीवो रख लेता है, कोई अपना नाम ट्रस्ट के रूप में तो कोई व्यवसायिक उपक्रम के रूप में अभिव्यक्त करता है लेकिन सभी का उद्देश्य इस मार्केट से कुछ न कुछ कमाना है। कोई आत्म संतुष्टि कमाता है, कोई धन, कोई ऐश्वर्य तो कोई अटेन्शन। हर कोई कुछ न कुछ इस मार्केट से कमा रहा है। मार्केट है तो एंटी-मार्केट का भी अपना मार्केट है। हर कोई अपने-अपने ब्लॉग की , अपने-अपने एग्रीगेटर की दुकान लगाकर बैठा है। जिसका माल बढ़िया होगा, वह बिकेगा।

अमूमन सभी लोग उनकी इस बात से संतुष्ट दिखे लेकिन भूपेन इससे भिन्न मत रखते थे। उन्होंने कहा कि इस मार्केट से भी अलग ब्लॉगिंग के कुछ वेल्यू, कुछ एथिक्स होने चाहिए। मार्केट की संकल्पना के खिलाफ भी लोग हैं। हर जगह इकोनामिक की संकल्पना नहीं रखी जा सकती।


[विजेंद्र विज, संगीता मनराल, जगदीश भाटिया एवं आलोक]
आलोक पुराणिक-"उनका भी अपना मार्केट है। उन्हें भी इसी बाज़ार के माध्यम से आना पड़ेगा। एक है तभी दूसरे का अस्तित्व है।"

मगर इन सबके बीच कुछ गड़बड़ भी हो रही थी। मैथिली जी ने पुराणिक जी के 'दुकान' शब्द को गलत तरीके से ले लिया था, वो भावुक हो गये- "मैं पूरी ज़िंदगी हिन्दी की सेवा में लगा रहा। भारत के ७५% कम्प्यूटर में मेरे द्वारा बनाये गये साफ़्टवेयर चल रहे हैं। मैंने निःशुल्क या कम दाम पर लोगों को दे रखा है, सरकारी संकायों को दे रखा है तो क्या मैंने दुकान लगा रखी है?"

मगर उनका पुत्र सिरिल ने सबको और अपने पिता जी को समझाया कि भावुक होने से कुछ नहीं होता। जिसका प्रोडक्ट अच्छा होगा वो बिकेगा। बस इतनी सी बात है जो आलोक जी कहना चाह रहे हैं। आपका ब्लॉग, आपका काम आपकी अपनी दुकान है, क्या बेचना है, किससे बेचना यह आपके ऊपर है।

[नीरज दीवान एवं आलोचक]
आज ब्लॉगवाणी, नारद या चिट्ठाजगत से बेहतर तरीके से पोस्टों की सूचना देता है चलेगा, नहीं तो नहीं चलेगा। उसके पीछे कब से, किसने कितनी मेहनत की है, इससे किसी को क्या मतलब है।

मसिजीवी जी ने कहा कि 'ब्लॉग पर जो हम लिख रहे हैं वो हमारा रियल एस्टेट है, इसका विस्तार हम जितना करेंगे हमारी सम्पति उतनी बढ़ेगी।

भोजन के पैकेट आ चुके थे। सब लोग खाने-पीने में जुट गये। और उपवर्गों में बातें भी होने लगीं।

भोजन के बीच ही चित्रकार विजेन्द्र विज और उनकी धर्मिणी संगीता मनराल का आना हुआ। उन दोनों ने भी सभी से परिचय किया।

इसके बाद तीन मुख्य बिंदुओं पर बात हुई-

हिन्दी ब्लॉग की रीडरशीप कैसे बढ़ाई जाय
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लगाम कहाँ पर खींचे
हिन्दी ब्लॉगों को कंटेंट और विविधता के दृष्टि से कैसे समृद्ध करें


