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हिन्द-युग्म का वार्षिकोत्सव और विश्व पुस्तक मेला



'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन करते केदारनाथ सिंह, आनंद प्रकाश और शैलेश भारतवासी

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 37 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वाँ विश्व पु्स्तक मेला के दौरान 6 फरवरी 2010 को हिन्द-युग्म ने अपना वर्ष 2009 के वार्षिकोत्सव का आयोजन किया, जिसमें वर्ष 2009 में मासिक प्रतियोगिता यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता से चुने गये 12 यूनिकवियों को सम्मानित किया गया, 38 यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन हुआ और कुछ यूनिकवियों का काव्यपाठ भी हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी के मूर्धन्य कवि केदारनाथ सिंह ने की। 'सम्भावना डॉट कॉम' पर टिप्पणी करने के लिए प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश और कवि मदन कश्यप मौज़ूद थे। संचालन निखिल आनंद गिरि ने किया।

इंटरनेटीय समूह हिन्द-युग्म दिसम्बर 2008 से वार्षिकोत्सव मनाना आरम्भ किया है। इस आयोजन के माध्यम से हिन्द-युग्म अपनी गतिविधियों से इंटरनेट के बाहर की दुनिया को परिचित कराना चाहता है। वर्ष 2008 के वार्षिकोत्सव में हिन्द-युग्म ने उपस्थित दर्शकों को हिन्दी (यूनिकोड) टाइपिंग, ब्लॉग मेकिंग के बारे में जानकारी दी थी। वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव को मुख्य अतिथि बनाया था ताकि वे भी हिन्दी की इंटरनेटीय परम्परा का करीब से साक्षात्कार कर सकें और हिन्द-युग्म को उनका मार्गदर्शन मिल सके कि इसे किस तरह से आगे बढ़ना चाहिए।

चूँकि हिन्द-युग्म साल 2010 के विश्व पुस्तक मेले में शिरकत कर ही रहा था तो तय किया गया कि इसी दौरान वर्ष 2009 का वार्षिकोत्सव मनाया जाय ताकि बहुत बड़े जन समुदाय तक अपनी पहुँच बनाई जा सके। हिन्द-युग्म ने 'इंटरनेटीय साहित्य गैरस्तरीय है' मिथक को तोड‌़ने के लिए hindyugm.com पर पिछले 4 सालों में प्रकाशित 38 सम्भावनाशील कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को 'सम्भावना डॉट कॉम' को प्रकाशित किया, जिसका लोकार्पण वार्षिकोत्सव में ही किया जाना तय किया गया।

कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत अतिथियों को पुष्पगुच्छ और स्मृति-चिह्न भेंट करके हुई। इसके बाद यूनिकवि अखिलेश श्रीवास्तव ने काव्यपाठ किया। अखिलेश श्रीवास्तव ने अपनी 'बहन' और 'विदर्भः कर्जे में कोंपल' कविताओं का पाठ किया। इसके पश्चात संचालक निखिल आनंद गिरि ने आकांक्षा पारे को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया। आकांक्षा ने 'मुक्तिपर्व', 'औरत के शरीर में लोहा' आदि कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में 'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन वरिष्ठ कवि केदरानाथ सिंह, प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश और इस संग्रह के संपादक शैलेश भारतवासी ने किया। इस संग्रह में 38 नेटारूढ़ी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को संकलित किया गया है। इस संग्रह में हिन्द-युग्म पर प्रकाशित 6 नेपाली कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया है।

'सम्भावना डॉट कॉम' पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश ने कहा कि निश्चित रूप से मेरे लिए यह नया अनुभव है। अब तक हम कविताओं को या तो किसी संकलन में पढ़ते थे या किसी पत्रिका में, लेकिन मेरे लिए यह पहली बार है कि ये कविताएँ पहले से ही नेट पर प्रकाशित हैं और हम इसे पुस्तक के रूप में देख रहे हैं। आमतौर पर लोग नये का विरोध करते हैं, लेकिन मैं इस नये प्रयोग का स्वागत करूँगा। इंटरनेट तकनीक में असीमित संभावनाएँ हैं और मेरे ख्याल से इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना होगा ताकि वे भी अपनी रचनाओं को बड़े पाठकवर्ग तक पहुँचा सकें।

उन्होंने कहा कि मैं इसी संग्रह की भूमिका से कुछ बातों का उल्लेख करना चाहूँगा जिससे मेरी बात आगे बढ़ेगी। उन्होंने भूमिका में लिखित एक वाक्य 'बाज़ार का शिकार मनुष्य' पर अपनी मतभिन्नता भी व्यक्त की और कहा कि यदि हम खुद को बाज़ार का शिकार कहते हैं तो इसका मतलब यह है कि बाज़ार एक बाहरी तत्व है, वो हमसे अलग है। मेरे ख्याल से इस पर दुबारा सोचने की ज़रूरत है।

आनंद प्रकाश ने 38 के 38 यूनिकवियों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि और कार्यक्षेत्र का बकायदा उल्लेख करते इस बात को रेखांकित किया कि इस संग्रह में संकलित लगभग सभी कवि हिन्दी साहित्य से पाठ्यक्रम के तौर पर नहीं जुड़े हैं। इसका मतलब की संवेदना की खेती करने का अधिकार केवल विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्रोफेसरों या लिटरेचर के विद्यार्थियों को नहीं है और इस बात की पुष्टि इस संग्रह में संकलित कविताएँ करती भी हैं। आनंद प्रकाश जी ने कुछ कविताओं की पंक्तियों को पढ़कर उनकी तारीफ की और आलोचक की दृष्टि से कुछ सवाल खड़े किये, जिसमें अखिलेश श्रीवास्तव की 'विदर्भः कर्जे में कोंपल;, 'हँसी', अनुराधा श्रीवास्तव की 'नारी क्यों मौन रहती है', अपूर्व शुक्ल की 'समय की अदलत में', 'इक्कीसवीं सदी का भविष्य' आदि कविताओं की पंक्तियों का उल्लेख किया।

