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Monday, March 05, 2007

यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम


पिछले दस दिनों से पाठकों और प्रतिभागियों के मेल हमें मिलते रहे जिसमें वे पूछते रहे कि फ़रवरी माह की प्रतियोगिता के परिणाम कब घोषित हो रहे हैं? हमारे नियमित पाठक, स्तरीय तथा गैरस्तरीय दोनों प्रकार की कविताओं के रसज्ञ, गौरव शुक्ला जी ने तो हद ही कर दी, यह बताये जाने पर भी कि परिणाम ५ मार्च को घोषित होंगे, कई बार वही सवाल करते रहे। पाठक को जब इस तरह का इंतज़ार हो तो किसका उत्साह चौगुना नहीं होगा! हम खुद परेशान रहते हैं कि ज़ल्दी से माह का प्रथम सोमवार आये और पुरस्कारों की उद्‌घोषणा की जा सके।



१५ फ़रवरी (अंतिम तिथि) तक, जब 'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' के लिए कुल ९ रचनाएँ मिलीं तो मन बहुत खुश हुआ कि चलो पिछली बार की ६ रचनाओं के स्थान पर इस बार देढ़ गुनी कविताएँ मिली हैं। मगर १७ फ़रवरी एक प्रतिभागी अमित कपूर ने सूचना दी कि उनकी कविता उस बार के काव्यालय में प्रकाशित हो गयी है। अब बचीं ८। हमारे एक निर्णयकर्ता ने एक और कविता को इस दौड़ से बाहर कर दिया। हुआ यह कि उस कविता को कवि ने किसी और शीर्षक से अनुभूति पर प्रकाशित करवा रखी थी, हमारे यहाँ शीर्षक बदलकर भेज दी। वो तो शुक्र हो हमारे निर्णयकर्ता की पठनियता का, कि चोरी पकड़ी गयी।



मगर तब तक हम दो चरणों का निर्णय ले चुके थे। और वे दोनों कविताएँ अंतिम ५ में पहुँच गयी थीं, यानी इसके कारण किसी और के पेट पर लात पड़ती। सारी प्रक्रिया दुहरानी पड़ी, मगर खुशी की बात यह रही कि अंतिम तीन में फिर से वही कविताएँ पहुँचीं जो इन दोनों को निकालने पर बची थीं।






तब ही हिन्द-युग्म के सदस्यों ने यह सुझाया कि चोरी को पकड़ने का कोई नायाब तरीका निकालना पड़ेगा, केवल गूगल सर्च काम नहीं आयेगा। गौरव शुक्ला जी को फ़िल्टर बनाने का निर्णय किया गया। माना जाता है कि अंतरज़ाल की कोई एक भी यूनिकोडित/गैरयूनिकोडित कविता उनकी नज़रों से नहीं बची है।






अंतिम तीन कविताओं में मुकाबल इतना तगड़ा था कि हमारे अंतिम निर्णयकर्ता, ३ घण्टों की जद्दोजहद के बावजूद भी सर्वश्रेष्ठ रचना का निर्णय नहीं कर पाये। मरता क्या न करता। नया टूल आजमाया। कविताओं के भाव-पक्ष तथा कला-पक्ष को अलग-अलग करके मूल्यांकित किया। तब कहीं जाकर यह तय किया जा सका कि गौरव सोलंकी फ़रवरी माह के यूनिकवि हैं, जिनकी कविता 'नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो' को तीनों में सबसे अधिक अंक मिले। जिसके लिए उन्हें रु ३००/- का नकद पुरस्कार, रु १००/- तक की गुलज़ार की कविताओं की एक पुस्तक तथा प्रशस्ति-पत्र दिया जा रहा हैं। चूँकि गौरव सोलंकी जी ने इस माह के आने वाले तीन सोमवारों को भी अपनी कविता प्रकाशित करने का वादा किया है, अतः उन्हें प्रति सोमवार रु १००/- के हिसाब से रु ३००/- की अतिरिक्त धनराशि दी जाती है।