[रंजना, सुनीता, अरविन्द चतुर्वेदी, अजय यादव एवं नीरज]
आलोक जी ने कहा- "अपने आस-पास के लोगों को, अपने घर के लोगों को ब्लॉगिंग के बारे में बतायें और उन्हें ब्लॉग बनाने के लिए प्रेरित करें।"

संजय बेंगाणी- "हममें से कोई कहीं भी, किसी भी व्यक्ति से मिले, हिन्दी-ब्लॉगिंग के बारे में बताकर उसे इस दुनिया के ग्लैमर से लुभाये"

अमित जी ने कहा कि अपने उन मित्रों से जो कि अंग्रेज़ी में आपसे चैट करते हैं, आप देवनागरी में चैट कीजिए, उसे उत्सुकता होगी, लिंक पकड़ा दीजिए। कुछ दिनों में वो हिन्दी में लिखने लगेगा।

घुघुती बासूती-"अपने या अपने मित्रों के अंग्रेज़ी ब्लॉग पर हिन्दी के ब्लॉग का लिंक या विज्ञापन दीजिए"

राजेश रोशन- " डिजिटल प्वॉन्ट जैसे बड़े फ़ोरम पर अपने हिन्दी चिट्ठों का लिंक दीजिए। हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में जागरूक कीजिए।'


[सृजनशिल्पी, अविनाश, संजय, अफ़लातून एवं अरविन्द]
इस विषय पर मेरे विचार काफ़ी पसंद किये गये। मैंने हिन्द-युग्म का अनुभव बाँटा। "हिन्द-युग्म को जनवरी २००७ में प्रतिदिन ५० हिट्स से अधिक हिट्स नहीं मिलते थे। यह, हमारे प्रचार करने के प्रयासों से फ़रवरी महीने में बढ़कर ८० हुआ, फ़िर १३१, फ़िर २३८, फ़िर ५२१, फ़िर ५२० और इस महीने ७५० पेज़ लोड प्रतिदिन का औसत के हिसाब से हमें पढ़ा जा रहा है। हमारी पूरी टीम ने हिन्द-युग्म को रोज़ की गतिविधियों का प्रचार-प्रसार ऑरकुट की हिन्दी-कम्नीटियों में जाकर किया है। गूगल, याहू ग्रुपों पर हम अपना संदेश चिपकाते रहते हैं। समान अभिरुचि के लोगों को मेल भेजते हैं। अगर मेल ५००० लोगों तक जाता है तो ५० लोग ज़रूर पढ़ने आयेंगे, उसमें से ५ आपके स्थायी पाठक भी बन जायेंगे। और बाद में लेखक और ब्लॉगर भी। हिन्द-युग्म स्वयम् इसी रास्ते से बने ब्लॉगरों का समूह है। मैंने हिन्द-युग्म द्वारा फ़ोन से यूनिप्रशिक्षण के नाम से १-२ दिनों में ऑनलाइन हिन्दी-टंकण और हिन्दी-ब्लॉगिंग पर प्रशिक्षण शुरू करने की बात की। यह कहा कि हम प्रशिक्षुओं से केवल उनका फ़ोन नं॰ लेंगे और अपने खर्च पर हिन्दी-टंकण सीखायेंगे और बदले में नव अंकुरित चिट्ठों (दायें भाग का साइड बार देखें) पर उनकी टिप्पणियाँ चाहेंगे, जिससे दोतरफा लाभ होगा। ब्लॉग के पाठक बढ़ेंगे और लेखक भी।


[शैलेश, सुजाता, नीलिमा, उनका पुत्र, मैथिली एवं आलोक]
मगर अविनाश जी इन तरीकों से ज़्यादा संतुष्ट नहीं दिखाई दिये। उन्होंने कहा कि कंटेंट मेन चीज़ है जिससे आपके स्थाई पाठकों की संख्या बढ़ सकती है। मेल वाला अगर दुकान अच्छी नहीं देखेगा तो दुबारा आना बंद कर देगा।

