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Tuesday, June 19, 2007

टंकार


प्रत्येक व्यक्ति का जीवन के प्रति सोचने का एक अलग ढंग होता है.. कभी-कभी किसी की उपलब्धि हमें बहुत बड़ी लगती है परन्तु क्या सचमुच ऐसा होता है ? .. इन्हीं विचारों से नीचे लिखी पंक्तियों का जन्म हुआ है

फ़िर कभी लौटें न लौटें, कौन जाने
उड़ गये जो पखेरू, नीड़ कर विराने
दाना पानी ढूँढना है डाली-डाली विचर
नीले नभ की चाह में कैसी उड़ाने

हर स्वप्न का मूल्य पड़ता है चुकाना
जाना जब चला मैं इस धरा को नापने
ताप इस अंबर में है कितना अधिक
बाज के पंजे में बया देख, लगा कांपने

बांस पर चढ कर भूला मैं अपनी ऊँचाई
एक झोंके, एक लचक से याद आई
आदमी हो जाये चाहे कितना बड़ा भी
है टिका कर धरा पर पांव रखने में भलाई

पूछने है सूर्य को भी कुछ प्रश्न अपने आप से
क्या नियती से बढ़ कर ज़्यादा उसने किया है
डूबता उतरता रहा है जगत के शैशव काल से
क्या अस्त होता है लाल होकर इसी संताप से

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

11 कविताप्रेमियों का कहना है :

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

कविता की लय तॊ सराहनीय है परन्तु भाव अस्पष्ट हैं। असंमजस में हूं कि आप क्या कहना चाहते हैं।

"फ़िर कभी लौटें न लौटें, कौन जाने
उड़ गये जो पखेरू, नीड़ कर विराने
दाना पानी ढूँढना है डाली-डाली विचर
नीले नभ की चाह में कैसी उड़ाने

हर स्वप्न का मूल्य पड़ता है चुकाना
जाना जब चला मैं इस धरा को नापने
ताप इस अंबर में है कितना अधिक
बाज के पंजे में बया देख, लगा कांपने"
यहां तक एसा लगता हे मानॊ आप कह रहे हॊं कि सफलता प्राप्त नहीं कर पाऒगे इसलिए शांत रहॊ।
इसके बाद जरूर घमडं से दूर रहने की सलाह है।

......या फिर एसा हॊ सकता है कि मेरी अल्पविकसित बुद्धि कविता का अर्थ लगाने में असमर्थ रही हॊ।

sunita (shanoo) का कहना है कि -

मोहिन्दर जी क्या गज़ब के प्रश्न किये है आपने और सत्य भी है...जो प्रवासी अपना घर एक बार छोड़ गये है कहाँ वापिस आये है...दाना-पानी तो अपने घर में भी कमाया जा सकता था..अपने घर को विरान करके जाने कि क्या आवशयक्ता थी...

बाज के पंजे में बया देख, लगा कांपने

एसे बाज़ तो आकाश क्या धरती पर भी बहुत है जो आगे बढ़ने मे बाधक है...

बांस पर चढ कर भूला मैं अपनी ऊँचाई
एक झोंके, एक लचक से याद आई
आदमी हो जाये चाहे कितना बड़ा भी
है टिका कर धरा पर पांव रखने में भलाई
हाँ इस बात में गहरी सच्चाई है...मगर मानव एक प्रगती-शील प्राणी है धरती पर पाँव तो टिका ही नही सकता। अगर हम ये सोच कर कि उपर उड़्कर गिर जायेंगे उड़ेंगे ही नही आगे बढेंगे ही नही तो धरती पर(जहाँ से चले है वही) पड़े रहेंगे ही

रचना बहुत गम्भीर है जरा हमे भी समझाईये आपको क्या संताप है क्यूँ एसी मर्म-स्पर्शी रचना की है आपने...सूरज का जो काम है वही करता है मगर इश्वर ने इन्सान को बहुत ज्ञान का भंडार दिया है..और आप जानते है यदी वो चुप-चाप बैठा ही रहेगा तो खाली दिमाग शैतान का हो जायेगा...
उड़ने दिजिये उसे..फ़िर गिरेगा...फ़िर उड़ेगा...कभी तो मन्जिल पा ही लेगा...
जरा स्पष्ट किजिये क्या कहना चाहते है..रचना दिल को बहुत गहरा छू गई है...एसा लगता है कवि मन आज व्याकुल बहुत है...

ज्यादा लिख दिया हो तो माफ़ी चाहती हूँ

सुनीता(शानू)

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सुनील जी, शानू जी,

आप मेरी कविता के भाव नहीं पकड पाये इसके लिये शायद मेरी कमी ही बजह हो सकती है.

मनुष्य परिन्दों को उडते देख कर सोचता है कि काश मेरे भी पंख होते तो मैं इस नीले आसमान में उडता.. परन्तु क्या वो जानता है कि पक्षी दाना दाना चुगने के लिये उडान भरते है..नीले आसमान से उनका कुछ लेना देना नही होता

जितनी मुशकिले जमीन पर हैं उतनी ही आसमान में भी हैं.. ये कहती है बाज और बया की कहानी..