यूनिकवि का परिचय-

गौरव सोलंकी
आयु-20 वर्ष
जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ लेकिन शिक्षा-दीक्षा संगरिया(राजस्थान) में हुई.घर में साहित्यिक वातावरण होने से बचपन से ही साहित्य की ओर विशेष रुझान रहा.15 वर्ष की आयु में काव्य-लेखन आरंभ किया.वर्तमान में आई.आई.टी. रुड़की में बी.टेक. तृतीय वर्ष में अध्ययन कर रहे हैं.
आई.आई.टी. रुड़की की साहित्यिक पत्रिका 'क्षितिज' के मुख्य सम्पादक हैं.अनेक कहानियाँ एवं कविताएं लिख चुके हैं. वर्तमान में महत्त्वाकांक्षाओं और सपनों पर एक उपन्यास लिख रहे हैं.प्रमुख कहानियाँ 'सपने, इच्छाएं, ज़िन्दगी...', 'नरगिस', 'श्राद्ध', 'अपराजिता' हैं. 'नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो' की एक शृंखला लिखी है.अन्य कविताओं में 'जो होगा, देखा जायेगा', 'सीता होने पर', 'तुम ज़िन्दा हो', 'मैं झूठा हूं' प्रमुख हैं.

पता-
गौरव सोलंकी
पुत्र श्री युवराज सोलंकी (वरिष्ठ अध्यापक)
वार्ड नं.-21
गुरूनानक बस्ती
संगरिया
जिला-हनुमानगढ़ (राजस्थान)
पिन कोड-335063

पाठक खुद देखें कि मुकाबला कितना मुश्किल था, इसके लिए हम तीनों कविताओं को अंतिम-निर्णयकर्ता के मूल्यांकन के साथ प्रकाशित कर रहे हैं।




नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो! (पुरस्कृत कविता)





आहिस्ता बोलो,
आवाज आई थी ऊपर कहीं से,
क्या मैंने गलत कहा था?
मैंने तो यही कहा था,
नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो!
तुम्हारा हृदय अलग है मेरे हृदय से,
जो कभी प्रेम करता है असीमित
और कभी आभास करवाता है तुम्हारे हृदयहीन होने का
और चंचलता तो श्रद्धेय नहीं होती ना
चंचलता दर्शनीय हो सकती है, श्रवणीय हो सकती है,
पर पूजनीय कभी नही,
तुम एक सुन्दर प्रतिमा की देवी हो,
निराकार ईश्वर कभी नहीं,
समकक्ष हो तुम ईश्वर के
अपनी चंचलता के उन चरम क्षणों मे,
अनापेक्षित,
अविश्वसनीय,
अदर्शनीय,
अश्रवणीय,
दूसरे चरम क्षणों में तुम हो.
कुछ भी नहीं हो तुम सचमुच,
फिर तुम्हीं क्यों सब कुछ हो?
तुम्हीं जननी हो,
मानवता की श्रंखला,
फिर कभी तुम अमानवीय क्यों बन जाती हो?
कोमलांगी कहलाती हो तुम,
फिर कभी पाषाण क्यों बनती हो?
पीयूष-स्रोत हो तुम,
फिर कभी विष क्यों उगलती हो?
तुम विश्व-शक्ति हो,
तुम मुझे हरा सकती हो,
तुम विश्वमाता हो,
तुम अपरजिता हो,
तुम भावना हो,
तुम कामना हो,
तुम जानकी हो,
पर तुम कैकेयी क्यों हो?
तुम माँ हो,
फिर इतनी निर्दयी क्यों हो?
तुम अर्द्धांगिनी हो,
तुम अधूरी हो,
सम्पूर्ण नहीं हूं मैं भी
पर तुम भी क्यों जरूरी हो?
काश
तुम्हारा खूबसूरत चेहरा,
सम्मोहक आँखें
और नागिन से बाल,
कुछ योगदान कर पाते तुम्हारे हृदय के पुनर्निर्माण मे!





