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Thursday, June 28, 2007

सड़क, आदमी और आसमानः काव्य-पल्लवन-चतुर्थ अंक


काव्य-पल्लवन के जून-अंक में मात्र ५ कविताएँ हैं। चूँकि गर्मियों में कवि भी सैलानी बन जाते हैं, शायद इसीलिए काव्य-पल्लवन के लिए कविता लिखने का समय नहीं निकाल पाये। आज जून माह का अंतिम वृहस्पतिवार है, यानी काव्य-पल्लवन का दिन, मगर हमारी पेंटर स्मिता तिवारी का इंटरनेट कनैक्शन पिछले ५-६ दिनों से ख़राब है, पेंटिंगें बनी पड़ी हैं, लेकिन चूँकि हम इंटरनेट पर आश्रित हैं, इसलिए हमारे पास उनकी पेंटिंगें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। जब पेंटिंगें आ जायेगी तो इस अंक को उनकी पेंटिंगों के साथ पुनर्प्रकाशित कर दिया जायेगा।



काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन






विषय - सड़क, आदमी और आसमान


विषय-चयन - आलोक शंकर


अंक - चतुर्थ


माह - जून 2007






वह सड़क का आदमी-
जमीनी ख़्वाब पालता है,
गरीब है-
परंतु नसीब को कोसता नहीं,
अपनी जिंदगी को,
अपनी साँसों को,
जलते तलवे की गर्माहट देता है,
अपनी जीजिविषा को
अपने पसीने से ताज़ा करता है,
बड़ा कद्दावर है वह-
अस्तित्व की अहमियत जानता है,
मेहनती है-
परंतु यथार्थ की चादर से बाहर
कद नहीं रखता।
वह सड़क का आदमी-
समझदार है,
आसमान का भ्रम जानता है।

और वह आदमी,
जो सड़क को भूल चुका है-
हवा में रहता है,
दरीचों से अपनी ऊँचाई भांपता है,
सड़क के आदमी की
परछाई से भी बचता है,
खुद में ही सड़क का एक टुकड़ा है-
उस सड़क का,
जो आदमियों से बनी है।
कुछ आदमी
उस सड़क पर चढ़,
आसमानी हो जाते हैं-
परंतु आसमान किसका हुआ है,
फिर आसमान के नीचे
एक और सड़क बनती है-
सड़क से उठ चुके,
उस जैसे ही इंसानों की।
सड़क-दर-सड़क,
इंसान-दर-इंसान,
आसमान की तृष्णा जवां होती जाती है।
और वह आदमी,
जो नासमझ है-
सड़क को जान नहीं पाता।

-विश्व दीपक 'तन्हा'




खाली सड़क पर

बड़ी दूर से एक पत्थर को मारता हुआ ठोकर
सोचता रहा कि आसमान में सूराख
क्या रोशनी की नदी धरती पर उतार देगा?

अपने बौनेपन को उँट की टाँगों के पैमाने से नापा
पहाड़ मुझे देख कर मुस्कुराता रहा
जिसकी फुनगी पर आसमान टंगा था
आसमान में डैने फैला कर उड़ती हुई चील
गोरैया हुई जाती थी
मैनें अपनी कल्पना को उसके पंखों में बाँध दिया
फिर अपनी तलाश की
तो चींटी की तरह रेंगता मिला

आसमान से देखो तो आदमी कीड़े नज़र आते हैं
मैनें मुस्कुरा कर तबीयत से पत्थर उछाला
" छपाक " आवाज़ आयी दो पल बाद...
और मेरे पाँव सड़क पर बढ़ने लगे।