ब्लॉगिंग पर अवेयरनेस फैलाने पर भी चर्चा हुई। जिसमें मैथिली और अरूण अरोड़ा ने यह बताया कि वो लोग इस सत्र से मसिजीवी और आलोक पुराणिक के साथ मिलकर स्कूलों-कॉलेज़ों में ब्लॉगिंग पर सेमिनार और वर्कशॉप करने जा रहे हैं।

अफ़लातून जी ने कहा कि हम सभी लोग बीबीसी हिन्दी वालों से यह निवेदन करें कि जिस प्रकार बीबीसी की अंग्रेज़ी साइट पर वेबवाइज़ नाम से इंटरनेट, यूआरएल, वेबहोस्टिंग आदि पर सरल ट्यूटोरियल उपलब्ध है, उसी प्रकार का सरल हिन्दी ट्यूटोरियल भी लगायें जिससे नये लेखकों-पाठकों को लाभ हो।

मैंने छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में भी नॉन-ब्लॉगरों से मिलकर ब्लॉगिंग पर अवेयरनेस फैलाने की बात की और अपनी फ़ैज़ाबाद, प्रतापगढ़ और इलाहाबाद मीट का उल्लेख किया।

पहले खाने-पीने का खर्च सभी को अपना-अपना वहन करना था। मगर मैंथिली जी ने कहा कि उन्हें दुःख पहुँचेगा। सिरिल गुप्ता ने निवेदन किया कि इसे सभी लोग मेरी तरफ़ से ब्लॉगवाणी के लॉचिंग की पार्टी समझ लें।


[जगदीश भाटिया एवं नीरज दीवान]
अगला मुद्दा उठा कंटेंट संवर्धन का। नीरज दीवान ने कहा कि विकिपिडिया जैसे सामूहिक प्रयासों द्वारा हिन्दी पर सामग्री इकट्ठी की जा सकती है। बड़े अफसोस की बात है कि हिन्दी के यूज़रों की संख्या मराठी-प्रयोक्ताओं से कहीं ज्यादा है, फ़िर भी मराठी की विकिपिडिया ज्यादा समृद्ध है। अविनाश ने कहा कि आलोचना को स्पेस दीजिए, इससे आपके लिए भी स्पेस बढ़ेगा।

अरविंद चतुर्वेदी और राजेश रोशन ने इस बात का उल्लेख किया कि हिन्दी के पाठकों की संख्या कम नहीं है। बस ब्लॉग के बारे में सूचना का आभाव है। हमें बाज़ार की माँग समझनी होगी।

जगदीश भाटिया ने कहा कि आप चिट्ठे पर कुछ भी २० मिनट के बाद मिलने वाली अटेंशन के लिए मत लिखिए बल्कि २० साल बाद मिलन वाली अटेंशन के लिए लिखिए।

अविनाश ने हिन्दी का समाजशास्त्र समझाकर यह कहा कि जो चल रहा है उसे चलने दो उसकी अपनी गति से।

विजेन्द्र विज जगदीश जी से पूर्णतया सहमत दिखे।

बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी उठी। संजय जी ने कहा कि अब बहुत हो चुका। हमलोगों को बाज़ार वाला और जोगलिखी, नारद और ब्लॉगवाणी से ऊपर उठकर आना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि हिन्दी तरक्की करे। भाईचारे का संदेश लेकर अहमदाबाद से यहाँ तक आया हूँ। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।


[सृजन शिल्पी]
चर्चा संचालन का कार्य सृजनशिल्पी ने सम्हाल रखा था। काफ़ी लोग जा चुके थे। जो १०-१२ लोग बचे थे, उन्होंने यह बात मानी कि आने वाले समय में एग्रीगेटर की कोई भूमिका नहीं रहेगी। ब्लॉगों को तकनीकि मददों या वैज्ञापनिक मददों से पाठक संख्या को बढ़ाना होगा। कौन क्या लिखता है, कौन नहीं, एग्रीगेटर न तय करें। ब्लॉगिंग की मूल संकल्पना ही अपनी-अपनी भड़ास निकालना है। अपने पोस्टों में विविधता लाइए। ऐसा लिखे जो समाज पर, सोच पर, समय पर असर डाले। अंतरजाल पर हिन्दी को समृद्ध करें।

