काव्य-पल्लवन का दूसरा अंक आपके सामने है। इस बार कुल ८ सदस्य कवियों ने अपनी कविताएँ लिखी हैं। कितना सुखद आश्चर्य है कि कल ही हिन्दी-चिट्ठाकारी के चार वर्ष पूरे हुए और हमें यह अंक प्रकाशित करने का अवसर मिल गया। इस अंक का प्रमुख आकर्षण यह है कि इन कविताओं के साथ स्मिता तिवारी की पेंटिग्स भी प्रकाशित की जा रही हैं जो एक तरह से प्रत्येक कविता की अलग-अलग चित्राभिव्यक्ति है।
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काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन
विषय - जीवन एक कैनवास
विषय-चयन - मोहिन्दर कुमार
पेंटिंग (चित्र) - स्मिता तिवारी
अंक - द्वितीय
माह - अप्रैल 2007

इसी सड़क पर
जिस पर सन्ती का घर है
पता नहीं
कितना दौर गुजर गया।
बिहार में अकाल पड़ा था
बड़ा बेटा क्यों मरा?
पता नहीं चला।
दो-चार बीघा जो ज़मीन थी
लाला जी को बेच दी
फिर भी छाती में
दूध नहीं बनता था
छोटू भी चल बसे।
आधा गाँव खाली हो गया
दाया, सरवन, परयाग
सब बचे-खुचे
बाल-बच्चों के साथ
पता नहीं कहाँ चले गये।
हमार मरद भी कहे
चलो, कहीं
जहाँ पानी हो।
तब से दिल्ली चली आयी।
बीस बरस में पता नहीं
कितनी जगह बदली?
यहीं सुधवा पैदा हुई।
पाँच बरस हो गये
सीसा नहीं देखा।
गोई कहती हैं
कि तोहार सरीर में
न खून है न जान।
बजन करावोगी तो
२० किलो भी नहीं निकलेगा।
कौन जीना चाहता है?
सुधवा के बियाह का
फिकिर नहीं होता
तो भिखारिन नहीं बनती।
जवानी में भी कहाँ कमा पायी
अकाल के सूखल छाती
लटकल गाल
५ रुपया नहीं दिया कोई।
अब तो वो भी मुसकील है।
छोकड़पन में लाला की बात
मान गयी होती तो का
ई-दिन देखना पड़ता?
मगर जब बरबादी लिखा हो
तो आँख वाला भी
अँधा हो जाता है।
गोई की बेटी पढ़ने जाती है
सबमें पैसा चाहिए।
हम तो बस कनयादान चाहते हैं।
इनको भी रोजे बोतल चाहिए।
बियाह के चिंता तनिको नहीं है।
जमादारिन कहित रही
कि गुर्दा बेच दो
बेटी का बियाह हो जायेगा
पता नहीं कोई खरीदेगा भी?
शब्दार्थः-
सन्ती- शांति नामक एक स्त्री, दाया, सरवन, परयाग- दया, श्रवण और प्रयाग नाम के व्यक्ति, मरद- पति, सुधवा- सुधा नामक एक लड़की, सीसा- शीशा, दर्पण, गोई- सहेली, तोहार- तुम्हारे, सरीर- शरीर, देह, बजन- वजन, बियाह- विवाह, शादी, फिकिर- फ़िक्र, चिंता, सूखल- सूखी हुई, लटकल- लटकी हुई, मुसकील- मुश्किल, छोकरपन- लड़कपन, ई-दिन- यह दिन, कनयादान- कन्यादान, रोजे- रोज़, प्रतिदिन, तनिको- तनिक, थोड़ा, अल्प, कहित रही- कह रही थी।

आओ छोटू तुम भी आओ,आओ दद्दू तुम भी आओ;
श्याम की भाभी तुम भी आओ,राम की नानी तुम भी आओ।
थोड़ा समय जो साथ बिताओ जी भरके मनोरंजन पाओ,
अब प्रोग्राम स्टार्ट कराओ तुम न ज़्यादा देर लगाओ,
बच्चो, जोर से ताली बजाओ, चलो बंदरिया को ले आओ।
रामकली ने झोला उठाया कन्धे पर उसको लटकाया,
ठुम्मक-ठुम्मक कदम बढ़ाया ये देखो विद्यालय आया।
अब देखो क्या भेष बनाया,उसको दुल्हन सा है सजाया,
देखो उधर से कौन है आया,अरे बन्दर तो दूल्हा बन आया।
बन्दर ने क्यों मुँह लटकाया, क्यों रोया क्यों आँसू बहाया?
ओह मतलब अब है समझ में आया,रामकली ने स्वर्ग सिधाया।
भैया सबकी यै ही कहानी,जानी समझी बहुत पुरानी;
या हो भिखारी,राजा-रानी;छोड़ के दुनिया,सबको जानी।
लेकिन बात ये जानी-मानी,गाँठ बाँध लो इसको 'जानी';
जीवन के इस रंगमंच पर, हर एक भूमिका पड़े निभानी।
पंकज तिवारी

अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट आ गयी है
तुम जान गयी हो
कि तुम्हारे भीतर एक तितली है
तुम मार दोगी न मुझे माँ?
जब आहिस्ता-आहिस्ता
थमने लगेगी दिल की धडकन
और मैं पिघल जाऊँगी
तुम्हारी ही कोख के भीतर
तुम्हारी आँख में आँसू तो न होगा?
आँखें बंद करो माँ
अपने ही जीवन को केनवास समझो
एक चित्र रचो मेरा
रंग भरो कल्पना के सारे
देखो मैं पंछी हूँ, सुन लो मैं गाती हूँ
छू लो मैं पंखुड़ी गुलाब की
मखमल सी सुबहा हूँ, गुलाबी शाम सलोनी
महसूस करो सतरंगी रंगों को सपनों में
महसूस करो मुझे...
एक बार मेरा चित्र खींच, रंग भर देखो
हल्की सी मुस्कुराहट होंठों पर आयेगी,
शबनम को पलकों पर आने मत देना
मेरी मौत से पहले, एक बार
अपने ही जीवन को कैनवास समझो
एक चित्र रचो मेरा...
राजीव रंजन प्रसाद

देखती हूँ ज़िंदगी को मैं अक्सर
यूँ ही लम्बे सफ़ेद कैनवास पर
और फ़िर देखते ही देखते इन में
कई रंग से जैसे बिखर जाते हैं
तब हर गुजरता लम्हा बन जाता है
एक अनदेखी सी तस्वीर कोई
और उसमें कई रंग
यूँ ही कभी सँवरते
कभी धुँधले से चमक जाते हैं
प्रेम का रंग खिलता है जब गुलाबी हो कर
दर्द के घने अंधेरे छँट जाते हैं
ज्ञान का सफ़ेद सा उजाला खोल देता है
जब मन की खिड़कियाँ सारी
रूह के कोने कोने में
जैसे आशा के सैकड़ों दीप झिलमिलाते हैं
जीवन तो नाम है कभी धूप ,कभी छाँव का
पीले पतझर से यह पल हर पल मुरझा के फिर हरे हो जाते हैं
उड़ने दो अपने दिल की हर धड़कन को नीले मुक्त गगन में
अनाहत संगीत के सुरों से सजे यह ज़िंदगी के रंग
कोरे कैनवास पर अपनी हर अदा से मुस्कराते हैं !!
रंजना भाटिया

जीवन क्या है?
जन्म और मृत्यु के बीच
एक अन्तराल
कभी दीर्घ अनुभूति, कभी लघु आभास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
काल की लेखनी उकेरती जिस पर
कभी सूक्ष्म, कभी वृहद रेखाचित्र
धीर गम्भीर या फिर मधुर सुहास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
भाग्य व कर्म की तूलिकाएँ भरतीं जिसमें
भावनाओं के विभिन्न रंग
कभी करुण, आकुल, कभी प्रखर उल्लास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
अराधक के लिये जीवन भक्ति है
सबल के लिये जीवन शक्ति है
निर्बल के लिये जीवन क्रूर उपहास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
भिक्षुक के लिये जीवन केवल दक्षिणा है
श्रमिक के लिये आजीवन जीविका की प्रदक्षिणा
तन थका-थका, अंतर निरन्तर उदास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
संत कहें काया कच्ची माटी की गगरी
संसार मोह, माया, मद की नगरी
जिसे त्याग कर, करना है प्रवास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
मयक़श के लिये जीवन एक मैख़ाना
ग़म और खुशी का यही है पैमाना
न पीये अगर तो रहे बदहवास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
साधक के लिये जीवन एक कला
साधे जिसको वह बन एक शिला
एक अडिग मन, एक अथक प्रयास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
शैशवकाल यदि जीवन प्रभात है
यौवन जीवन की दोपहरी
वृद्धावस्था समझो संध्याबेला है
मृत्यु अनन्त विश्राम निश्वास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
इस धरा के कण-कण में
जल में, थल में, वायुमण्डल में
हर स्थान पर जीवन का है आवास
जीवन एक चित्रपट (कैन्वॅस)
मोहिन्दर कुमार

ये देखो,
स्वच्छंद,
टोलियों मे,
अनजान,
बिलकुल बचपन की तरह
खिलखिलाती हुई
यह प्रारम्भ का उत्साह है,
उमंग है
और, यहाँ देखो
कोने में,
विरह की वेदना,
यादों का समन्दर,
तुम्हें स्पष्ट दिखायी देगा
इन बूँदों में
अकेलापन
यह अंत से पूर्व का पश्चाताप है
अब यहाँ,
बिलकुल मध्य में,
उलझा हुआ गुच्छा,
एक-दूसरे को दबाने की,
ऊपर आने की,
कशमकश
यह काम,लोभ,तृष्णा...
उसने चित्रकार पिता की,
इन पंक्तियों को याद किया,
और
रंगो से सारोबार ब्रश,
कैनवास पर छिटक कर कहा,
"देख लो प्रिय, यही जीवन है!"
गिरिराज जोशी "कविराज"