कभी कभी आदमी बडा बन कर भूल जाता है कि उसकी क्या जिम्मेदारी है .. अहंकार वश कभी कभी धूल भी चाटनी पडती है.

हमे सूर्य की विशालता का बोध है, उसके कार्यों का भी बोध है.. मगर क्या सूर्य भी वही समझता है जो हम समझ रहे हैं.. शायद उसे लगता हो उसने उदय अस्त होने के सिवा कुछ नहीं किया.

manya का कहना है कि -

Bahut khoob likhaa hai aapne.. rachna padhen se mann kai sawaal karne agta h khud se... khus ko jaanane ki wyakultaa saaf jhalakti hai shabdon mein.. manushay kitni bhee unchaai par pahunch jaye use jadon ko hamesha yaad rakhan chahiye.. kyunki astitwa jadon se juda hota hai... jahan jaden ho wahan sirf satya hota hai.. insaan agar jadon ko yaad rakhe to apna yathaarth kabhi nahi bhoolta.... aur aapki kawita ye bhi batati hai ki... apne sapno ko poora karne mein.. lakshay ko paane mein hum kya chhodte khote ja rahe hain .. kya hamne us par kabhi socha.. sach hai tarakki ki daud mein jane ky akuch hchut gaya.. jo kabhi na lautega.. saamne wale ko hamesha lagta h ki doosra bahut aage badh gaya.. usne bahut paa liya.. par us doosre bhi se poochho kya use bhi lagta hai ki usne kuch paaya h ya nahi?.... itni khoobsurat rachna ka behad shukriya..

Regards
Manya

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

मोहिन्दर जी..
आपकी कवितायें आपके अनुभवों का निचोड हैं, प्रेरक हैं, प्रश्न करती हैं और मार्गदर्शन भी। यह कविता तो मुझे अपने आप से जुडी हुई महसूस हुई।

दाना पानी ढूँढना है डाली-डाली विचर
नीले नभ की चाह में कैसी उड़ाने

बाज के पंजे में बया देख, लगा कांपने

आदमी हो जाये चाहे कितना बड़ा भी
है टिका कर धरा पर पांव रखने में भलाई

डूबता उतरता रहा है जगत के शैशव काल से
क्या अस्त होता है लाल होकर इसी संताप से

गंभीर चिंतन का विषय है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Gaurav Shukla का कहना है कि -

मोहिन्दर जी,गंभीर प्रश्न किये हैं आपने

सीख भी देती है
"बांस पर चढ कर भूला मैं अपनी ऊँचाई
एक झोंके, एक लचक से याद आई
आदमी हो जाये चाहे कितना बड़ा भी
है टिका कर धरा पर पांव रखने में भलाई"

सुन्दर

सस्नेह
गौरव शुक्ल

कुमार आशीष का कहना है कि -

मन का बाज उड़ा जाता है
चोंच में भर कर मन के पंख...
मन के आंगन..
मन की चिडि़या
रोती है.. बेदीना है

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' का कहना है कि -

मोहिन्दर जी मंगलवार शायद युग्म पर सबसे ज्यादा टी आर पी वालादिन रहता होगा। आपके अनुभवों से लसी बँधी मीठी कविता तो राजीव जी की तडपती रचना, मिलकर युग्म मालामाल हो जाता है।
बधाई।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अगर मैं इसे एक आध्यात्मिक कविता कहूँ तो शायद गलत नहीं होगा। सांसारिक चीज़ों की विनाशता और उम्र के एक पड़ाव पर आने पर व्यक्ति को इनकी निर्थकता के भान होने का संज्ञान को काव्य-रूप में पढ़कर अच्छा लगा। यह भी तय है कि इस कविता की विषयवस्तु विशिष्ट नहीं है, फ़िर भी कलात्मकता की कोई कमी नहीं है। क्योंकि सूरज की जो नियति है , हो सकता है उसे आपने अपनी अनुभूति से जाना हो , मगर बच्चों को भी कोई न कोई बता ही देता है। कुछ अन्य बातों को भी आधार बनाइए जो आपके पास हों और हम जैसे अबोध लोगों को पता न हों।

रंजू का कहना है कि -

बहुत ज़्यादा तो आपकी बात नही समझ पाई ..पर जितना समझा अच्छा लगा पढ़ना ..:)

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

मोहिन्दरजी,

कविता को चार बार पढ़ा, समझ नहीं आई...फिर आपकी टिप्पणी पढ़ी...फिर कविता...फिर टिप्पणी, समझ आयी...फिर कविता को पुन: छ: बार पढ़ा...मजा आया।

जीवन का गुढ़ ज्ञान भी आपने गुढ़ता से दिया है, आपके अनुभव हमारें काम आयेंगे, बांटते रहियेगा...

एक अच्छी कविता के लिये आपको बधाई!!!

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