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Monday, April 18, 2011

देखो! सपने क़ुर्बानी मांगते हैं



देखा था सपना एक कस्बे ने...

कि वो शहर हो गया!

दौड़ता रहा वो सालों

उस सपने के पीछे

आखिर रंग लाई उसकी उर्ज़ा

रौशन हुआ वो कस्बा….

और शहर हो गया!!!

पर हाय! अब क्या हो?

शहर को भूख लगी थी

उसने निगल ली कई ज़िन्दगियां...

और बढ़ चला तरक्की के रास्ते पर

बढ़ गए सपने

बढ़ गए उन सपनों के दायरे

फिर जब लगती भूख

थमती थीं कुछ ज़िन्दगियां

कस्बा एक महानगर हो गया

और भूख एक नियम

कई गांवों ने...

कई कस्बों ने

आज फिर वही सपना देखा है!

याद रहे ! सपने क़ुर्बानी मांगते हैं

(ग्रामीण विकास को समर्पित पत्रिका कुरूक्षेत्र में प्रकाशित कविता)


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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

vandana का कहना है कि -

bahut hi marmspashriy rachna :)

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

सपने संभावनायें हैं।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

सपने कुर्बानी माँगते हैं इसमें कोई शक नहीं। सुंदर रचना

rachana का कहना है कि -

सपने क़ुर्बानी मांगते हैं"
aksar aesa hi hota hai
dhnyavad
rachana

RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य का कहना है कि -

बेहतरीन प्रस्‍तुति ..... !

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -

उत्साहवर्द्धन के लिए आप सभी को धन्यवाद

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

bahut acchi lagi yah kavita....

dhruv का कहना है कि -

aaj ki peedhi ko aisi rachnao ki zarurat hai...thank u sir

Disha का कहना है कि -

Sach hai kuch khokar panaa hai kuch paakar khona hai
jeevan ki reet yahi aana aur janaa hai.
badhiyaa........

atul का कहना है कि -

कई गांवों ने...
कई कस्बों ने
आज फिर वही सपना देखा है!
याद रहे !

atul का कहना है कि -

कई गांवों ने...
कई कस्बों ने
आज फिर वही सपना देखा है!
याद रहे !

mona का कहना है कि -

बढ़ चला तरक्की के रास्ते पर

बढ़ गए सपने

बढ़ गए उन सपनों के दायरे....v true our dreams keep on increasing n finally we pay the kurbani for achieving what we desire.

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