कवि- गौरव सोलंकी



ज़ज़मेंट-"नारी, तुम केवल श्रद्धा हो" एक सशक्त भाव है किन्तु कवि ने "तुम केवल श्रद्धा नहीं हो" को विचार बना दिया है

"और चंचलता तो श्रद्धेय नहीं होती ना
चंचलता दर्शनीय हो सकती है, श्रवणीय हो सकती है,
पर पूजनीय कभी नही,
तुम एक सुन्दर प्रतिमा की देवी हो,
निराकार ईश्वर कभी नहीं"

"कुछ भी नहीं हो तुम सचमुच,
फिर तुम्हीं क्यों सब कुछ हो?"

थोड़ा भटकाव कविता के अंत में है जहाँ कवि यह सिद्ध करनें में कमजोर रहा है कि "खूबसूरत चेहरा", "सम्मोहक आँखें", "नागिन से बाल" का श्रद्धा से किस प्रकार संबंध हैं हाँ "कुछ योगदान कर पाते तुम्हारे हृदय के पुनर्निर्माण मे" कह कर "तुम केवल श्रद्धा नहीं हो" विचार के साथ अंततः न्याय कर सका है

कला पक्ष : ८.५/१०, भाव पक्ष: ७.५/१० कुल अंक १६/२०


लेखक


अक्षरों और शब्दों का
विशाल वृत बना लिया
किताबों का घर तो बना
पर अपनों के बीच न रह पाया
व्याकरण और समास के साथ
अलंकार और उपनाम जोडें
पद्म विभूषण से तो हो गया विभूषित
पर सेहरे का कर्त्तव्य न निभा पाया
खींचे कई रेखा चित्र
लिख डाले कई संस्मरण
कहानी-कविता से हो गए
अनगिनत कागज़ रंगीन
पर बिना लिखे रिक्त ही रहा
कोरे श्याम्पट्ट सा जीवन
अब विवश हुए जा रहे हैं प्राण
परवश में जा रहा है जीवन
पर आज भी अपनों के साथ
बाँध न पाया बंधन


कवयित्री- स्वर्ण ज्योति


ज़ज़मेंट- कवि की भाषा पर पकड़ प्रशंसनीय है कविता का प्रवाह भी सुन्दर है बात कहने के लिये कवि को सरलता-सहजता ही पसंद है, बिम्बों का बहुत अधिक न तो प्रयोग है न ही कवि ने उनके प्रयोग की आवश्यकता महसूस होने दी है



"..पर सेहरे का कर्त्तव्य न निभा पाया", "..पर बिना लिखे रिक्त ही रहा कोरे श्याम्पट्ट सा जीवन", "..पर आज भी अपनों के साथ बाँध न पाया बंधन" कविता हृदय के बहुत भीतर न भी पहुँचती हो, हृदय तक तो पहुँचती ही है



कला पक्ष : ८.०/१०, भाव पक्ष: ७.५/१० कुल अंक १५.५/२०



हाट


यह सत्संग चौक है
यह बाजला चौक
यहाँ हाट लगता है
रोज–रोज प्रतिदिन
देश में अनेक ऐसे चौक हैं
गली मुहल्लों में¸शहरों में
जहाँ ऐसे हाट लगते हैं
रोज–रोज प्रतिदिन।

साग सब्ज़ियाँ नहीं बिकती है यहाँ
और न ही बिकते हैं यहाँ
खाद्व–खाद्दान्न या पशु मवेशी
ये इन्सानों का हाट है
यहाँ मनुष्य बिकते हैं
रोज–रोज दिन–प्रतिदिन।
प्रकृति की सुन्दरतम रचना
बिकती है यहाँ
उनका श्रम बिकता है
खुन पसीना बिकता है
रोज–रोज दिन–प्रतिदिन.।
ऐसा मुकाम भी आता है
जीवन में उनके
श्रम बेचकर भी जब
बुझती नहीं ज्वाला पेट की।
तब बिकती है आत्मा उनकी
चेतना बिकती है
बहु–बेटियाँ बिकती हैं
घर–बार बिकता है
रोज–रोज प्रतिदिन।
चढ़ता सूरज वैसे तो
प्रतीक है आशा का
पर चढ़ता सूरज
क्षीण करता है संभावना
इनके बिकने की
आशा निराशा का यह
खेल चलता रहता है
रोज–रोज प्रतिदिन।
बिकता है वह खरीदते हैं हम
कीमत कोई और तय करता है
साठ रूपये प्रतिदिन
अपनी कीमत भी नहीं
कर सकता है तय वह
बिकने को मजबूर है
तयशुदा कीमत पर
रोज–रोज प्रतिदिन।
कीमत बढ़ती रहती है
हर चीज की
रोज–रोज प्रतिदिन
पर इनकी कीमत रहती है
स्थिर गरीबी की तरह
वह महज एक कीड़ा है
हम इन्सानों के बीच
उसे हम मजदूर कहते हैं
उसे बस रेंगना है
और कुचला जाना है
हमारे झूठे अहम तले
रोज–रोज प्रतिदिन।