निखिल आनंद गिरि ने मनीष वंदेमातरम् की एक कविता 'इस फागुन मेरे गाँव ज़रूर से ज़रूर आना' का पाठ किया। कार्यक्रम को एकरसता की स्थिति से बचाने के लिए संभाषणों के बाद काव्यपाठ रखा गया था। गौतम राजरिशी ने अपनी ग़ज़ल 'चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से' को गाकर प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के मध्य में इस कार्यक्रम के एक और अतिथि कवि मदन कश्यप का आना हुआ। उनके स्वागत के बाद कार्यक्रम आगे बढ़ा। इसके तुरंत बाद साल 2009 के यूनिकवियों का सम्मान हुआ। सम्मान-पत्र स्वीकार करने के लिए मुकेश कुमार तिवारी, अखिलेश कुमार श्रीवास्तव, अपूर्व शुक्ल और रवीन्द्र शर्मा 'रवि' उपस्थित थे। सभी यूनिकवियों को यह सम्मान-पत्र शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰प्र॰) द्वारा दिया गया। सभी कवियों को सम्मान-पत्र के साथ-साथ उपहार-पत्रक भी दिये गये, जिन्हें सिहोर वापिस भेजकर यूनिकवि रु 1000 मूल्य तक की पुस्तकें इनाम स्वरूप प्राप्त कर सकते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि मैं इन कविताओं को एक आस्वादक(रसिक) के रूप में पढ़ना चाहूँगा। युवा कवियों का नया संकलन देखो तो जल्दी मत करो। प्रतीक्षा करो, उन्हें फलने दो, बढ़ने दो। आलोचना के मूल्य और मापदंड प्रतीक्षा करें। ये कविताएँ इक्कीसवीं सदी की आवाज़ें हैं, नई आवाज़ें हैं, मैं इन्हें उँगली नहीं दिखाऊँगा, मैं इनका स्वागत करूँगा।

केदारनाथ जी ने आगे कहा पिछले साठ-पैसठ वर्ष से मैं कविता को देख-पढ़-समझ रहा हूँ, लेकिन जब मैंने इन कविताओं की भाषा और उसके तेवर को देखा तो थोड़ा चौका कि जो प्रसाद-पंत-निराला के समय की भाषा थी, और जो आपकी भाषा है, कितनी लम्बी छलांग है। हिन्दी भाषा तो पिछले 100 सालों में बनी है, कविता की भाषा तो अब तैयार हुई है। मुझे लगता है कि आपके पास कविता लिखने के लिए भाषा तैयार है। आपकी कविताओं का तेवर अलग है, कहने के अंदाज़ में थोड़ा नयापन है, पृथक हैं आप। इस संग्रह में कई धरातल की कविताएँ हैं। कई तरह की शैलियाँ हैं। जब कविताएँ आपका हाथ पकड़ लें, जाने न दें तो समझो कि कविता सफल है। इस संग्रह की कई कविताओं ने मुझे रोका-टोका। कुछ ऐसे कवि जिनमें खास तरह की प्रौढ़ता दिखाई पड़ती है। नाम तो कई हैं, लेकिन मैं खास तौर से गौरव सोलंकी की चर्चा करना चाहूँगा। इनकी कविताओं में क्षितिज तक पहुँचने के बाद की प्रौढ़ता का एहसास होता है।

अपने वक्तव्य में केदारनाथ सिंह ने गौरव सोलंकी की कविता 'जरा सी अनपढ़ता और बहुत सारी बेवकूफी के लिए' और पावस नीर की कविता 'जुलाई का पहला हफ्ता' को उपस्थित दर्शकों को पढ़कर भी सुनाया। (अपनी टिप्पणियों के साथ)

कार्यक्रम के अगले चरण में उमेश पंत ने 'कश्मीर' कविता, अपूर्व शुक्ल ने 'समय की अदालत में' कविता और देवेन्द्र कुमार पाण्डेय ने 'आयल वेलेन्टाइन' कविता का पाठ किया।

अंत में हिन्द-युग्म के वरिष्ठ सदस्य प्रेमचंद सहजवाला ने उपस्थित अतिथियों और दर्शकों को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में हिन्द-युग्म के सदस्यों के अलावा हास्य कवयित्री सरोजिनी प्रीतम, विदेश से हिन्दी साहित्य साधना में रत युवा कवयित्री कविता वाचक्नवी जैसे गणमान्य लोग भी उपस्थित थे।

तस्वीरों में-


कार्यक्रम की शुरूआत पहले मंच सजाते हिन्दयुग्मी


संचालक निखिल आनंद गिरि


कार्यक्रम की शुरूआत में उपस्थित दर्शक


मंच पर अतिथियों को बिठाते सफादक शैलेश भारतवासी


केदारनाथ सिंह और आनंद प्रकाश


दर्शक


दर्शक


मुख्य अतिथि केदारनाथ सिंह को स्मृति-चिह्न और पुष्पगुच्छ भेंट करतीं नीलम मिश्रा


मुख्य वक्ता आनंद प्रकाश को स्मृति-चिह्न और पुष्पगुच्छ भेंट करतीं आकांक्षा पारे


काव्यपाठ करते यूनिकवि अखिलेश कुमार श्रीवास्तव


काव्यपाठ करतीं युवाकवयित्री आकांक्षा पारे


विमोचनोपरांत सम्भावना डॉट कॉम पर अपने हस्ताक्षर दर्ज करते मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता


सम्भावना डॉट कॉम की सहस्ताक्षरित प्रति ग्रहण करते युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी


अपना वक्तव्य देते आनंद प्रकाश


काव्यपाठ करते मेजर गौतम राजरिशी


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते मुकेश कुमार तिवारी


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते अपूर्व शुक्ल


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते रवीन्द्र शर्मा रवि


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते अखिलेश कुमार श्रीवास्तव


काव्यपाठ करते देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

चौकी सब जानती है


चौकी जानती है
कि आदमी
जब तक उस पर सोता है
पलंग के लिए रोता है

पलंग क्या जाने
आदमी क्या होता है!

