दोहा लें मन में बसा, पाएंगे आनंद.
झूम-झूम कर गाइए, गीत, कुण्डली छंद.
दोहा कक्षा की घोषणा के साथ ७ पत्र प्रेषकों में से . श्री भूपेन्द्र राघव ने मानकों के अनुसार २ दोहे लिखकर श्री गणेश किया.
पाठ १ में हमने भाषा, व्याकरण, वरना, स्वर, व्यंजन एवं शब्द की चर्चा की. पाठ के अंत में पारंपरिक दोहे थे जिनका पाठांतर श्री रविकांत पाण्डेय ने भेजा. श्री दिवाकर मिश्र ने १ संस्कृत दोहा भेजकर पत्र-मंजूषा की गरिमा-वृद्धि की.
गोष्ठी १ के आरंभ में सभी सहभागियों के नाम कुछ दोहे थे जिन्हें आपने सराहा. सर्व माननीय मनुजी, तपन जी, देवेन्द्र जी, शोभा जी, सुर जी, सीमा जी, एवं निखिल जी ने दोहे भेजकर अपनी सहभागिता से गोष्ठी को जीवंत बनाया.
पाठ २ में हमने छंद, मुक्तक छंद, दोहा और शेर की बात की. पाठक पंचायत से सीमाजी एवं शोभा जी के अलावा सब गोल हो गए. वे भी जिन्होंने नियमित रहने का वादा किया था. विविध मनः स्थितियों के दोहों से पत्र-सत्र का समापन हुआ.
गोष्ठी २ में कबीर, तुलसी, सूर, रत्नावली तथा रहीम के दोहे देते हुए पाठकों से उनकी पसंद के दोहे मांगे गए. पाठकों ने कबीर एवं रहीम के दोहे भेजे. पूजा जी ने दोहा, छंद व श्लोक में अन्तर जानना चाहा.
पाठ ३ उच्चार पर केंद्रित रहा. निस्संदेह यह पाठ सर्वाधिक तकनीकी तथा कुछ कठिन भी है. इसे न जानने पर दोहा ही नहीं किसी भी छांदस रचना का स्रजन कठिन होगा. इसे जान लें तो छंद सिद्ध होने में देर नहीं लगेगी. आपसे एक दोहे की मात्र गिनने के लिए कहा गया था किंतु किसी ने भी यह कष्ट नहीं किया. यदि आप सहयोग करते तो यह पता चलता की आपने कहाँ गलती की? तब उसे सुधार पाना सम्भव होता. श्री विश्व दीपक 'तनहा' ने मात्र संबन्धी एक प्रश्न कर इस सत्र को उपयोगी बना दिया.
गोष्ठी ३ में नव वर्ष स्वागर के पश्चात् समयजयी दोहकारों कबीर एवं रहीम के दर्शन कर हम धन्य हुए. पूजा जी व 'तनहा जी' के प्रश्नों का उत्तर दिया गया. अंत में आपके दोहों को कुछ सुधार कर प्रस्तुत किया गया ताकि आप उनके मूल रूप को देखकर समझ सकें कि कहाँ परिवर्तन किया गया और उसका क्या प्रभाव हुआ. पत्र-सत्र से रंजना व मनु जी के अलावा सब गोल हो गए.
आपको सबक करने के लिए अधिक समय मिले यह सोचकर शनिवार को गोष्ठी की जगह पाठ और बुधवार को पाठ की जगह गोष्ठी की योजना बनाई गयी. गोष्ठी ४ में कोई प्रश्न न होने के कारण दोहा की काव्यानुवाद क्षमता का परिचय देते हुए अंत में एक लोकप्रिय दोहा दिया गया. पत्र-सत्र में आपकी शिकायत है कि पाठ कठिन हैं. मैं सहमत हूँ कि पहली बार पढनेवालों को कुछ कठिनाई होगी, जो पढ़कर भूल चुके हैं उन्हें कम कठिनाई होगी तथा जो उच्चारण या मात्रा गिनती के आधार पर रचना करते हैं उन्हें सहज लगेगा. कठिन को सरल बनने का एकमात्र उपाय बार-बार अभ्यास करना है, दूर भागना या अनुपस्थित रहना नहीं.