मैं इस रिपोर्ट में शायद १०% बातें भी नहीं कवर कर पाया हूँ। सभी की रिपोर्ट से पूरी बात निकल पायेगी। सभी बधुओं से अनुरोध है कि इससे संबंधित जितने भी पोस्टें आती हैं। उन्हें नीचे स्थाई कड़ियों में जोड़ दें।

[नोट - चित्र अमित गुप्ता, सृजनशिल्पी और मोहिन्दर कुमार के सौजन्य से लगाये गये हैं एवं स्पष्ट रूप से देखने के लिये कृपया इस प्रविष्टी को इंटरनेट एक्सपलोरर में ही देखें]



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41 कविताप्रेमियों का कहना है :

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का कहना है कि -

विस्तृत रिपोर्ट के लिए धन्यवाद। मेरे जैसे जो लोग नहीं जा पाए, उन्हें बैठक के बारे में सब कुछ पता चल गया। दूसरे बंधुओं की रिपोर्ट का भी इंतज़ार रहेगा

रंजू का कहना है कि -

शैलेश जी बहुत ही सुंदर और स्पष्ट तरीक़े से आपने हर बात लिख दी है .इस को पढ़ के जो वहाँ नही थे वो भी साथ ही होने का अनुभव करेंगे ....बहुत सी बाते विचार करने यौग्य थी कल की गेदरिंग में!1

सब से मिल कर बहुत ही अच्छा लगा ...मैथिली जी का बहुत बहुत शुक्रिया उनकी मेहमान नवाज़ी के तो हम कायल हो गये हैं ...:)

Rajesh Roshan का कहना है कि -

सच में बड़ी अच्छा रिपोर्ट लिखी है आपने । चित्रो का इन्तेजार रहेगा.

अरुण का कहना है कि -

जी अच्छा हमे तो पता ही नही चल मैथीली जी के यहा ब्लोगवाणी की दावत खाते खाते हम लोगो ने रिकार्ड तोड दिये.मान गये जी कि दिल्ली के लोग चिरकुट दिखते जरुर है पर है नही..:)

Sanjay Tiwari का कहना है कि -

आंखो-देखा हाल प्रसारित करने के लिए शुक्रिया.

masijeevi का कहना है कि -

शुक्रिया आपकी इस विस्‍तृत रपट केलिए मैं अभी तक रपट लिखने का मन ही नहीं बना पाया हूँ। आपके प्रतिवेदन के आ जाने से और प्रतीक्षा करने का अवसर मिल पाया, शुक्रिया।

Shrish का कहना है कि -

वाह शैलेष भाई, मजा आ गया आपकी विस्तृत रिपोर्ट पढ़कर। हमारे न आ पाने का गम कुछ बढ़ भी गया कि काश इतनी रुचिकर बातचीत में हम वहाँ शामिल होते। साथ ही आपसे सब ब्यौरा पाकर थोड़ी राहत भी मिली।

मगर इन सबके बीच कुछ गड़बड़ भी हो रही थी। मैथिली जी ने पुराणिक जी के 'दुकान' शब्द को गलत तरीके से ले लिया था, वो भावुक हो गये- "मैं पूरी ज़िंदगी हिन्दी की सेवा में लगा रहा। भारत के ७५% कम्प्यूटर में मेरे द्वारा बनाये गये साफ़्टवेयर चल रहे हैं। मैंने निःशुल्क या कम दाम पर लोगों को दे रखा है, सरकारी संकायों को दे रखा है तो क्या मैंने दुकान लगा रखी है?"

