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गोष्ठी 12 - दोहा दे शुभकामना


दोहा दे शुभकामना, रहिये सदा प्रसन्न.
कीर्ति सफलता लाई है, बैसाखी आसन्न.

आभारी हैं हम सभी, हुए उपस्थित श्याम.
शोभा कक्षा की बड़ी, है सुझाव अभिराम.

छंदत्रयी से दिल लगा, जिसका वह है धन्य.
ध्वज फहरातीं अजित जी, प्रतिभापुंज अनन्य.


अजित जी! 'दयी' का उपयोग करना अपरिहार्य तो नहीं है...शेष सही, बधाई. कुंडली लेखन का अच्छा प्रयास... लय क्रमशः सधेगी. सोरठा है तो सही पर अजित जैसी प्रतिभावान रचनाकार के प्रयास में कथ्य का दोहराव क्यों? आपके पास तो विषयों और शब्दों का भंडार है.

विदुषी कक्षा-नायिका, शन्नो जिसका नाम.
उत्साहित सबको करें, करें निरंतर काम.


शन्नो जी! दोहा बिलकुल सही है...शत-प्रतिशत अंक. 'मनन चिंतन जतन करके' मात्रा १४, लय भंग...मनु जी का संशोधन सही... किन्तु तीसरी पंक्ति का उत्तरार्ध आपका सही है...कुल मिलकर आप और मनु जी बहुत शीघ्रता न कर एक बार दोहरा लें तो छंद की त्रुटियां समाप्त हो जायेंगी.

पूजा-मनु भी छंद को, रहे निरंतर साध.
कोशिश जारी रखें तो, पायें कीर्ति अबाध.

तपन न मात्रा से डरें, लय का रखिये ध्यान.
छंद स्वयं सध जायेगा, करें निरंतर गान.

शोभा सीमा दिवाकर, रश्मि निखिल देवेन्द्र.
संगीता साहिल तपन, तनहा औ' भूपेन्द्र.
तनहा औ' भूपेंद्र, रंजना अरुण न दिखते.
किसलय विनय सुलभ शैलेश अर्श क्यों छिपते?
मानोशी अवनीश सहर हरिहर-मन को भा.
आजायें रविकांत सुनीता को ले शोभा.


दोहा, सोरठा, रोला और कुण्डली के अभ्यास के इन पलों में अनुपस्थित सहभागी उपस्थित होकर साथ चलें तो आनंद शतगुना बढ़ जायेगा... आगामी कक्षा से दोहा के २३ प्रकारों की चर्चा के साथ-साथ दोहा के वैशिष्ट्य और योगदान पर बातें होंगी. आप उक्त चरों छंदों में स्वरचित या आपको पसंद रचनाएं लाइए ताकि हम सभी उनका आनंद ले सकें.

गोष्ठी के समापन से पूर्व एक रोचक प्रसंग

एक बार सद्‍गुरु रामानंद के शिष्य कबीर दास सत्संग की चाह में अपने ज्येष्ठ गुरुभाई रैदास के पास पहुंचे. रैदास अपनी कुटिया के बहार पेड़ की छंह में चमडा पका रहे थे. उनहोंने कबीर के लिए निकट ही पीढा बिछा दिया और चमडा पकाने का कार्य करते-करते बातचीत प्रारंभ कर दी. कुछ देर बाद कबीर को प्यास लगी. उनहोंने रैदास से पानी माँगा. रैदास उठकर जाते तो चमडा खराब हो जाता, न जाते तो कबीर प्यासे रह जाते...उन्होंने आव देखा न ताव समीप रखा लोटा उठाया और चंदा पकाने की हन्दी में भरे पानी में डुबाया, भरा और पीने के लिए कबीर को दे दिया. कबीर यह देखकर भौंचक्के रह गए किन्तु रैदास के प्रति आदर और संकोच के कारन कुछ कह नहीं सके. उन्हें चंदे का पनी पीने में हिचक हुई, न पीते तो रैदास के नाराज होने का भय... कबीर ने हाथों की अंजुरी बनाकर होठों के नीचे न लगाकर ठुड्डी के नीचे लगाली तथा पानी को मुंह में न जाने दिया. पानी अंगरखे की बांह में समा गया, बांह लाल हो गयी. कुछ देर बाद रैदास से बिदा लेके कबीर घर वापिस लौट गए और अंगरखे को उतारकर अपनी पत्नी लोई को दे दिया. लोई भोजन पकाने में व्यस्त थी, उसने अपनी पुत्री कमाली को वह अंगरखा धोने के लिए कहा. अंगरखा दोहे समय कमाली ने देख की उसकी बांह लाल थी... उसने देख की लाल रंग छूट नहीं रहा तो उसने मुंह से चूस-चूस कर सारा लाल रंग निकाल दिया...इससे उसका गला लाल हो गया. कुछ दिनों बाद कमाली मायके से बिदा होकर अपनी ससुराल चली गयी.

कुछ दिनों के बाद गुरु रामानंद तथा कबीर का काबुल-पेशावर जाने का कार्यकरण बना. दोनों परा विद्या (उड़ने की कला) में निष्णात थे. मार्ग में कबीर-पुत्री कमाली की ससुराल थी. कबीर के अनुरोध पर गुरु ने कमाली के घर रुकने की सहमति दे दी. वे जब कमाली के घर पहुंचे तो उन्हें घर के आगन में दो खाटों पर स्वच्छ गद्दे-तकिये तथा दो बाजोट-गद्दी लगे मिले. समीप ही हाथ-मुंह धोने के लिए बाल्टी में ताज़ा-ठंडा पानी रखा था. यही नहीं उनहोंने कमाली को हाथ में लोटा लिए हाथ-मुंह धुलाने के लिए तत्पर पाया. कबीर यह देखकर अचंभित रह गए की हाथ-मुंह धुलाने के तुंरत बाद कमाली गरमागरम खाना परोसकर ले आयी.

भोजन कर गुरु आराम फरमाने लगे तो मौका देखकर कबीर ने कमाली अब पूछ की उसे कैसे पता चला कि वे दोनों आने वाले हैं? वह बिना किसी सूचना के उनके स्वागत के लिए तैयार कैसे थी? कमाली ने बताया कि रंगा लगा कुरता चूस-चूसकर साफ़ करने के बाद अब उसे भावी घटनाओं का आभास हो जाता है. तब कबीर समझ सके कि उस दिन गुरुभाई रैदास उन्हें कितनी बड़ी सिद्धि बिना बताये दे रहे थे तथा वे नादानी में वंचित रह गए.

कमाली के घर अब वापिस लौटने के कुछ दिन बाद कबीर पुनः रैदास के पास गए...प्यास लगी तो पानी माँगा...इस बार रैदास ने कुटिया में जाकर स्वच्छ लोटे में पानी लाके दिया तो कबीर बोल पड़े कि पानी तो यहाँ कूदी में ही भरा था, वही दे देते. तब रैदास ने एक दोहा कहा-

जब पाया पीया नहीं, था मन में अभिमान.
अब पछताए होत क्या नीर गया मुल्तान.


कबीर ने इस घटना अब सबक सीखकर अपने अहम् को तिलांजलि दे दी तथा मन में अन्तर्निहित प्रेम-कस्तूरी की गंध पाकर ढाई आखर की दुनिया में मस्त हो गए और दोहा को साखी का रूप देकर भव-मुक्ति की राह बताई -

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढें बन मांहि.
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नांहि.