*** राजीव रंजन प्रसाद




ननकू से छीन लिया
उसका सब कुछ
इस तारकोल से रंगी
काली-कलूटी सड़क ने
जिस पर गुजरते हुये
किसी संवेदनाहीन वाहन ने
कुचल डाली उसकी दोनो टांगें
और फ़िर मुड़ कर भी न देखा
अब ननकू का जीवन मात्र रह गया है
चालीस-पचास गज की सड़क का फ़ेरा
चार पहिये लगे तख़्ते पर बैठ
लालबत्ती पर खिसकते हुये
आते-जाते वाहन चालकों के आगे
हाथ फ़ैलाना
गाली खाना
"मरने के लिये मेरी गाड़ी ही मिली है"
"अरे तू तो मरे बराबर है, औरों का ख्याल कर"
कोई-कोई रूपया, दो रुपया टिका देता है
दूसरे दिन मांगने पर नज़रें घुमा लेता है
आसमान भी ननकू का अपना नहीं हुआ
आये दिन चिलचिलाती धूप से तपती सड़क
सरकने में सहारा देने वाली
हथेलियों को जला देती है
बे-मौसमी बरसात
उस दिन की शाम का चूल्हा बुझा देती है
उसका आसमान है अब
इस महानगर के एक बड़े पुल के नीचे
प्लास्टिक की तरपाल का एक टुकड़ा
जो कहने को तो छत है
किन्तु स्वयं में बेबस है
आंधी-तुफ़ान-बारिश
रोक नहीं पाता है
ननकू रात में लेटे-लेटे
अक्सर सोचता है
काश वो गाड़ी उसके पांव के ऊपर से नहीं
उसके सिर के ऊपर से गुजरी होती
शायद फ़िर उसे
न इस सड़क
न इस आसमान
और न किसी आदमी से
कभी, कोई भी शिकायत होती

मोहिन्दर कुमार




इक सड़क बनाते हैं, नई सड़क बनाते हैं।
चलकर उस पर हम-तुम आसमां तक जाते हैं।
सबसे पहले मुझको मिलना है चन्दा से,
है दिल में एक सवाल जो पूछूँगा उससे,
मन उचट सा जाता है मेरा रोज़ के कामों से,
क्यूँ आप नहीं थकते अक्सर ही तो आते हैं।
इक सड़क बनाते हैं............

बिल्कुल भी ना भूलूँगा फिर सूरज से मिलना,
ये राज़ खोल दो यार, देखो 'ना' मत कहना,
सीने में धधकती आग तुम कहाँ से लाते हो,
बुझती जाती हर लौ जो दिल में जलाते हैं।
इक सड़क बनाते हैं...........

मेरी चाह है बचपन से हों चाह में कुछ तारे ,
आयेगा मज़ा अब तो, वो होंगे संग सारे,
कितने अच्छे हैं ये बच्चों के प्यारे हैं,
करते खुश टिम-टिमकर, जाने क्या पाते हैं।
इक सड़क बनाते हैं................

कुछ दिन के लिए ही सही, वो सड़क बना पाऊँ,
इक सैर आसमां की इंसा को करा पाऊँ,
दूरी को मिटा करके कुछ बात चलाते हैं,
कुछ सीख के आते हैं ,कुछ उनको सिखाते हैं।
इक सड़क बनाते हैं ..................

पंकज तिवारी




सुगुवा का जब जनम हुआ था
ओझा जी
इसी रस्ते आए थे
माई के झडुए-झाडू
मारे थे
तब जाकर
लड़की होने का कलंक मिटा।

सुगुवा छोटे से ही
पता नहीं
असमान में
क्या निहारती रहती!

मास्टर जी की बेटी
बेटी होकर भी
स्कूल जाती थी
जबकि माई ने बताया था
के लइकिन के पढ़ला के का काम।

थोड़ी बड़ी हुई तो
जवानी के लछन दिखने लगे
किससे-किससे छोपाती
कहाँ भागती
उसका रास्ता लौटकर तो
यहीं आता था
सतखटोलवा भी वहीं था।

बिलइया ने एक दिन
रहर में दबोचे लिया
इसे तो
इतना भी नहीं मालूम था
कि इससे बाद का करें।

गोई के बताई तो
कहा 'कहाँ जाओगी?'
जहाँ-जहाँ जाओगी
ई सूरूज तोहार पीछा करेगा

उसने भी सोचा
जब रास्ता के आगे
रस्ता नहीं
असमान के आगे
असमान नहीं
तो आदमी के कईला से
का होगा?

