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Wednesday, June 13, 2007

दीप जले अब कैसे (प्रतियोगिता से)


अब तक हम मई माह की प्रतियोगिता की टॉप १० कविताओं में से ६ को प्रकाशित कर चुके हैं। आज बारी है सातवीं पायदान की कविता 'दीप जले अब कैसे?' की जिसकी रचयिता हैं अमिता मिश्र 'नीर'। इन्होंने अपनी इस कविता को शुषा फॉन्ट में टाइप करके भेजा था, मगर खुशी की बात यह है कि इन्होंने अब यूनिकोड में लिखना सीख लिया है।

कविता- दीप जले अब कैसे?

दीपक दर का स्नेह बह रहा
दीप जले अब कैसे?

हाँ अनमोल प्यार बिकता है
जग में दो-दो पैसे
दीप जले अब कैसे ?

कहो बावली! इन आँखों से
रूदन लाल क्यों होतीं
दुनियॉ बड़ी निष्ठुर है कह दो
नयन लाल क्यों खोती,
ये सच है किन्हीं चरण का
मधुर पास मन पाया,
थाम कलेजा पाया था जो,
हाय मिले अब कैसे ?
दीप जले अब कैसे ?

प्रेम जलन में ही खिलता है
यथा फूल काटों में,
भोली भाव तुला करता है
त्यागों के बाटों में,
इन गीली आँखों को अब
मिले उजाला कैसे ?
दीप जले अब कैसे?

निर्धन नयनों के धन निखरे
मोती बिखरे जैसे,
उनकी ही धुँधली छाया में
चलना है जैसे-तैसे,
लघु दुनिया अँधियारे मन की
ज्योति मिले अब कैसे?
दीप जले अब कैसे?

शूलाचित डग कठिन लक्ष्य
हैं मुस्कानें मुर्झायी....
मेरे सपनों की पड़ती हैं
मानस जल में छाँईं.....
लाल-लाल मदिरा छलकी
जाती है लघु प्याले से
जिसको तुमने अँधियारे में
अपना मीत बनाया
रूठे हैं ये लोचन मेरे
रोते हाय छले से
दीप जले अब कैसे?

कवियित्री- अमिता मिश्र 'नीर'

प्रथम चरण के अंक- ८, ७, ७, ८॰५, ५
औसत अंक- ७॰१
प्रथम चरण के ज़ज़मेंट के बाद स्थान- सातवाँ

दूसरे चरण के अंक- ७॰५, ८॰५, ६, ७॰१ (पिछले चरण का औसत अंक)
औसत अंक- ७॰२७५
दूसरे चरण के ज़ज़मेंट के बाद स्थान- सातवाँ

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

सुनीता शानू का कहना है कि -

हाँ अनमोल प्यार बिकता है
जग में दो-दो पैसे
दीप जले अब कैसे ?
बहुत अच्छी पक्तियाँ है...

कहीं कहीं कविता कुछ अनमना सा कर देती है...मन को जैसे की परेशान कर देती है...

कहो बावली! इन आँखों से
रूदन लाल क्यों होतीं
दुनियॉ बड़ी निष्ठुर है कह दो
नयन लाल क्यों खोती,
ये सच है किन्हीं चरण का
मधुर पास मन पाया,
थाम कलेजा पाया था जो,
हाय मिले अब कैसे ?
दीप जले अब कैसे ?
शुभ कामनायें

सुनीता(शानू)

Anonymous का कहना है कि -

Bahut sundar rachnaa hai.

Upasthit का कहना है कि -

vaah bahut khub..kavita sundar hai.. aage ki pratiyogita ke liye subhkamnayen

Mohinder56 का कहना है कि -

सुन्दर रचना है, भावों को बडे अच्छी ढंग से उकेरा है आप की लेखनी ने.

विश्व दीपक का कहना है कि -

bahut sundar rachna hai.
badhai sweekarein.

Anonymous का कहना है कि -

अमिताजी,

कविता के लिये आपने बहुत ही सुन्दर विषय चुना है, वर्तमान में प्यार की महत्ता दिनों-दिन कम होती जा रही है, "प्यार बिकता है", आज की कड़्वी सच्चाई बन चुका है। सचमुच "दीप जले अब कैसे?"....

इस खूबसूरत रचना के लिये बधाई स्वीकार करें।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

रचना बहुत ही अच्छी है विशेषकर आपका शब्द चयन।

"दीपक दर का स्नेह बह रहा
दीप जले अब कैसे?"

"भोली भाव तुला करता है
त्यागों के बाटों में,
इन गीली आँखों को अब
मिले उजाला कैसे ?"

बहुत बधाई।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Unknown का कहना है कि -

अमिता जी, बेहद सुंदर रचना. भाषा को थोड़ा और सामयिक रखतीं तो शायद और भी प्रभावी होती. फिर भी कुछ पँक्तियाँ बहुत पसंद आयीं.

हाँ अनमोल प्यार बिकता है
जग में दो-दो पैसे
दीप जले अब कैसे ?

कहो बावली! इन आँखों से
रूदन लाल क्यों होतीं
दुनियॉ बड़ी निष्ठुर है कह दो
नयन लाल क्यों खोती,
ये सच है किन्हीं चरण का
मधुर पास मन पाया,
थाम कलेजा पाया था जो,
हाय मिले अब कैसे ?
दीप जले अब कैसे ?

बधाई और अगली प्रतियोगिता के लिये शुभकामनायें.

रंजू भाटिया का कहना है कि -

प्रेम जलन में ही खिलता है
यथा फूल काटों में,
भोली भाव तुला करता है
त्यागों के बाटों में,
इन गीली आँखों को अब
मिले उजाला कैसे ?
दीप जले अब कैसे?

बहुत बहुत सुंदर और सच लिखा है ...

Admin का कहना है कि -

प्रेम जलन में ही खिलता है
यथा फूल काटों में,
भोली भाव तुला करता है
त्यागों के बाटों में,
इन गीली आँखों को अब
मिले उजाला कैसे ?
दीप जले अब कैसे?

दीप जरूर जलेगा प्रयत्न करते रहें

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