मैथिली जी, आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि आपकी सेवाभावना पर किसी को शक है। औरों का तो पता नहीं लेकिन हमारे शहर में हर जगह डीटीपी वर्क के लिए आपके कृतिदेव फॉन्ट का ही उपयोग होता है।

Rajesh Roshan का कहना है कि -

फोटो तो आपने दाल दिया लेकिन इसका नामकरण करने की जरुरत महसूस हो रही है साथ ही अन्य चित्रो को भी डाल दे। या फिर मुझे मेल कर दे। मैं फोटो की एक पोस्ट अलग से बना दूंगा

shanoo का कहना है कि -

शैलेश बहुत अच्छा लगा पढ़कर... तुम्हारी रिपोर्ट तो आ गई मगर हम ये सोच रहे है कि आखिर मैथिली जी का शुक्रिया अदा कैसे किया जाये...बस यही दुआ करते है वो दिन-प्रतिदिन प्रगती करें...

सुनीता(शानू)

उन्मुक्त का कहना है कि -

अरे मैं तो ममता जी की चिट्ठी पढ़ कर समझा कि बैठक नहीं हुई। यह चिट्ठी पढ़ कर अच्छा लगा। हिन्दी बढ़गी ऐसा विश्वास है।

Amit का कहना है कि -

लिखा तो सही है, अभी तक की विस्तृत रिपोर्ट यही है कदाचित्‌, तो इसलिए मसिजीवी जी के विरोध के बावजूद, साधूवाद!! ;)

और जिन लोगों के द्वारा ली गई तस्वीरें लगाई हैं कम से कम "साभार" उनका नाम/ब्लॉग-पता वगैरह भी लिख दिया करो, इंटरनेटिया शिष्टाचार होता है। और यदि आप मेरी द्वारा ली गई तस्वीरों में ऐसा नहीं करते हैं तो आप मेरी तस्वीरों के लाइसेन्स का उल्लंघन कर रहे हैं जिनको प्रयोग करने की एक शर्त यह भी है कि आप जहाँ भी प्रयोग करें वहाँ मेरा नाम/वेबसाइट बता जायज़ क्रेडिट दें। साथ ही आपसे निवेदन है कि फोटो को कॉपी कर अपने यहाँ अपलोड करने से बेहतर है कि फ्लिकर से ही सीधा हॉटलिन्क कर लो, फ्लिकर करने देता है, इसी बात के उसको पैसे देता हूँ। इसके क्या लाभ हैं वो भी जल्दी ही बताउँगा।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अमित जी,

मैं उस समय पोस्ट अपडेट ही कर रहा था, इसलिए एक-एक करके फ़ोटो लगा रहा ता। मैंने अब चित्रों के मालिकों को धन्यवाद लिख दिया है। मैं आपके चित्र फ़्लिकर से ही लेना चाह रहा था, लेकिन तकनीकी अज्ञानमता के कारण नहीं इस्तेमाल कर पा रहा था, इसलिए मैंने उसे फ़ोटोंबकेट में डाल दिया। क्षमाप्रार्थी हूँ।

Jitendra Chaudhary का कहना है कि -

Bahut achha coverage,

Fir se maafi chahoonga ki main vyaktigat vyastatao ke chalte, Kanpur mein hi rookna pada aur main is meet ka hissa nahi ban saka.

is blogger meet ke liye sabhi ko bahut bahut dhanyavad.

Amit का कहना है कि -

मैंने अब चित्रों के मालिकों को धन्यवाद लिख दिया है। मैं आपके चित्र फ़्लिकर से ही लेना चाह रहा था, लेकिन तकनीकी अज्ञानमता के कारण नहीं इस्तेमाल कर पा रहा था, इसलिए मैंने उसे फ़ोटोंबकेट में डाल दिया। क्षमाप्रार्थी हूँ।

ठीक है, कोई बात नहीं, मैंने सोचा कि याद दिला दूँ, कहीं भूल न जाओ!! रही बात अज्ञानता की तो उसे जब तक (किसी से पूछ के या कहीं पढ़ के)दूर करने की कोशिश नहीं करोगे वो कभी नहीं जाएगी। :)

वैसे ऊपर से आठवें फोटो के शीर्षक में नीरज दादा के नाम को गलत(नीरजह) लिख गए हो, ठीक कर लो।

Hindi Blogger का कहना है कि -

विस्तृत और सचित्र ब्यौरे के लिए धन्यवाद! कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह की महाबैठकों से नेट पर हिंदी को उसकी जगह दिलाने के प्रयासों को बल मिलता है. और इतनी सारी तस्वीरें डाल कर आपने कुछ ही घंटे पहले बने फ़ुरसतिया के रिकॉर्ड को चकनाचूर कर दिया!

