आज सुबह का अख़बार देख मैं जरा सकपकाई
चार पांच खबरें पढ़ डाली,
और माथे पर एक शिकन नहीं आई
जैसे-जैसे उन्हें पढ़ती जा रही थी,
दिल की धड़कन बढती जा रही थी
सब और है शांति, कहीं नहीं झगडे,
आज पुलिस ने कोई चोर नहीं पकडे,
न कहीं धमाका, न हत्या, न रेप
लड़कियों के लिए अब सिटी हुई सेफ़
नेताजी के मुहं से भी निकली सच्चाई
नहीं किये वादे, उपलब्धियां गिनाईं
न कोई आरोप, न कोई जातिवाद,
उनके भाषण में थी आज 'प्रगती की बात'
फ़िल्मी खबरों का भी बदला हुआ था भेष,
लिखा था 'मनोरंजन के साथ होगा सामाजिक सन्देश'
बॉलीवूड एक है, नहीं है कोई ब्रेक-अप
आमिर-शाहरुख का भी हो गया है पेच-अप (patch-up)
और ये खबर तो सबसे जरूरी हो गयी,
सरकारी टेबलों की सारी फाइलें पूरी हो गयी
आज बाबू ने नहीं ली रिश्वत,
और काम भी कर दिया बिना किसी खटपट
आर्थिक मंदी का भी खत्म हुआ दौर,
शेयर मार्केट में हुई नयी भोर
खाली हाथों को फिर मिल गया काम
बाजारों में लौटी रौनक, स्थिर हुए दाम
मेरी चिंता तो बढती जा रही थी,
अचानक इतनी तब्दिली कहाँ से आ रही थी.
यूँ लगा जैसे दुनिया बदल गयी है,
हर बिगड़ी स्थिती संभल गयी है
लेकिन जैसे ही अख़बार के निचले हिस्से पर नज़र दौडाई
वहां ये पंक्तियाँ लिखी हुई पाईं,
"ऊपर लिखी सारी खबरें, झूठ हैं, फजूल हैं,
गुस्ताखी माफ़ हो आज अप्रैल फूल है "
ममता पंडित






