वो जो एक कमरा था बित्ते भर का,
और हम-तुम भी थे इत्ते भर के..
बंद कमरे में हंसी देर तलक,
चुप-सी दीवारें भी सुनती ही रहीं.....
एक मैं था कि तेरे कहने पर,
शाम तक गाता रहा खुश होकर,
तुम किसी बुत की तरह सुनती रहीं,
लफ्ज़ों के बीच सांसों के मानी....
वक्त ने पढ़ लिए थे छुप-छुप कर,
एक ख़त था जो तुम्हारी खातिर,
फिर हवाओं ने भी चुगली की थी,
मेरा सब लुट गया था, तुम चुप थे...
याद है एक सुबह बस का सफ़र,
फिर हवाओं ने साज़िश की थी,
पूरी कायनात मेरे बस में थी,
तुमने कांधे पे सर रखा था जब...
वो सहेली कि जिसकी खातिर,
मेरे जज़्बात रोज़ क़त्ल हुए,
मुझसे हंस-हंस के अब भी कहती है,
सबकी किस्मत में नहीं होते ख़ुदा,
एक वो दिन की मछलियों का शहर,
मुझपे कहर जैसा टूट कर बरसा,
इस क़दर तुम नज़र से गिरते रहे,
बह गया आंसुओं में सारा शहर....
आज हाथों में आईना लेकर,
ख़ुद को पहचानने की कोशिश है,
नया चेहरा है, नये मंज़र हैं,
तुम नहीं हो कहीं भी, दूर तलक...
पुरानी यादों के कैनवास से,
एक-एक कर मिटा दिए सब रंग,
23 जून..
बस यही तारीख़ है कि मिटती नहीं,
मेरी जां लेगी देखना इक दिन............
निखिल आनंद गिरि