Manish का कहना है कि -

बहुत बढ़िया विवरण !

Sanjeet Tripathi का कहना है कि -

शुक्रिया इस विस्तृत जानकारी को यहां उपलब्ध करवाने के लिए!

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

बहुत अच्छा विवरण लिखा है आपने शैलेश जी.. शायद ही कोई और ऐसा लिख पाये.. मेरे पास करीब २० फोटो हैँ इस मीट के लेकिन कुछ मिलते जुलते है और कुछ को आप्पति थी कि उनका फोटो ना छापा जाये इस लिये नही दिये गये. फोटोग्राफर बनने का सबसे बड मुल्य यह चुकाना पडता है कि आप का अपना कोई फोटो नही होता... अगर किसी मित्र के पास इस मीट के दोरान खीँचा गया मेरा चित्र हो त उसे अपलोड कर देँ या मुझे ईमेल कर देँ ताकि मुझे लगे कि मैँ भी वहाँ था :)

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

धन्यवाद शैलेशजी,

ब्लॉगर भेंटवार्ता को आपने बहुत ही खूबसूरती से कवर किया है, मैं इस भेंटवर्ता में उपस्थित न हो सका, इसका बेहद दुख है।

निश्चय ही इस प्रकार की भेंटवार्ता से आपसी स्नेह बढ़ता है एवं अंतरजाल पर हिन्दी की समृद्धि के लिये भी सामूहिक वार्ता से अच्छे नतिजे आते है।

जानकारी देने के लिये धन्यवाद!

mahashakti का कहना है कि -

अब तक की सर्व श्रेष्‍ठ स्‍मृति आधारित पोंस्‍ट, पढ़कर अच्‍छा लगा।

ऐसा लगा ही नही कि हम नही शामिल थें।

आर्य मनु का कहना है कि -

स्वयं उपस्थित ना था, ऐसा बिल्कुल भी महसूस नही हुआ ।
जिन महाशयों के सिर्फ नाम पढा करतें है, उन्हे देखकर अच्छा लगा ।
चर्चा सार्थक रही, इससे बेहतर और क्या हो सकता है ।
आप सभी का साधुवाद, जो हिन्दी को अनन्त ऊँचाईयों तक ले जाना चाहते है ।

आर्यमनु

जगदीश भाटिया का कहना है कि -

बहुत ही अच्छे तरीके से लिखी विस्तृत रिपोर्ट।
पढ़ कर अच्छा लगा ।

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi का कहना है कि -

वाह भाई वाह!!!
अनायास यही मुंह से निकला रिपोर्ट पढ्कर.
विस्तृत, वास्तविक,तथ्यपूर्ण जानकारी के साथ साथ चित्र तो सोने पर सुहागा.
जो लोग पहुंच नही पाये ,वो भी इस रिपोर्ट् को पढ्कर महसूस करेंगे कि वो भी वहां थे.,
भारतीयम्

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

मीटिंग की जानकारी तॊ बहुत ही रॊमाचंक ढंग से प्रस्तुत की गई है। सभा में हुई चर्चाऒं के विषय पंसद आए। वैसे मेरा मानना है कि नए ब्लॉगरॊं कॊ लाने के साथ साथ इस बात का भी विशेष ध्यान रखा जाए कि नए ब्लागर आ रहे हैं उन्हे भरपूर समर्थन मिले एवं उनकी रचनाऒं पर टिप्पणियां करने से ना कतराया जाए।

वैसे आदरणीय शैलेष जी, आज की कविता कहां है?