प्रश्न आपके बूझकर, दोहे दिए सुधार.
मात्रा गिनने में नहीं, रूचि- छोडें सरकार.
तनहा जी के प्रश्न का उत्तर दे दिए जाने के बाद भी उत्तर न मिलने की शिकायत बताती है कि ध्यानपूर्वक अध्ययन नहीं हुआ. इतिहास बताने का कोई इरादा नहीं है. पुराने दोहे बताने का उद्देश्य भाषा के बदलाव से परिचित कराना है. खड़ी हिन्दी में लिखते समय अन्य बोली की विभक्तियों, कारकों या शब्दों का प्रयोग अनजाने भी हो तो रचना दोषपूर्ण हो जाती है. आप यह गलती न करें यह सोचकर पुराने दोहे दिए जा रहे हैं.बार-बार दोहे पढने से उसकी लय आपके अंतर्मन में बैठ जाए तो आप बिना मात्रा गिने भी शुद्ध दोहा रच सकेंगे. दोहा के २३ प्रकार हैं. इन दोहों में विविध प्रकार के दोहे हैं जिनसे आप अनजाने ही परिचित हो रहे हैं. जब प्रकार बताये जायेंगे तो आपको कम कठिनाई होगी. डॉ. अजित गुप्ता की टिप्पणी ने संतोष दिया अन्यथा लग रहा था कि पूरा प्रयास व्यर्थ हो रहा है.
पाठ ४ में उच्चार चर्चा समाप्त कर गणसूत्र दिया गया है. आप पाठ ३ व ४ को हृदयंगम कर लें तो दोहा ही नहीं कोई भी छंद सिद्ध होने में देर नहीं लगेगी. आपने पाठ लंबे होने की शिकायत की है. 'एक कहे दूजे ने मानी, कहे कबीर दोनों ज्ञानी'
बात आपकी मान ली, छोटे होंगे पाठ.
गप्प अधिक कम पढ़ाई, करिए मिलकर ठाठ.
गणतंत्र दिवस पर मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति इंदौर के भवन में इंदौर के साहित्यकारों के साथ ध्वज वन्दन किया. संगणक पर हिन्दयुग्म और दोहा पाठ सभी को दिखाया. श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार चंद्रसेन 'विराट', सिद्ध दोहाकार प्रभु त्रिवेदी, सदाशिव कौतुक तथा अन्यों ने इसे सराहते हुए कहा कि इसमें पूरा पुस्तकालय छान कर सागर को गागर में भर दिया गया है. जिस दोहे को सीखने-साधने में बरसों लगते थे वह अब कुछ दिनों में संभव हो गया है.
आपको यह भी बता दूँ कि मैं पेशे से सिविल इंजिनियर हूँ. दिन भर नीरस यांत्रिकी विषयों से सर मारने के बाद रोज ४-५ घंटे बैठकर अनेक पुस्तकें पढ़कर इस माला की कडियाँ पिरोता हूँ. हर पाठ या गोष्ठी की सामग्री लिखने के पूर्व प्रारम्भ से अंत तक की पूरी सामग्री इसलिए पड़ता हूँ कि बीच में कोई नया दोहाप्रेमी जुदा हो, कुछ पूछा हो तो वह अनदेखा न रह जाए. मैं मध्यम मात्र हूँ. यदि आप और दोहे के बीच बाधक हूँ तो बाधक हूँ तो बता दें ताकि हट जाऊं और कोई अन्य समर्थ माध्यम आकर आप और दोहे को जोड़ दे.
केवल श्रम से सफलता, पा सकते हैं मीत.
गति-यति, लय, उच्चार से, सधता दोहा-गीत.
हर अक्षर दोहा हुआ, शब्द-शब्द है गीत.
नेह निनादित नर्मदा, नहा 'सलिल' पा प्रीत.