वह तो
चार-पांच इंच मोटे 'डनलप' के तले
सुन भी नहीं सकता
आदमी की धड़कन
वह क्या जाने
उसका
तन-मन!

चौकी सब जानती है।

पतले गद्दे के तले
सांस रोके सुनती है
एक-एक धड़कन

सावन में भीगना
गरमी में तपना
जाड़े में उधड़ जाना
जानती है गद्दे का
दिन-दिन
फटते चले जाना

रूई का रूठना
ऐंठना
गाँठ पड़ जाना

गठ्ठर में बंधना
धुनना
नई खोली में
तगा जाना

चौकी
गद्दे के मुँह
आदमी का हर दर्द
रोज महसूस करती है

सावन में पसीजती
गर्मी में तपती
जाड़े में खिल जाती है

चौकी
आदमी के संघर्ष की साथी होती है
चौकी सब जानती है।

तड़पती तो तब है
जब पलंग के मिलते ही
आदमी
उसे बेच देता है

दूसरे दिन
उस पर
नया आदमी
अपने पतले गद्दे दे साथ
पलंग का ख्वाब लिए
दुःखी-दुःखी सोता है।

पलंग क्या जाने
आदमी क्या होता है !


--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

तू है कौन, कौन हैं तेरे


ताल-तलैया पी कर जागा
नदी मिली सागर भी मांगा
इतनी प्यास कहाँ से पाई
हिम से क्यों मरूथल तक भागा

क्यों खुद को ही, रोज छले रे
तू है कौन, कौन हैं तेरे

सपनों को अपनों ने लूटा
एक खिलौना था जो टूटा
छोड़ यहीं सब झोला-झंखड़
चल निर्जन में यह जग झूठा

भज ले राम, राम हैं तेरे
तू है कौन कौन हैं तेरे

घट पानी का पनघट ढूँढ़े
भरे लबालब मद में डूबे
सर चढ़ कर जब लगे डोलने
ठोकर खाए खट से फूटे

जो संभले वो पार लगे रे
तू है कौन कौन हैं तेरे।

आग


नदी के किनारे
'और' आग तलाशते
एक युवक से
बुझी हुई राख ने कहा-
हाँ !
बचपन से लेकर जवानी तक
मेरे भीतर भी
यही आग थी
जो आज
तुम्हारे पास है।
बचपन में यह आग
दिए की लौ के समान थी
जो 'इन्कलाब जिंदाबाद' के नारे को
'तीन क्लास जिंदाबाद' कहता था
और समझता था
कि आ जाएगी एक दिन 'क्रांति'
बन जाएगी अपनी
टपकती छत !

किशोरावस्था में यह आग और तेज हुई
जब खेलता था क्रिकेट
शहर की गलियों में
तो मन करता था
लगाऊँ एक जोर का छक्का
कि चूर-चूर हो जाएँ
इन ऊँची-ऊँची मिनारों के शीशे
जो नहीं बना सकते
हमारे लिए
खेल का मैदान !

युवावस्था में कदम रखते ही
पूरी तरह भड़क चुकी थी
यह आग
मन करता था
नोंच लूँ उस वकील का कोट
जिसने मुझे
पिता की मृत्यु पर
उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए
सात महिने
कचहरी का चक्कर लगवाया !

तालाब के किनारे
मछलियों को चारा खिलाते वक्त
अकेले में सोंचता था
कि बना सकती हैं ठहरे पानी में
अनगिन लहरियाँ
आंटे की एक छोटी गोली
तो मैं क्यों नहीं ला सकता
व्यवस्था की इस नदी में
उफान !

मन करता था
कि सूरज को मुठ्ठी में खींचकर
दे मारूँ अँधेरे के मुँह पर
ले !
चख ले धूप !
कब तक जुगनुओं के सहारे
काटेगा अपनी रातें !

हाँ
यही आग थी मेरे भीतर भी
जो आज
तुम्हारे पास है।

नहीं जानता
कि कब
किस घाट पर
पैर फिसला
और डूबता ही चला गया मै भी।

जब तक जिंदा रहा
मेरे गिरने पर
खुश होते रहे
मेरे अपने
जब मर गया
तो फूँककर चल दिए
यह बताते हुए कि
राम नाम सत्य है।
-------------------
कवि-- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

जीने का यही 'आर्ट' है


जीने की कला


वह
एक पंथ दो काज करता है
कल के लिए आज मरता है

मार्निंग वॉक के समय
तोड़ लाता है
सार्वजनिक उद्यान से
पूजा के लिए फूल

अखबार पढ़ते-पढ़ते
पी लेता है
चाय

नहाते वक्त
गा लेता है
गाना

पूजा के समय
दे देता है
पूरे घर को
उपदेश

खाते-खाते
देख लेता है
टी०वी०

मोटर साइकिल चलाते-चलाते
कर लेता है
जरूरी काम की बातें

काम करते-करते
कर लेता है
क्रिकेट, राजनीति, मौसम, या फिर
देश के हालात पर चर्चा

कम्प्यूटर में
एक साथ
सुनता है म्युजिक
करता है चैट
देखता है वेबसाइट

और
थककर सोते वक्त
रिश्तों की चिंता

सभी कहते हैं
वह बहुत 'स्मार्ट' है
क्या जीने का
यही 'आर्ट' है !

