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Saturday, June 23, 2007

सात समंदर पार से आई एक कविता


प्रतियोगी कविताओं के प्रकाशन की कड़ी में आज पढ़िए शिकागो में निवास कर रहीं श्रीमती प्रिया सुदरानिया की कविता 'लौट आऊँगा' । प्रथम चरण के निर्णयानुसार यह कविता तीसरे स्थान पर थी, मगर दूसरे चरण के ज़ज़ों का मत जब शामिल किया गया तो यह छः स्थान नीचे खिसक गई। जो भी हो हम अब हम इसे आपकी नज़र कर रहे हैं।

कविता- लौट आऊँगा

मेरी यादों में खोए हरपल रस्ता देखते नयन,
मेरे लौट आने की खुशी को महसूस करते नयन,
अब शायद थकने लगे हैं,
पर आस के मोती फिर भी जड़े हैं।
माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।


गुड्डू, शायद तब बड़ी हो जाएगी,
तुम्हारे एहसासो को मन में पिरोने लगेगी,
बातों में उसके मेरा इंतज़ार होगा,
और मन थोड़ा बेकरार होगा।
माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।


मुन्ना, फर्राटे से बोलने लगेगा,
तुम्हारी पीड़ा को अपने शब्द देने लगेगा,
तुतलाती ज़ुबां भी "चाचा" बोलेगी,
व्यक्तिगत अनुभूति उसे भी खलेगी।
माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।


पापा, अब महिनों का हिसाब रखते होंगे,
मैं कब लौटूगा यह सोचते होंगे,
पर मुखिया होने के एहसास के कारण,
दिखावे की सहनशीलता का कर लेते होंगे वरण।
माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।


भैय्या, जिम्मेदारियों के एहसासो को निभाने में,
मेरी अनुपसस्थिति को करते होंगे महसूस,
अकेले में ,तन्हाई में, और कभी कठिनाई में,
हौसले और साथ के लिए मुझे खोजते होंगे।
माँ,किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।


तेरे नयनों की ठंडक बन,
गुड्डू के इंतज़ार फल बन,
मुन्ना के चाचा की अभिव्यक्ति बन,
पापा के हिसाबों का जवाब बन,
भैय्या का बिछड़ा साथ बन,
मैं जरूर लौट आऊँगा।
माँ,किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।

कवयित्री- प्रिया सुदरानिया

प्रथम चरण में कविता को मिले अंक- ७॰७५, ७॰५, ७, ९॰५, ७
औसत अंक- ७॰७५
दूसरे चरण में कविता को मिले अंक- ६, ६॰५, ८, ७॰७५ (पिछले अंक का औसत)
औसत अंक-७॰०६२५

पुरस्कार- डॉ॰ कुमार विश्वास की पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

mahashakti का कहना है कि -

बहुत अच्‍छी कविता है प्रिया जी, चाहे कविता तीसरे पर हो य चौथे पर कविता तभी अच्‍छी होती है जब पाठक के मन को भाऐ।

पारिवारिक प्रेम को दर्शाती सच्‍चे अर्थो में एक सम्पूर्ण भारतीय कविता।
खास कर पिता के प्रति कही निम्‍न पक्तिंयॉं काफी अच्‍छी लगी।

पापा, अब महिनों का हिसाब रखते होंगे,
मैं कब लौटूगा यह सोचते होंगे,
पर मुखिया होने के एहसास के कारण,
दिखावे की सहनशीलता का कर लेते होंगे वरण।
माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।

खास कर अन्तिम पक्तिं में सभी सदस्‍यों को एक साथ जोडा है और कहा कि मै आऊँगा किन्‍तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा। यह दर्शाता है कि वह व्‍यक्ति अपने काम को भी काफी महत्‍व देता है।

बहुत सुन्‍दर रचना

रंजू का कहना है कि -

जो भाव आपने लिखे हैं वो दिल को छूते हैं ....पढ़ के अच्छा लगा ...

आर्य मनु का कहना है कि -

अनिवासी भारतीयों के दर्द को बयाँ करती सशक्त प्रस्तुति,
दूर रहकर अपनो की याद सताती है, इसका सुन्दर प्रस्तुतिकरण ।
कहीं कहीं थोडी थोडी कमियां झलकती है ।
फिर भी पूर्णरुपेण काव्यसाधना अच्छी बन पडी है ।

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

प्रियाजी,

हिन्दुस्तान से दूर होते हुए भी आप हिन्दी से जुड़ी है, देखकर अच्छा लगा। आपकी कविता में प्रवासी मन की पीड़ा झलक रही है...

गुड्डू, शायद तब बड़ी हो जाएगी...
मुन्ना, फर्राटे से बोलने लगेगा....

साधारण जीवन के भावों को बिना लागलपेट से आपने जैसे प्रस्तुत किया है, कविता की सुन्दरता स्वत: बढ़ गई है।

बधाई!!!

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

प्रिया जी,
कविता का विषय निश्चय ही उत्तम है और आरंभ भी बहुत अच्छा है पर पूरी कविता उस प्रवाह में बंध नहीं पाई है। कभी कभी बीच में कविता अपने चरम पर पहुंच जाती है पर फिर अगले शब्द उस परम्परा का निर्वहन नहीं कर पाते।
अकेले में, तन्हाई में..दोनों ही समानार्थी हैं, यह प्रयोग बुरा लग रहा है।
लेकिन कविता का शीर्षक बहुत प्रभावी है और जब भी यह पंक्ति आती है कि माँ, किंतु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूंगा...मन बहुत भावुक हो जाता है।
आपमें बहुत क्षमताएं हैं और मैं आशा करता हूं कि एक कसी हुई कविता मुझे पढ़ने को मिलेगी।

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

देश चलॊ देश मांगता है कुर्बानियाँ एक जमाना था जब यह पंक्तियां कही जाती थी परन्तु अब तॊ सात समुन्दर पार से भी हिन्दी और हिन्दुस्तान की सेवा आप कर रहे हैं... कविता सुन्दर है।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

सच में जब-जब यह पढ़ता हूँ 'माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा' पूरी तरह से भावुक हो जाता हूँ। कविता को शिल्प ज़रूर थोड़ा कमज़ोर हो पर कविता मन को रुलाने में सक्षम है, अपने से जोड़ने में सक्षम है। प्रिया जी इतनी सुंदर रचना भेजने के लिए धन्यवाद। आपसे गुजारिश करूँगा आप आगे भी प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रतियोगिता में चार चाँद लगायें।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

प्रिया जी,
मैं इसे एक भावुल कर देने वाली प्रस्तुति कहूँगा। आपकी संप्रेषणीयता लाजवाब है।

"माँ, किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।"

यह वाक्य स्वयं में पूरी पीडा को दर्शा रहा है। कविता का अंत मर्मस्पर्शी है:

"तेरे नयनों की ठंडक बन,
गुड्डू के इंतज़ार फल बन,
मुन्ना के चाचा की अभिव्यक्ति बन,
पापा के हिसाबों का जवाब बन,
भैय्या का बिछड़ा साथ बन,
मैं जरूर लौट आऊँगा।
माँ,किन्तु मैं अबके बरस नहीं लौट सकूँगा।"

बहुत बधाई आपको।

*** राजीव रंजन प्रसाद

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