
कविता- अभी तो भोर है सफर की
आज कुछ अलग है,
पहले भी हलचल थी
पर दबा दी गई |
शायद वो क्षणिक ही थी,
पर आज कुछ अलग है,
वेदना तीव्र है,
कुछ भय सा भी है,
कुछ बेबसी है,
मन क्षुब्ध सा है,
धमनियो में विद्रोह है,
कुचल रहा हूँ,
फिर भी कहीं
निराशा का स्वर है,
पर अभी तो भोर है सफर की,
फिर ऐसा क्यों है ......
मन में ऊहापोह है,
विचारो में उथल-पुथल है ,
भावनाओं का सागर उफान पर है,
भय है कहीं
किनारों को काट न दे,
मेरा कुछ अंश
बह न जाये,
मैं, मैं न रह जाऊँ,
फिर कहीं
मैं अकिंचन
इन सब की तरह
निर्जीव न बन जाऊँ,
और अपनी तरह
लोगों के चेत को बस
जाते हुए देखता न रह जाऊँ |
नहीं बनना मुझे निर्जीव,
नहीं खोना है मुझे
मेरे किसी अंश को,
विद्रोह है कहीं
पर अब नहीं दबाऊंगा उसे ,
इस मोड़ पर आकर
फ़िर कुचलना नहीं है इसे,
अब नहीं भागूँगा इससे,
अब कुछ करना ही होगा,
प्रश्न को हल करना ही होगा |
आज टाला गर इसे
बात ख़त्म न होगी,
फिर नासूर बन कर उभरेगी ,
आज विचार करना ही होगा ,
सही और ग़लत का,
अंतर में समाना ही होगा,
प्रश्न का उत्तर
खोजना ही होगा,
पूर्ण हल
जाने बिना जाने न दूँगा,
फिर इसे आने न दूँगा.......
इस सफर की साँझ तक
फिर इसे आने न दूँगा.......
इस सफर की सांझ तक ........
प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७॰५, २, ५, ५, ४, ६॰८
औसत अंक- ५॰०५
स्थान- अठारहवाँ
द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६, ३, ५॰०५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰६८३३
स्थान- ग्यारहवाँ