कल मद्यपान से हाय-तौबा,
आज मद्यपान जीवन की शोभा,
गुरु तेरे सान्निध्य ने यह क्या कर डाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।
कल बाबूजी से छुप-छुप कर,
मस्ती का लिए लाव-लश्कर,
स्वप्न-लोक जब पहुँचा था,
कुछ पल को मैं तब सकुंचा था,
आँखों में सूरज पिघला था,
लब पर धुएँ का छ्ल्ला था,
वो मेरी प्रथम कमाई थी,
सिगरेट बन मुझ तक आई थी,
पर संस्कार तो जिंदा था,
मैं खुद पर तो शर्मिंदा था,
आज तूने मेरे हृदय से छीना उजियाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।
कल जिस कूँची से उपजा था,
जिसकी सूची से उपजा था,
जिसने रूह उकेरा था,
वही , मेरा जो चितेरा था -
पथ-कुपथ उसी ने आँके थे,
सही-गलत के निर्णय टाँके थे,
कल तक मेरे शब्द भी अपने थे,
घर में पलते कई सपने थे,
पर आज कूँची तो तेरी है,
तेरी विधा तो एक पहेली है।
इस चित्रपट पर रंगों का निकला दीवाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।
अब सपनों के रंग नए-से हैं,
रंग दिल के तो अनचढे-से हैं,
कई रंग तो हो गए फीके हैं,
न होने के ही सरीखे हैं
तूने जो कूँची थामी है,
मूल्यों की हुई निलामी है,
मुझको इस कदर संवारा है,
रिश्तों को किया किनारा है,
तू देव जो जग के धन का है,
चित्रकार मेरे जीवन का है,
मेरा जीवन ही तेरी प्रतिभा का साक्षात निवाला है,
तेरे संग से मेरा चाल-ढंग भी हुआ निराला है।
विश्व दीपक 'तन्हा'

जीवन के दोराहे पर खड़ा है मेरा मन
एक तरफ मदमस्त जवानी
एक तरफ मासूम बचपन
नानी की कहानियाँ थीं
मौजों की रवानियाँ थीं
छत पर पड़ी चारपाई पर अपना डेरा था
मुंडेर पर गिरी बेरी पर जुगनुओं का बसेरा था
घर से दोपहर में चोरी से भागना
बहुत याद आता है,
बरगद की जटाओं से झूलना
बगीचों से फूल चुराना
बरसातों में पाठशाला से भीग कर लौटना
और छतरी न खुलने का बहाना बनाना
नंगे पैर तितलियाँ पकड़ना
कागज की कश्तियाँ बनाना
लावारिस चिड़िया के बच्चे को घर ले आना
उस पर माँ का चीखना चिल्लाना
न लोभ था न कोई मोह
न अपने परायों का तोल-मोल
गर्मियों की छुट्टियों से खुशियों का आलिंगन था
सबको उस छोटी सी दुनिया में आमंत्रण था
अब जवानी की डगर पर हमने पहला कदम रखा है
क्या कहें बस अभी-अभी चलना सीखा है
ये शुरूआत है और अंत तक का नज़ारा देखा है
गली-गली ज़ज़्बातों के बाज़ार खुले हैं
अपनापन बेचते यहाँ सभी बुत धुले हैं
महफ़िल सजी है शमशानों में
और मुर्दों पर खडे जश्न मनाते लोग निरे
इन लम्बे रास्तों का कोई छोर नहीं
कहते हैं हाँफती आशाओं के सिरे
बरसातों में भीगने के बहाने खो गये
खुद अपनी सोच से परेशान रो गये
जीने की जद्दोजहद में
कभी मर जाते हैं
तो कभी खुद को मार देते हैं
लाचार बुज़ुर्ग को देख कर मुँह फेर लेते हैं
रस्म-ओ-रिवाजों मे जकड़े
जीवन के हवनकुंड में अपनी आहुति दे कर
स्वयं स्वाहा... कहते हैं
कोई ग़ौर से न देख ले चेहरे का शून्य
इसे मुस्कुराहटों से सजा लेते हैं
एक पलड़े पर बचपन
दूसरे पर जवानी
बचपन का पलड़ा भारी है
जमीन को छू लेता है
जवानी का पलड़ा हल्का
न जमीन का न आसमान का
जो बीत चुका धुँधला सा जेहन में
वो योग था
जो बीत रहा यकायक कष्ट बन कर
बाकी बचा भोग है
अनुपमा चौहान