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

अखबार


रोज सुबह
अखबार वाला
सावधानी से टाँग जाता है
दरवाजे पर
अखबार।

जानता है
कि जमीन पर फेंक दिया
तो काट कर फाड़ देगा
इस घर का जंगली कुत्ता।

हाँ !
पालतू होते हुए भी
जंगली है मेरा कुत्ता
नहीं चाहता
कि पढूं अखबार
जानूं समाचार।

उसे क्या मतलब इस बात से
कि हुआ हो शहर के एक ही घर में
सामुहिक नरसंहार

तीन बेटियों के साथ
ट्रेन से कटकर मर गई हो माँ

बच्चे को स्कूल छोड़ते वक्त
खींच ली हो किसी ने
महिला के गले से
सोने की चेन

उठा ली गई हो
स्कूल जाती लड़की

मिली हो लाश
मासूम बच्चे की
चौराहे पर

घूस लेते रंगे हाथ
पकड़ा गया हो
सरकारी दफ्तर का बाबू

हो गई हो
अफशर को पीटने वाले विधायक की
जमानत मंजूर

राह चलते
गोली मारकर
लूट लिया गया हो
प्रतिष्ठित व्यापारी

या.....
सड़क हादसे में
चली गई हों
चार और जानें।

मूर्ख नहीं जानता
कि मैं एक जिम्मेदार नागरिक हूँ
मुझे जाननी है
हर छोटी-बड़ी खबर

मैं उसकी तरह
कुत्ता नहीं हूँ
जिसे होती है हरदम
सिर्फ रोटी की चिंता

किस्मत के मारे
अपने हुए
तो प्रकट करनी है
गहरी संवेदना
गैर हुए
तो लेनी है
संतोष की सांस।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

भारत आज भी बहरा है शहर में गूँगा है गाँव में


लिंग भेद

हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।

मैने कहा-
अरे, यह तो पूरा मामला ही उलट गया
लगता है 'शनीचर' आपसे लिपट गया।
फिर बात बनाई
कोई बात नहीं
लड़का-लड़की एक समान होते हैं
समझो 'ल‌क्ष्मी' आई।

सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे
कुबेर !

पंडि जी-
झूठ कब तक समझाइयेगा
हकीकत कब बताइयेगा ?

आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर-दुकान
वर का पिता-दुकानदार
वर-मंहगे सामान होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

आपने जीवन भर
लड़की को लक्ष्मी
लड़के को खर्चीला बताया
मगर जब भी
अपने घर का आर्थिक-चिट्ठा बनाया
पुत्री को दायित्व व पुत्र को
संपत्ति पक्ष में ही दिखाया।

मैने कहा-
ठीक कहते हैं यादव जी
पाने की हवश और खोने के भय ने
ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है
जहाँ-

बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।

-------------------------------
पड़वा- भैंस का नर बच्चा ।
पपलू- ताश के एक खेल का सबसे कीमती पत्ता.

बोझ


अलसुबह
दरवाजे पर दस्तक हुई !
देखा-
सामने यमराज खड़ा है।

मारे डर के घिघ्घी बंध गई
बोला-
अभी तो मैं जवान हूँ
कवि सम्मेलनों का नया-नया पहलवान हूँ
आपको कोई दूसरा दिखा नहीं !
जानते हैं, मैने अभी तक कुछ लिखा नहीं।
क्या गज़ब करते हैं !
कवि क्या बिना लिखे मरते हैं?

यमराज सकपकाया
मेरा परिचय जान घबड़ाया
मैं तुझे नहीं झेल सकता
नर्क में भी, नहीं ठेल सकता
मगर आया हूँ तो खाली हाथ नहीं जाऊँगा
अभी तेरे बालों की कालिमा लिये जा रहा हूँ
भगवान ने आदेश दिया तो फिर आऊँगा !

सुनते ही मैं खुश हो गया
सोचा वाह कितना अच्छा है कि कवि हो गया
बोला-
जा, ले जा, तू भी क्या याद करेगा !
मैं सफेद बालों से ही काम चला लूँगा
स्पेशल हेयर डाई लगा लूँगा।

कुछ वर्षों के बाद
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई
खोला, देखा, काँप गया
वही यमराज खड़ा है भांप गया।

हिम्मत जुटा कर बोला-
आइये-आइये
मैंने दो-चार कविता लिखी है
सुनते जाइये
वह सुनते ही रोने लगा
मुझे लगा उसे भी कुछ-कुछ होने लगा।
दुःखी होकर बोला यमराज
मुझे माफ करना कविराज
मैं आना नहीं चाहता
मगर तेरी मौत यहाँ खींच लाती है
पता नहीं आदमी को पहचानने में
भगवान से बार-बार क्यों चूक हो जाती है !

मगर आया हूँ तो खाली हाथ नहीं जाऊँगा
इस बार तेरे आँखों की थोड़ी रोशनी ले जाऊँगा !

मैने कहा
जा, ले जा, मैं चश्में से काम चला लूँगा
मगर फिर आया तो अपनी सारी नई कविता तुझे सुना दूँगा
सुनते ही यमराज भाग गया
इस तरह मेरा भाग्य, फिर जाग गया।
कुछ वर्षों बाद वह फिर आया
अबकी बार मेरे दो दांत उखाड़ ले गया
मैंने तुरंत नकली दांत लगा लिया।

सोचता हूँ
फिर आया तो क्या करूँगा
कौन सा अंग दे उसे संतुष्ट करूँगा !