शब्दार्थ-
सुगुवा- एक लड़की का नाम, जनम-जन्म, रस्ते- रास्ते से, झडुए-झाडू- झाडू ही झाडू से,
असमान- आसमान, माई- माँ, लइकिन के- लड़कियों को, पढ़ला- पढ़ने से, लछन- लक्षण,
सतखटोलवा- तारों का सप्तर्षि मंडल, बिलइवा- एक लड़के का नाम, रहर में- अरहर के खेत में,
गोई- सहेली, सूरूज- सूर्य, तोहार- तुम्हारा, कईला से- करने से।

शैलेश भारतवासी



पुराने अंक-


परिवर्तन नाम है जीवन का


जीवन एक कैनवास


आधुनिक विकास और गाँव


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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

क्षमा चाहूंगा परन्तु इंटरनेट खराब है तॊ साइबर कैफे से काम करें अन्यथा जिम्मेदारी ना लें। पाठकॊं कॊ नाराज ना करें।

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

कविताएं रॊचक हैं एवं सीधे दिल में उतरती हैं। वैसे उम्मीद है कि अगली बार कविताएं अधिक हॊंगी क्यॊंकि गर्मियॊं के बाद सावन आ रहा है।
..परन्तु बरसात में तॊ तकनीकी खराबियां ज्यादा हॊ जाती हैं।

विपुल का कहना है कि -

सबसे पहले तो मैं आप सभी से क्षमा चाहूँगा क्योंकि इतने दिनो तक मैं इस हिन्द-युग्म से ग़ायब रहा ..(टिप्पणी के लिए). कुच्छ अपरिहार्य कारण थे जिनके कारण ऐसा हुआ. वरना कौन इस प्यारे से परिवार से दूर रहना चाहेगा !
इस बार के काव्य पल्लवन का विषय जितना व्यापक है उतने ही कवि कम..
अचराज़ हुआ यह देख कर... फिर भी जो कविताए हैं उनका स्तर हिंद-युग्म की संपन्नता की को भली भाँति व्यक्त करता है

भावनाओ को शब्दो का बड़ा ठोस धरातल प्रदान किया है...

अपनी साँसों को,
जलते तलवे की गर्माहट देता है,
अपनी जीजिविषा को
अपने पसीने से ताज़ा करता है,
बड़ा कद्दावर है वह-
अस्तित्व की अहमियत जानता है,

और इन पंक्तियो के भी क्या कहने.. सड़क और आदमी का इससे बेहतर तादत्म्य शायद ही देखने को मिले


सड़क के आदमी की
परछाई से भी बचता है,
खुद में ही सड़क का एक टुकड़ा है-
उस सड़क का,
जो आदमियों से बनी है।
कुछ आदमी
उस सड़क पर चढ़,
आसमानी हो जाते हैं-
परंतु आसमान किसका हुआ है,
फिर आसमान के नीचे
एक और सड़क बनती है-
सड़क से उठ चुके,
उस जैसे ही इंसानों की।

राजीव जी हमेशा की तरह कुछ असाधारण और अप्रत्याशित दिया है बिंब अनूठे हैं तो कविता का अंत उससे भी लाजवाब...

आसमान से देखो तो आदमी कीड़े नज़र आते हैं
मैनें मुस्कुरा कर तबीयत से पत्थर उछाला
" छपाक " आवाज़ आयी दो पल बाद...
और मेरे पाँव सड़क पर बढ़ने लगे।


मोहिंदर जी की कविता जिस शैली मैं लिखी गयी है वह मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आती है मैं भी इसी शैली मैं लिखने को प्रयासरत रहता रहता हूँ.. ऐसे में यह कविता मेरे लिए एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर रही है
क्या ख़ूबसूरती से नानकू के जीवन का चित्र खींचा है ! मुह से बरबस ही वाह निकलती है !