साम्यवाद हो या समाजवाद
या चाहे कोई और वाद
नारे सारे खोखले ही रहेंगे
तब तक जब तक
ये हाट लगते रहेंगे
आत्मा बिकती रहेगी
चेतना बिकती रहेगी
घर–बार बिकते रहेंगे
बहू–बेटियाँ बिकती रहेंगी
रोज–रोज प्रतिदिन।।


कवि- वरुण रॉय


ज़ज़मेंट- यह एक सुन्दर प्रयास है कवि की सोच प्रशंसनीय है यद्यपि शब्द इतने सुन्दर विषय को पूरी तरह चित्रित नही कर सके ये पंक्तियाँ सर्वाधिक प्रभावी हैं"


"साम्यवाद हो या समाजवादया चाहे कोई और वादनारे सारे खोखले ही रहेंगे"



कला पक्ष : ६.५/१०, भाव पक्ष: ७.०/१० कुल अंक १३.५/२०



सबसे कठिन प्रतियोगिता तो पाठकों के बीच देखने को मिली। रंजु जी, गरिमा जी, डिवाइन इंडिया, उपस्थित और अजय यादव जी ने तो कवियों को खूब पुचकारा। इस बार के यूनिपाठक अजय यादव जी ने तो इतिहास रच डाला। ७ फ़रवरी को शैलेश भारतवासी से यूनिकोड टंकण के टूल के बारे में पहली बार पूछा और शुरू कर दिया कविताओं पर टिप्पणी देना। २८ फ़रवरी तक कुल मिलाकर २५ टिप्पणियाँ की। इन्हें सबसे कड़ी टक्कर मिल रही थी उपस्थित जी से, क्योंकि उनकी टिप्पणियाँ एक तरह के शोधपत्र होते हैं। मगर पता नहीं क्या हुआ, वे पिछले १५ दिनों से गधे की सिंग की तरह अंतरज़ाल जगत से गायब हैं।
यूनिपाठक 'अजय यादव' को हिन्द-युग्म' की ओर से रु २००/- तक के हिन्दी-कविताओं की पुस्तकें भेजी जा रही हैं।


यूनिपाठक का परिचय-


नाम- अजय यादव
संप्रति- एक्शन कन्स्ट्रक्शन इक्युपमेन्ट लिमिटेड नामक कम्पनी में "सूचना प्रौद्योगिकी सहायक'' के रूप में कार्यरत



संपर्क-सूत्र-


अजय यादव


मकान न॰- ११६१


गली न॰- ५४ संजय कॉलोनी


एन॰आई॰टी॰ फरीदाबाद


हरियाणा (१२१००५)