Debashish का कहना है कि -

बेहद विस्तृत रपट। हिन्दी चिट्ठाजगत कि ये बढ़ती सामाजिकता स्वस्थ चिट्ठाकारी को भी जन्म देगी मुझे पूरा यकीन है. जब आप व्यक्तिगत रू से भी मेल मिलाप रखते हैं तो न केवल सामने वाले का लेखन अधिक समझ आने लगता है बल्कि हमें अपने लेखन में भी संयम बरतना आ जाता है। ये गलत कयास नहीं कि आनेवाले दिनों में नारद वारद की बहसें बेमानी हो जायेंगी।

Ravi Mishra का कहना है कि -

Thanks for the update, and also thanks to those who enabled it to happen.

I think for future such meetings, one person should just jot down the points being raised, and related short discussions, without any censorship.

And to further maintain contacts and communication, we should have a Google or yahoo moderated group just to promote hindi blogging and its techniques, and it will ensure broader participation. Physical meeting is costly and difficult to bring everyone together.

अनामदास का कहना है कि -

भाई, साफ़ दिख रहा है कि कितनी मेहनत की गई है, मीटिंग के नोट्स लिए गए और उन्हें तरतीब से लिखा गया. मेरा आभार स्वीकार करें, सभी लोगों से मुलाक़ात कराने के लिए. बनारस से अफ़लातून और अहमदाबाद से संजय जी का आना दिखाता है कि लोग ब्लॉगिंग को लेकर कितने पैशनेट हैं. तीस की संख्या बहुत होती है, ये तीस सक्रिय लोग हैं जो तीस लाख के बराबर हैं. जितनी विविधता से लिखने वाले लोगों का समूह था, आलोक पुराणिक, अविनाश से लेकर रंजना जी, शानू जी और संजय बेंगाणी जी तक...क्या बात है. बहुत मज़ा आया होगा आप सब लोगों को. मैथिली जी के आभारी आप लोग ही नहीं, मैं भी हूँ. आनंद आया, पूरा पढ़ गया, लंबा था, लेकिन लगा नहीं.

अनूप शुक्ला का कहना है कि -

बहुत अच्छी रपट। इतने विस्तार से लिखा और फोटो लगाये कि लगा हम स्वयं वहां शामिल थे।
मिलने-जुलने से ब्लागरों की आपसी आभासी गलतफ़हमियां दूर होंगी। यह मीटिंग और इस तरह की रिपोर्टिंग इसमें सहयोगी है। बधाई!

mamta का कहना है कि -

बहुत ही विस्तार से अपने लिखा है और पूरी जानकारी देने का और फोटो का शुक्रिया। पर एक बात हमे समझ नही आयी की जो लोग फोटो मे नही है उनका नाम भी है जैसे ऊपर एक फोटो मे जिसमे रंजना जी और सुनीता जी है उसमे तो और भी तीन नाम है पर वो लोग अदृश्य है.और एक फोटो मे नीरज दीवान और आलोचक लिखा है उसमे कौन नीरज है और कौन आलोचक !!!

संजय बेंगाणी का कहना है कि -

अच्छा विवरण. बहुत सुन्दर.
मैं थोड़ी दूर से आया था, आज ही सब पढ़ पा रहा हूँ, अपने हिस्से का लिखना बाकि है, उसे भी पूरा करना है :)

Vijendra S. Vij का कहना है कि -

शैलेश जी अच्छी रपट तैयार की है..देर से पहुचने क जो मलाल था दूर हो गया..सभी के विचारो से रूबरू हो गये.
धन्यवाद..