आये दिन चिलचिलाती धूप से तपती सड़क
सरकने में सहारा देने वाली
हथेलियों को जला देती है
बे-मौसमी बरसात
उस दिन की शाम का चूल्हा बुझा देती है
उसका आसमान है अब
इस महानगर के एक बड़े पुल के नीचे
प्लास्टिक की तरपाल का एक टुकड़ा
जो कहने को तो छत है
किन्तु स्वयं में बेबस है
आंधी-तुफ़ान-बारिश
रोक नहीं पाता है

अंत भी बड़ी वेदना के साथ हो रहा है ...
ननकू रात में लेटे-लेटे
अक्सर सोचता है
काश वो गाड़ी उसके पांव के ऊपर से नहीं
उसके सिर के ऊपर से गुजरी होती
शायद फ़िर उसे
न इस सड़क
न इस आसमान
और न किसी आदमी से
कभी, कोई भी शिकायत होती

ऊपर लिखी सारी कविताओं से भिन्न पंकज जी की कविता आशावादी सोच से ओतप्रोत है ...

कुछ दिन के लिए ही सही, वो सड़क बना पाऊँ,
इक सैर आसमां की इंसा को करा पाऊँ,
दूरी को मिटा करके कुछ बात चलाते हैं,
कुछ सीख के आते हैं ,कुछ उनको सिखाते हैं।
इक सड़क बनाते हैं .......

शायद सबसे अधिक प्रभावित करती है शैलेश जी की कविता |देशज शब्दो का प्रयोग इतनी अधिक कुशलता के साथ !
अभी तक मैं मनीष वंदेमातरम जी को इस क्षेत्र का महारथी समझता रहा..पर शैलेश जी मेरी धारणा को बदल रहे हैं |बड़ी ही शानदार कविता का स्रजन किया है आपने .. बधाई स्वीकार
करें ..
मास्टर जी की बेटी
बेटी होकर भी
स्कूल जाती थी
जबकि माई ने बताया था
के लइकिन के पढ़ला के का काम।

उसने भी सोचा
जब रास्ता के आगे
रस्ता नहीं
असमान के आगे
असमान नहीं
तो आदमी के कईला से
का होगा?

इतने सब के बाद भी एक ख़याल आता है की जब इतनी कम कविताओ और स्मिता जी की पैंटिंग के बिना यह काव्य-पल्लवन का अंक इतना प्रभावित कर रहा है .. तो फिर जब संपूर्ण होता तब क्या करता..?
कवियों की कम संख्या से निराशा तो हुई.. पर फिर भी अच्छी कविताओं के लिए कवियों का आभार और बधाई भी..

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

बेनाम जी,

आपको इतनी जल्दी नाराज़ नहीं होना चाहिए। यदि आप हमें निरंतर पढ़ रहे होंगे, हमने एक बार स्मिता तिवारी के बारें में भी प्रकाशित किया था। वो एक छोटे कस्बे से हैं जहाँ बारिश हो जाने पर साइबर कैफ़े का भी नेट खराब हो जाता है। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि बहुत जल्द पेंटिंगें भी जोड़ दी जायेंगी।

अजय यादव का कहना है कि -

कविताओं की संख्या कम होने तथा स्मिता तिवारी जी की पेंटिंगों की अनुपस्थिति के बावजूद काव्य-पल्लवन का यह अंक भी पिछले अंकों से कमतर नहीं है. इसका श्रेय उन सुंदर रचनाओं को और उनके कवियों को जाता है जिन्होंने इस अंक को काव्य की दृष्टि से इतना स्मरणीय बना दिया है. सभी रचनाएं अपने आप में विशिष्ट हैं.

divya का कहना है कि -

aaj hi maine kavya-pallavan ke bare me jaana.......concept unique aur rochak hai....
vishay- aadmi sadak aur insaan lubhavna hai.......sirshak padh kar hi kavya me dilchaspi badh jaati hai....
ek hi vishay ko har kavi ne itne vividhta se pesh kiya hai ki ek pathak ke roop me aur mujhe kya chahiye......
itne achche kavyon ke liye aap sab ka dhanyavaad...
divya

sajeev sarathie का कहना है कि -

yun to har kavita lajaawab hai par mohinder ji ko vishesh badhai meri nazar me ye aapki bahtareen kritiyon me se ek hai

Anupama Chauhan का कहना है कि -

Aap sabhi ko bhadhaaiyaan.....aise hi phalte phoolte rahiye.