सोचता हूँ
अब आए तो उसके साथ चल दूँ
हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा है
आज बेटा भी तभी तक प्यार करता है
जब तक छोटा बच्चा है।

सुना है
समाज में लाचार जिस्म
परिवार वालों के लिए बोझ होता है
अब कौन उसे ताउम्र प्रेम से ढोता है
उड़ने लगे गगन में रिश्ते जमीन से
डरने लगे प्रमोद अपने प्रवीन से।

सुना है
यहाँ पती, पत्नी को -- पत्नी, पती को -- भाई, भाई को -- बेटा, बाप को
धोखा देता है
किस्मत वालों को ही ईश्वर
सही सलामत जाने का मौका देता है।

सोचता हूँ
अब आये तो चल दूँ।

हाथ-पैर सलामत रहे तभी जाना अच्छा है
आज बेटा भी
तभी तक प्यार करता है
जब तक छोटा बच्चा है।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

सूखा


सब चीख रहे थे
सूखा-सूखा
और वे
माप रहे थे - वर्षा का पानी !

उनके सलाहकार
एअरकंडीशन कमरों से निकलकर
खेतों की मेढ़ों तक गए
मेंढक से पूछा
झींगुर से पूछा
मोरों से पूछा
काले कौओं से भी पूछा
नहीं पूछा
तो सिर्फ
पथरीली जमीन पर
पसीना चुहचुहाते
फावड़ा उठाए घूम रहे
उस भूखे नंगे किसान से
जो अपनी किस्मत पर रो रहा था।
गहन जांच के पश्चात रिपोर्ट दी-
व‌र्षामापी यंत्र सहायक की आख्या,
अखबारों की रिपोर्ट,
और छत पर रक्खे
पानी की टंकी पर मडराते
कौओं के झुण्ड को देखकर
ऐसा प्रतीत होता है
कि यह क्षेत्र सूखा ग्रस्त है।

विद्वान सलाहकारों की रिपोर्ट के आधार पर
सम्पूर्ण ‌क्षेत्र को सूखा-ग्रस्त घोषित कर दिया गया।

राहत की घोषणा हुई
उनके सिपहसलार
राहत की राशि लेकर
फिर एक बार
खेतों की मेड़ों तक गए
मेंढक को दिया
झींगुर को दिया
मोरों को दिया
काले कौओं को भी दिया
नहीं दिया
तो सिर्फ
उस भूखे-नंगे किसान को नहीं दिया
जो अब चीख रहा था
यह सूखा नहीं अकाल है।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

मेला - भूखे बेच रहे थे दाना


हमने देखे गजब नजारे मेले में।
लाए थे वो चाँद-सितारे ठेले में।।

बिन्दी-टिकुली चूड़ी-कंगना
झूला-चरखी सजनी-सजना
जादू-सरकस खेल-खिलौने
ढोल-तराने मखणी-मखणा

मजदूरों ने शहर उतारे मेले में।
हमने देखे गजब नजारे मेले में।।

भूखे बेच रहे थे दाना
प्यासे बेच रहे थे पानी
सूनी आँखें हरी चूड़ियाँ
सपने बेच रहे ज्ञानी

बच्चों ने बेचे गुब्बारे मेले में।
हमने देखे गजब नज़ारे मेले में।।

बिकते खुशियों वाले लड्डू
एक रुपैया दो-दो दोना
हीरे वाली गजब अंगूठी
चार रुपैया चांदी - सोना

अंधियारे दिखते उजियारे मेले में।
हमने देखे गजब नजारे मेले में।।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

सावन की बरसात


बादल-बिजली गड़गड़-कड़कड़ चमके सारी रात।
टिप्-टिप्-टिप्-टिप् टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।


खिड़की-कुण्डी खड़खड़-खड़खड़ सन्नाटे का शोर
करवट-करवट जागा करता मेरे मन का चोर
मेढक-झींगुर जाने क्या-क्या कहते सारी रात
टिप्-टिप्-टिप्-टिप् टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।


अंधकार की आँखें आहट और कान खरगोश
अपनी धड़कन पूछ रही है तू क्यों है खामोश
मिट्टी की दीवारें लिखतीं चिट्ठी सारी रात
टिप्-टिप्-टिप्-टिप् टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

बूढ़े बरगद पर भी देखो मौसम की है छाप
नयी पत्तियाँ नयी लताएं लिपट रहीं चुपचाप
जुगनू-जुगनू टिम-टिम तारे उड़ते सारी रात
टिप्-टिप्-टिप्-टिप् टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।


टुकुर-टुकुर देखा करती है सपने एक हजार
पके आम के नीचे बैठी बुढ़िया चौकीदार
उसकी मुट्ठी से फिसले है गुठली सारी रात
टिप्-टिप्-टिप्-टिप् टिप्-टिप्-टिप्-टिप् सावन की बरसात।।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

पानी की मार


बचपन में
जब जाता था परीक्षा देने या
जब जाते थे पिताजी घर के बाहर दूर किसी काम से
तो माँ
झट से रख देतीं थीं दरवाजे पर दो भरी बाल्टियाँ
कहती थीं-
शुभ होगा।
आज
जब निकलना चाहता हूँ घर के बाहर
तो पत्नी
झट से रख देती है दरवाजे पर दो खाली बाल्टियाँ
इस अनुरोध के साथ
कि पहले ले आइए पड़ोस से दो बाल्टी पानी़, प्लीज....
घर में एक बूंद नहीं है पीने के लिए।
पहले
पिताजी डांटते थे
कि बिना स्नान-ध्यान किए
सुबह-सुबह खाली मस्तक बाहर जा रहे हो
अपना तो जीवन चौपट कर ही रहे हो
क्यों दूसरों का भाग्य भी बिगाड़ते हो ?
मैं डरते-डरते पूछता-
दूसरों का कैसे पिताजी !