इस बार हमारे पास यूनिकवि व यूनिपाठक के लिए एक-एक उपहार भी है। कवयित्री स्वर्ण ज्योति जी इन दोनों को अपनी कविताओं की पुस्तक 'अच्छा लगता है' की एक-एक प्रति प्रेषित कर रही हैं। स्वर्ण ज्योति जी एक गैर हिन्दी-भाषी क्षेत्र से हैं। मातृभाषा कन्नड़ है, पिछले २५ वर्षों से केन्द्र शासित प्रदेश 'पाण्डिचेरी' में निवास कर रही हैं, जहाँ की भाषा तमिल है। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद भी इतना हिन्दी-प्रेम! हिन्दी-बलॉगिंग में भी सक्रिय हैं। इनकी अनूदित कृतियाँ साहित्यिक वेबज़ीन सृजनगाथा के मार्च संस्करण में भी प्रकाशित हुयी हैं। इनकी हिन्दी-कविताओं की पुस्तक 'अच्छा लगता है' की समीक्षा दैनिक समाचार पत्र 'नई दुनिया' के २७ नवम्बर २००६ के इंदौर संस्करण में प्रकाशित हुयी थी। वर्तमान में कवयित्री हिन्दी में शोधरत् हैं।


लेखकों और पाठकों से अनुरोध है कि कृपया आप प्रतियोगिता में सक्रिय रूप से भाग लें। हमारा उत्साहवर्धन करें।
रचनाकारों के पास १५ मार्च २००७ तक का समय है।
और पाठकों के लिए तो रोज़ का दिन प्रतियोगिता का दिन है। सम्पूर्ण जानकारी यहाँ है।


आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

16 कविताप्रेमियों का कहना है :

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

गौरव जी को बहुत-बहुत बधाइयाँ!!!
आलोक शंकर जैसा स्तरीय कवि हमें पिछली प्रतियोगिता से मिला और इस बार गौरव जी ने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर हमारा गौरव बढ़ाया है।
यह हिन्द-युग्म के भविष्य के लिए अच्छा संकेत है।

Gaurav Shukla का कहना है कि -

प्रिय मित्र गौरव जी को हार्दिक बधाइयाँ
"नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो!" बहुत ही सुन्दर कविता है|
भविष्य में भी गौरव जी ऐसी ही सुन्दर कविताओं से "हिन्दी-युग्म" का सौन्दर्य बढाते रहेंगे ऐसा पूर्ण विश्वास है|
अनुपम रचना, पुनः बधाई स्वीकार करें |


"हिन्दी-युग्म" का मैं ह्र्दय से आभार प्रकट करना चाह्ता हूँ कि सभी सदस्यों ने मुझ पर इतना विश्वास दिखाया है
मैं विश्वास दिलाता हूँ कि जो दायित्व मुझे आप ने सौंपा है उसे मैं पूरी निष्ठा से निभाऊँगा|
किन्तु मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप सभी सदस्यों का सहयोग भी अपेक्षित है| और आप सभी का स्नेह ऐसे ही बना रहेगा
:)

"लेखक" एवं "हाट" भी बहुत सुन्दर रचनायें हैं |
स्वर्ण ज्योति जी और वरुण जी को भी हार्दिक बधाई,
प्रतियोगिता में निर्णयकर्ता को निर्णय लेने में अवश्य कठिनाई हुई होगी

इस माह के "यूनिकवि" गौरव सोलंकी जी को पुनः बहुत बहुत बधाइयाँ

सस्नेह एव साभार
गौरव शुक्ल

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अजय यादव जी की पठनियता को नमन्।
आशा है आने वाले समय में वे और जोर-शोर से हिन्द-युग्म की प्रविष्टियाँ पढ़ेंगे।

Gaurav Shukla का कहना है कि -

हमारे इस माह के "यूनिपाठक" अजय यादव जी को भी हार्दिक बधाई
अच्छा पाठक और उसकी समालोचना लेखक की लेखनी की धार और तेज करती है
और उसे निरन्तर अच्छा, और अच्छा लिखने को उत्साहित करती है
सो मैं तो अजय जी को धन्यवाद भी देना चाह्ता हूँ, और निश्चित ही उनकी टिप्पणी से लेखकों ने लाभ उठाया होगा

अजय जी बहुत बधाई और धन्यवाद

सस्नेह
गौरव शुक्ल

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

मित्र गौरवजी और उत्साहवर्धक अजयजी को बहुत-बहुत बधाई!!!