Sneh
Anupama

रंजू का कहना है कि -

एक एक कविता सुंदर लगी ..सबने बहुत ही सुंदर है . बहुत बहुत शुभकामनाएँ

आर्य मनु का कहना है कि -

सीधे दिल पर वार करने वाली रचनायें । और तिस पर ये कि सभी की सभी श्रेष्ठ अभिव्यक्तियां । कहीं भी आलोचना करने का मन नही हुआ । विशेषकर "ननकू" पसन्द आया ।ऐसा लगा जैसे आधे हिन्दुस्तान का नेतृत्व अकेले ने ही कर लिया ।
रचनायें कम थी या ज्यादा, ये तो पुराने अंक देखे तब पता चला किन्तु सबसे अधिक व्यथित "बेनाम जी" की टिप्पणी ने किया । बिना विचारे तपाक् से ऐसी बात कह देना॰॰॰॰॰॰ थोडा अजीब लगा॰॰॰॰॰हिन्दयुग्म का पाठक और ये वक्तव्य॰॰॰॰॰
खैर॰॰॰॰ अपनी अपनी सोच है, कोई करे भी तो क्या ?
काव्य पल्लवन और इसके रचियता कवियों को बधाई ।
आर्यमनु ।

Sandhya का कहना है कि -

Dostion,

`kavya pallvan `kai baaraie main mujhaie Shailesh Bharatwasi saie pata chla. Aap sabhee kee rachnayain achche lageen.

Rakeshji aapkee kavita mujhai achee lagee. Lakhtain rahain.

main yahaan nahee rahtee is karan main is computer par Hindi lepi main nahee likh saktee. Roman main hindi likhnaie kai leyai akshma chaahuoongee.

Kavaya pallvan kai leyi dher saree shubkamnion kai saath

Sandhya

Sandhya का कहना है कि -

`Rajeevji` galtee saie aapkaa naam Rakesh likh diea hai akashma chaahoongee
Sandhya

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

प्रथम तो क्षमाप्रा्र्थी हू‍ क्योंकि हिन्द-युग्म पर पिछले कई दिनो से दस्तक ना दे सका और इस नये प्रयोग की ना ही जानकारी पा सका ना ही कोई कविता दे सका ।
सड़क, आदमी और आसमान अंक के प्रस्तुत सभी कवितायें सुंदर है ।

"अपनी साँसों को,
जलते तलवे की गर्माहट देता है,
अपनी जीजिविषा को
अपने पसीने से ताज़ा करता है"

वाकई मेरी सोच को ये पंक्तियां गर्माहट से भर देती है
"बौनेपन को उँट की टाँगों के पैमाने से नापा" राजीव जी ने सचमुच कल्पना को चील के पंखों में बाँध दिया है
और शैलेश जी की लोकभाषा तो देसी तडका है जो मन को आनंदित कर देता

सभी कविगणो को बधाईयां

sahil का कहना है कि -

थोड़ा कष्ट हुआ,इतनी कम रचनाओं को देखकर,पर जो भी रहीं, आलोक शंकर जी की सोंच सड़क,आदमी और आस्मान को सार्थक करती रहीं, सभी कविओं को मेरी ढेरों शुभकामनाएं.
अलोक सिंह "साहिल"

डॉ सुनील कुमार वर्मा का कहना है कि -

मेरी और से ढेरो शुभकामनाएं! ऐसे ही अचानक इन्टरनेट पर हिंदी कविता ढूंढ लिया तो इस अति सुन्दर वेबसाइट का पता चला | एक एक कर साडी वेबसाइट पढूंगा |
मुझे भी हिंदी कविताओं में अपनी जिंदगी के हर लम्हे को उतारने का जज्बा है | इसी सन्दर्भ में मई हाल ही में एक ओंन लाइन पत्रिका 'श्रद्धांजलि' शुरू की है | 'श्रद्धांजलि' उनको भावभीनी श्रद्धांजलि है जो अब इस दुनिया में नहीं है | आपसे अनुरोध है क्रपया इस वेबसाइट पर भी अपनी अमूल्य रचनाएं भेजिए | इसका पता है= http://shraddhanjali.in/

नमन

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