वो समझाते-
बिना हाथ में झाड़ू लिए जमादार या
बिना मस्तक पर चंदन लगाए ब्राम्हण का बच्चा
सुबह-सुबह दिख जाए तो भारी अशुभ होता है
क्योंकि ब्राम्हण का कर्म है
सुबह-सुबह उठकर स्नान-ध्यान करना
जमादार का कर्म है- झाड़ू लगाना
जो ऐसा नहीं करते वो कर्महीन हैं
और कर्महीन का दर्शन भी अशुभ होता है।
आज
जब मेरा बेटा
मेरे द्वारा मुश्किल से लाए पानी की बाल्टी को खाली करना चाहता है
तो डांटता हूँ--
रोज नहाना जरूरी है क्या ?
घर में पीने के लिए पानी नहीं है और लाट साहब चले स्नान करने!
अकेले में सोचता हूँ

कैसे बदल जाते हैं संस्कार
जब पड़ती है पानी की मार !

आज
घर से बाहर निकलते ही
दिखते हैं जगह-जगह
कूड़े के ढेर, खाली बाल्टियाँ
मगर नहीं दिखते कभी
ब्राम्हण के बच्चे।

तो क्या सर्वत्र अशुभ ही अशुभ?
कर्महीन तो कोई नहीं दिखता!

दिखाई देती है -
भागम भाग
पीछे छूटने का भय, आगे निकलने की होड़!
लोगों की आंखों मे नहीं दिखाई देती
करूणा की बूंद
दिखती है-
तो सिर्फ एक गहरी प्यास।

बेमानी लगती हैं सागर छलकाती मस्त निगाहों की बातें
लगता है कि
धीरे-धीरे
लोग होते जा रहे हैं
बे-पानी
धीरे-धीरे
गिरता जा रहा है
धरती का जलस्तर।

---देवेन्द्र पाण्डेय

एम. एफ. हुसैन की पेंटिग्स पर झूमते लोग


आज बसंत पंचमी है। मेरा वास्तविक जन्म दिन । परिचय में जो मैने लिखा- वह मेरे स्व० पिताजी का स्कूल में दाखिला के समय लिखाई गई तिथि है। इस अवसर पर अपनी एक कविता जो मैंने वर्ष १९९९ में लिखी थी, आप सबकी नज़र कर रहा हूँ।

सरस्वती पूजा

सरस्वती की प्रतिमा
भांग या शराब के नशे में चूर
थिरकते कदम
उल्लू बनकर उछलते-कूदते
कमसिन लड़के-लड़कियाँ
लाउड-स्पीकर पर तेज फिल्मी धुन
'ऐ क्या बोलती तू' .... या 'छम्मा-छम्मा'

जबरदस्ती उगाहे चन्दे की कमाई
और खर्च के हिसाब का झगड़ा
सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रोत्साहन पर
मोहल्ले के दादा का आशीष वचन
अपने ही घर के बच्चों की पंडाल में जाने की ज़िद
मेरी सलाह को दकियानूसी बताकर हंसना

दुःख और क्षोभ से बंद आंखों ने देखा
पंडाल की दीवारों पर हर जगह
एम. एफ. हुसैन की नृत्य करती सरस्वती
और उस पर झूमते लोग

पहचाना
ये वही लोग थे
जो जला रहे थे
एक दिन
एम. एफ. हुसैन की पेंटिग्स ।

----देवेन्द्र पाण्डेय

आयल वेलेन टाइन (काशिका बोली में)


पिछले हफ्ते एक भोजपुरी कविता भेजी थी इस बार एक काशिका बोली मे लिखी कविता भेज रहा हूँ। प्रस्तुत कविता काशिका बोली में हास्य-व्यंग शैली में लिखी गयी है। काशी क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली काशिका बोली के नाम से जानी जाती है। काशिका बोली भोजपुरी का ही एक रूप है।
बंसत आने को है। यह मौसम हम भारतीयों में ही नहीं विदेशियों को भी जश्न मनाने का अवसर देता है। बंसत के बाद फागुन का त्योहार हम सदियों से मनाते चले आ रहे हैं। बसंत और फागुन के बीच कुछ वर्षों से भारत में एक और दिन त्योहार की तरह मनाया जाने लगा है। वह है--वेलेन टाइन डे। इसी को लक्ष्य कर लिखी गयी है कविता--वेलेन टाइन।

--देवेन्द्र पाण्डेय


वेलेन टाइन

बिसरल बंसत अब तs राजा
आयल वेलेन टाइन ।
राह चलत के हाथ पकड़ के
बोला यू आर माइन ।

फागुन कs का बात करी
झटके में चल जाला
ई त राजा प्रेम क बूटी
चौचक में हरियाला

आन क लागे सोन चिरैया
आपन लागे डाइन
बिसरल बसंत अब तs राजा
आयल वेलेन टाइन।

काहे लइका गयल हाथ से
बापू समझ न पावे
तेज धूप मा छत मा ससुरा
ईलू--ईलू गावे

पूछा त सिर झटक के बोली
आयम वेरी फाइन।
बिसरल बंसत अब तs राजा
आयल वेलेन टाइन।

बाप मतारी मम्मी-डैडी
पा लागी अब टा टा
पलट के तोहें गारी दी हैं
जिन लइकन के डांटा

भांग-धतूरा छोड़ के पंडित
पीये लगलन वाइन।
बिसरल बंसत अब तs राजा
आयल वेलेन टाइन ।

दिन में छत्तिस संझा तिरसठ
रात में नौ दू ग्यारह
वेलेन टाइन डे हो जाला
जब बज जाला बारह

निन्हकू का इनके पार्टी मा
बड़कू कइलन ज्वाइन।
बिसरल बसंत अब त राजा
आयल वेलेन टाइन।

डड़ौंकी (एक भोजपुरी कविता)


उठल डड़ौकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

बड़कू कs बेटवा चिल्लायल, निन्हकू चच्चा भाग जा
गरजत हौ छोटकी कs माई, भयल सबेरा जाग जा
घर से निकलल घूमे-टहरे , चिंता धरल कपाल बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