गौरवजी की कविताएँ मैने पूर्व में ऑरकुट पर भी पढ़ी है, इनका लेख़न गंम्भीर है और पाठक को स्वत: ही अपनी ओर खींचता है।

गौरवजी की कविताएँ हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होकर हिन्द-युग्म का सौन्दर्य बढ़ायेंगी।

अजयजी इसी प्रकार कवि-मन को ख़ुश रखेंगे, ऐसी आशा है :)

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

गौरव जी, सवर्णा ज्योति जी एंव अजय जी,

आप सब को हिन्द्-युगम एंव मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो. निर्णायकगणों ने अपने मापदण्ड का प्रयोग कर जो भी निर्णय दिया हो, मैं कहूंगा तीनों रचनायें कांटे की टक्कर देती हैं..पुरस्कार से ज्यादा मह्त्वपूर्ण है प्रयास... और आप ने तो पहली बार में ही लम्बी छलांग लगायी है.. यह अन्त नहीं है.. आरम्भ है..हिन्द-युग्म से रिश्ता बनाये रखियेगा.

Udan Tashtari का कहना है कि -

गौरव सोलंकी जी को बहुत बहुत बधाई!!

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

गौरव सोलंकी जी एवं अजय यादव जी को बधाई..उनसे हिन्दयुग्म में निरंतरता की अपेक्षा है..

ग़रिमा का कहना है कि -

कम शब्दो मे पुरी बात बोल जाऊँ तो, विजेताओ को मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई :) पर एक शर्त है.... थोडी उल्टी हुँ मै. इसलिये विजेता खिलायेंगे मुझे मिठाई :D है ना उल्टी शर्त?

फिर कल मिलेंगे आज के लिये अलविदा :)

sakhi का कहना है कि -

गौरव जी को हार्दिक बधाइयाँ
"नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो!" आपका लेखन अच्छा लगा मुझे.

अजय जी को हार्दिक बधाइयाँ
मैं यहाँ नई हूँ अतः इतना ही कहूँगी की अच्छा लगा.

Medha Purandare का कहना है कि -

गौरव सोलंकी जी एवं अजय यादव जी को बधाई.

Thik tarah hindi tankan kar nahi pa rahi hun...Isliye Eng.comments.
Aasha hain,maf kiya jayega.

Swarna Jyothi का कहना है कि -

गौरव जी को बधाई
साथ ही हिन्दी युग्म का भी
आप का प्रयास प्रशंसनीय है
परखने का
नारी तुम केवल श्र्द्धा नहीं हो
एक विचार है इस विचार पर
अनेक प्रतिक्रिया हो सकती है
चाहें जो भी हो
गौरव जी आप बधाई के पात्र हैं

साथ ही हिन्दी युग्म का शिक्रिया
मेरी कविता को भी परखने का

अजय यादव जी आप की पठनीयता को नमन

ranju का कहना है कि -

गौरव जी, सवर्णा ज्योति जी एंव अजय जी,को हार्दिक बधाइयाँ

तीनों रचनायें बहुत सुन्दर रचनायें हैं |

नारी, तुम केवल श्रद्धा नहीं हो!" बहुत सुन्दर कविता है|:)

Upasthit का कहना है कि -

Vijetao ko shubhkamanayen, Khaas kar ajay ji ko, kyonki unhone tathakathit rup se mujhse baaji mari hai.. :). Main gadhe kee seengh ban gayab ho ghar chala gaya tha, holi par,(dukh rahega is baat ka.. :))
Gaurav tumhe bahut bahut badhayi, ekdam alag se....party kab de rahe ho...?
(Ek prashn hai,(GAURAV bura mat mananaa) ye apane rajeev ji ki rachanaon par vichar nahi kiya ja raha kya, mujhe to pura vishvaas tha ki, unki NITHARI par likhi kavita hi jeetegi, ise parinamo ke prati meri ekmatra asahamati ki rup me liya jaye)
Punah badhaeyeaan...

Anupama का कहना है कि -

Hind-Yugm mai aapka swagat hai....aapko haardik bhaadhiyaan.

mahashakti का कहना है कि -

कवि एवं पाठक द्वै गौरव जी एंव अजय जी को बधाई।

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