Kavi Kulwant का कहना है कि -

हिंदयुग्म के कार्य सरहनीय हैं। भविष्य उज्जवल है।
प्रयाससार्थक एवं प्रशंसनीय हैं। मेरी शुभकामनाएं..
कवि कुलवंत

कुमार आशीष का कहना है कि -

एक बेहद खूबसूरत रपट.. चित्रों से सजी सजायी। शैलेश जी मेरी बधाई स्‍वीकारें आप। आलोक पुराणिक व्‍यंग्‍य में बोल रहे होंगे..वरना हम लोग तराजू-बट्टा ढोने वालों में से थोड़े ही हैं।

नीरज शर्मा का कहना है कि -

एकप्क्षीय सकारत्मक कवरेज अच्छा रहा ! पृष्ठ सज्जा एव फोटो संकलन भी अच्छा है वैसे सामुहिक फोटो ज्यादा उपयोगी होता फोटो ही दर्शाने के लिये पर्यप्त है कि ना तो सभा स्थल एक रहा ना ही उसमें सम्मिलित होने वाले समय के पाबन्द रहे! बेहतर यही होगा कि इन फोटो को हटा दिया जाये! देरी मुझे भी हुई थी आने मे पर उसकी वजह बारिश और नाथद्वारा से देहली की की दूरी थी बस से पहुँचते पहुँचते ही देरी हो गई पर यह देख कर सन्तोष हो गया था की स्थानीय साथी और आयोजक तो हमसे भी लेट लतीफ़ निकले

यह जानकर भी खुशी हुई कि मीटिंग भी सानन्द सम्पन्न हुई वाक युद्ध भी थोडा बहुत हुआ पर व्यक्तिगत टीका टिप्पणियों से बचा जाना चाहिये हाँ आप किसी कमी की और ध्यान दिलाते है तो यह सकारात्मक पहलू है और आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है सार संग्रह भी प्रकाशित कर दिया जाता तो उपयुक्त होता !

मेरा अवतरण तो सुनीताजी एवं पवन जी की वजह से हो गया वरना मुझे इस मिटिंग की जानकारी ही नही थी वैसे मै बिना लाग लपेट कर कहना चहुँगा कि आप ऎसे ही १०.३० बजे से बुलाकर २.३० तक वक्त की फ़िजूल खर्ची करते हैं तो मुझे नहीं लगता है कि दूर दराज से आने वाले अपनी निरन्तरता बनाये रख पायेंगे

अजय यादव का कहना है कि -

शैलेष जी, मानना होगा आप रिपोर्टिंग अच्छी कर लेते हैं. बधाई.

Sagar Chand Nahar का कहना है कि -

सबने बहुत कुछ लिख दिया , लेट लतीफ होने का यह नुकसान में अक्सर भुगतता हूँ जो मैं कहना चाहता हूं कोई और कह देता है और मेरे पास शाब्द ही नहीं बचते।
बहुत बढ़िया वर्णन, बधाई

Srijan Shilpi का कहना है कि -

बढ़िया रपट, इतनी मेहनत करने के लिए साधुवाद! :)

समय मिला तो बैठक में हुई चर्चा के बारे में अभी तो नहीं, लेकिन जल्द ही किसी अन्य उपयुक्त संदर्भ में मैं भी लिखने की कोशिश करूंगा।

Udan Tashtari का कहना है कि -

बढ़िया विस्तृत रपट पढ़कर मजा आ गया. बहुत खूब विस्तार से लिखा है, आभार. चित्र भी बढ़िया आये हैं.

Aflatoon का कहना है कि -

शैलेश , मैंने का जिक्र किया था ।

कमल शर्मा का कहना है कि -

सृजन शिल्‍पी जी ने मुझे भी कहा था कि आप भी आ जाएं मुंबई से इस मीट में लेकिन कुछ कारणों से इस ब्‍लॉगर मीट में आना न हो सका। लेकिन आपकी विस्‍तृत रिपोर्ट पढ़कर वहां उपस्थिति का अहसास हुआ। इस मीट में अनेक बातें ऐसी उभरी कि उन पर सभी ब्‍लॉगरों को अमल करना चाहिए। अगली ब्‍लॉगर मीट में आने की लालसा रहेगी क्‍योकि आपने जिस तरह से रिपोर्ट लिखी है वह अगली मीट में आने के लिए आमंत्रित कर रही है।

Kajal Kumar का कहना है कि -

अच्छा लगा जाकर लेकिन पहले से पता ही नहीं चला था इस मीट के बारे में तो...

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