घर में बिटिया सयान हौ, बेटवा बेरोजगार हौ
सुरसा सरिस बढ़ल मंहगाई, बेइमान सरकार हौ
काटत-काटत, कटल जिन्दगी, कटत न ई जंजाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा

हमके लागत बा दहेज में बिक जाई सब आपन खेत
जिनगी फिसलत हौ मुट्ठी से जैसे गंगाजी कs रेत
मन ही मन ई सोंच रहल हौ, आयल समय अकाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा।

कल कह देहलन बड़कू हमसे का देहला तू हमका
खाली आपन सुख की खातिर पैदा कइला तू हमका
सुनके भी ई माहुर बतिया काहे अटकल प्रान बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

ठक-ठक, ठक-ठक, हंसल डंड़ौकी, अब तs छोड़ा माया-जाल
राम ही साथी, पूत न नाती, रूक के सुन लs काल कs ताल
सिखा के उड़ना, देखाss चिरई, तोड़त माया जाल बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

प्रेम


तुम
एक दिन
उलझे मंझे की तरह
लिपट गए थे
मेरी जिन्दगी से

मैंने
घंटों.....
धूप में खड़े होकर
तुम्हें सुलझाया है ।

आज
जब तुम्हारे सहारे
मन-पतंग
हवा से बातें करता है
तो झट
तुम्हें
अपनी उंगलियों में
लपेटने लगती हूँ ।

डरती हूँ
कि कहीं
किसी की
नज़र न लग जाए........

डरती हूँ
कि कहीं
तू
फिर
उलझ न जाए......!

--देवेन्द्र कुमार पान्डेय

दंश


गली के मोड़ पर
उजा़ले में
कुतिया ने बच्चे दिए
जाड़े में

एक-दो नहीं पूरे सात
ठंड से बचाती रही वह उन्हें
पूरी रात
सबके सब सुंदर प्यारे थे
माँ की आँखों के तारे थे
सुबह तक एक खो चुका था
शायद अल्लाह का प्यारा हो चुका था

बचे छः
सह गयी वह
कष्ट दुःसह।

कोई पास से गुजरता तो गुर्राती
दिन भर यहाँ-वहाँ छुपाती
फिर आती हाड़ कंपा देने वाली काली रात
बच्चों को चिपकाती अपने स्तन से
सारी रात
उफ !
रात भर उसका रोना
मुश्किल था हमारा सोना

सुबह तक एक और खो चुका था
शायद किसी का हो चुका था

यमराज ले जाए या आदमी
बच्चे गुम हो रहे थे
कुतिया को गिनती नहीं आती
पर इतना जानती
कि बच्चे
कम हो रहे थे

कातर निगाहों से
उन्हीं से मदद की उम्मीद करती
जो अब
हल्की गुर्राहट से भी डरने लगे हैं
हाथों में डंड़ौकी ले
घरों से निकलने लगे हैं।

दिन गुजरते जाते हैं
एक-एक कर पिल्ले गुम होते जाते हैं।

एक दिन बर्तन माजने वाली बताती है-
कुतिया का सिर्फ एक पिल्ला बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा....!

मेरी पत्नी पूछती है-
पिल्ले को छोड़, तू बता
तेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?
वह बताती है-
उसका बाप उसे मुम्बई ले गया है
वहाँ एक बहुत बड़ा साहब रहता है
अब वह वहीं रहेगा
एक हैजा से मर गया
दूसरा अपने से भाग गया
यही बचा था
इसे भी इसका बाप ले गया
कहते-कहते उसकी आँखें डबडबा गईं।

मैने सुना
बर्तन मांजत-मांजते
बीच-बीच में बड़बड़ाती जाती है-

कुतिया का सिर्फ एक बच्चा बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा..!

मैने महसूस किया
एक वफादारी
दूसरे निर्धनता का दंश
झेल रहे हैं।

देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

आज वे............


इस कविता को हिन्द-युग्म पर प्रकाशित करने का खयाल मुझे तब आया, जब मैंने श्री मनुज मेहता द्वारा संकलित वृद्धाश्रम की तश्वीरें देखी। काव्य-पल्लवन का विषय भी यही था, लेकिन इस कविता का जन्म ऐसे ही एक वृद्धाश्रम की हालत देख कर इसके पूर्व ही हो चुका था, अतः मैंने इसे उस समय भेजना उचित नहीं समझा। मनुज मेहता से मैंने वादा किया था कि काव्य-पल्लवन का अंक प्रकाशित होने के बाद मैं अपनी कविता अवश्य भेजूंगा। प्रस्तुत है कविता--आज वे........
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आज वे............

आश्रम के कमरों में
मानवता की खूँटी से
लटके हुए हैं
ज्यों लटकते हैं
घड़े
नदी तट पर
पीपल की शाख से
माटी के।

एक दिन वे थे
जो देते गंगाजल
एक दिन ये हैं
जो मारते पत्थर
दर्द से जब तड़पते हैं
एक दूजे से कहते हैं

अपने सिक्के ही ‌खोटे हैं
रिश्ते
जाली के।

थे जिनके
कई दीवाने
थे जिनके
कई अफसाने
आज
दर-ब-दर भटकते हैं
सबकी आँखों में
खटकते हैं
अब न मय
न मयखाने

होंठ प्यासे हैं
साकी के।

धूप से बचे
छाँव में जले
कहीं जमीं नहीं
पांव के तले
नई हवा में
जोर इतना था

निवाले उड़ गए
थाली के।

क्या कहें !
क्यों कहें !
किससे कहें !

ज़ख्म गहरे हैं
माली के।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

आतंकवादी


सुबह
आँख खुलते ही मैंने देखा
मच्छरदानी के भीतर बहुत से मच्छर हैं
मोटे-मोटे, लाल-लाल
मेरा खून पीकर मस्त
छोटे-छोटे छिद्रों से
बाहर निकलने का मार्ग ढूँढ़ने में व्यस्त
लम्बे पैरों वाले रक्त पिपासु मच्छर !

नहीं
कोई मुझे काट नहीं रहा था
न ही मेरे शरीर का कोई अंग
इनके काटने से दुःख रहा था
मैंने सोचा
मुक्त कर दूं इन्हें कैद से
नाहक क्यों गंदा करूं अपना हाथ
इन्हें मारकर।

तभी अखबार वाला अखबार दे गया
लेटे-लेटे पढ़ने के लिए उठाया
हेडलाइन्स पर निगाह गई-
मुम्बई में आतंकवादियों द्वारा सौ से अधिक लोगों की हत्या
मरने वालों में
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर भी-----
आगे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई

मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ
मैने मच्छरदानी को चारों ओर से कस कर बंद कर दिया
और चुन चुनकर मच्छरों को मारने लगा।

हर बार
जब मेरी हथेलियाँ आपस में टकरातीं
तो उससे निकलने वाली करतल ध्वनि
मुझे और हिंसक बना देती

धीरे-धीरे सारे मच्छर मर गये
मैंने देखा-
मेरी हथेलियों में मेरा ही खून उतर आया था
मैंने उठकर हाथ धोया
और चाय की प्याली में
नई सुबह की धूप घोलकर पीने लगा।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

सुन्दर


एक दिन
मार्निंग वॉक के समय
मैने अपने मित्र से कहा--
आजकल बहुत चोरी हो रही है।
उसने कहा--
हाँ, चोरी क्या, सीनाजोरी भी हो रही है।
मैने कहा--
कुछ सलाह दो।
उसने कहा--
एक कुत्ता पाल लो।
मुझे मित्र की सलाह अच्छी लगी
गली में बहुत से कुत्तों के पिल्ले घूम रहे थे
आव देखा न ताव
एक को उठाया
और झट से कर लिया घर के अन्दर
बच्चे देखकर खुश हुए
बोले--
सुन्दर है।
मैने उसका नाम भी रख लिया--
सुन्दर !
दूसरे दिन
मैने अपने मित्र से कहा--
तुमने सलाह दिया
मैने मान लिया
तुमने सुना
मैने एक कुत्ता पाल लिया।
दोस्त को आश्चर्य हुआ
अच्छा !
विलायती है !
मैने गर्व से कहा--
नहीं,
देसी है।

उसने बुरा सा मुंह बनाया
देसी !
कुत्ता वह भी देसी !

मैने पूछा--
क्यों,
देसी स्वामिभक्त नहीं होते ?

उसने कहा--
नहीं यह बात नहीं।

तो ?

देसी स्वामिभक्त होते हैं
मगर विलायती के आगे दुम हिलाने लगते हैं !

दयालू होते हैं
खूंखार नहीं होते।

चोर और पड़ोसी से बचने के लिए
कुत्ता खूंखार होना चाहिए !

खूंखार शब्द सुनकर
मेरी आँखों के सामने
उसकी पत्नी का चेहरा नाच गया।

मैने मासूमियत से पूछा--
तुम्हारी बीबी विलायती है !

सुनकर वह नाराज हो गया।
काफी देर बाद बोला--

बीबी देसी ही ठीक है
मगर कुत्ता विलायती होना चाहिए।
दोगली नस्ल का मिल जाय तो और भी अच्छा।

मैने उलाहना दिया--
तो पहले क्यों नहीं बताया ?
मैने उसे अपने हिस्से का दूध भी पिलाया !

उसने मेरी पीठ थपथपाई
कोई बात नहीं
जब पाल लिया है तो पालो
मगर सुनो,
रैबिश का इंजेक्शन भी लगवा लो।
उसी दिन मैं कुत्तों के डाक्टर के पास गया
उसने मुझे
इंजेक्शन, दवाइयों की लिस्ट थमा दिया।
बोला--
मेरा आदमी आपके पास चला जाएगा
समय-समय पर सारे इंजेक्शन लगाकर आ जाएगा
अभी ये दो बोतल शीरफ और कुछ टेबलेट्स लेते जाइये
सुबह-शाम दूध के साथ मिलाकर रोज पिलाइये।

मैने पूछा--
अच्छा !
कित्ता हुआ ?
डाक्टर बोला--
ज्यादा नहीं अभी तो सिर्फ एक हजार ही हुआ !
दाम सुनकर मेरा माथा ठनका
थोड़ा चीखा थोड़ा झनका

हे राम !
एक कुत्ते की दवाइयों के इत्ते दाम !

डाक्टर बोला--
बोला क्या जबड़े से बंधा शेर खोला--

इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

क्या समझते हैं
कुत्ते का पिल्ला
आदमी के बच्चे से सस्ता होता है ?
जनाब
इसको पालने में ज्यादा खर्च होता है।
मैं बुरी तरह फंस चुका था
चार लोग मुझे इतने उपहास पूर्ण नजरों से घूर रहे थे
मानों मुझे इतनी छोटी सी बात का भी ग्यान नहीं !
मैने कांपते हाथों से पैसा बढ़ाया
दवाइयों से भरा पॉलीथीन का थैला उठाया
और बिना कुछ बोले घर की ओर भारी कदमों से चलने लगा-----।
रास्ते भर
मेरी वणिक बुद्धि
मुझे धिक्कारती रही--
मूर्ख,
क्या करता है ?
विलायती होता तो और बात थी
देसी पर इतना खर्च करता है !
रास्ते भर
मेरी अंतरात्मा
मुझे समझाती रही--
कि दवा-दारू
खान-पान
शिक्षण-प्रशिक्षण का रखा जाय
भरपूर ध्यान
तो देसी भी हो सकते हैं विलायती से अच्छे

फिर चाहे
कुत्तों के पिल्ले हों
या गली में घूमते अनाथ, लावारिस,
आदमी के बच्चे।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय