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Tuesday, July 20, 2010

गरीबों की आह की फिक्र रत्ती भर नहीं है


सब गुमाँ लिए बैठे हैं कोई खबर नहीं है
तेरे आँसुओं से भीगता अब शहर नहीं है

एक शाम वो कि तेरे होने का एहसास था
शाम अभी भी है पर उतना असर नहीं है

जो बारिशों से महफूज़ रखे बलाओं से नहीं
वो मकान ही हो सकता है वो घर नहीं है

क्यूँ इश्क में सब कुछ जला रहे हो तन्हा
ये आग बस इधर ही फैली है उधर नहीं है

ज़रा हिसाब से ही दिल के जज़्बात कहना
बड़ी-बड़ी बातें कहने की ये उमर नहीं है

यहाँ सबको चाहिए ग़रीबों की दुआएँ मगर
गरीबों की आह की फिक्र रत्ती भर नहीं है

परदे के पीछे का माज़रा तुम भी देख लेते
अफ़सोस है तुम्हारे पास ये "नज़र" नहीं है

यूनिकवि- आलोक उपाध्याय नज़र

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

AVADH का कहना है कि -

शायरी के आदाब और रवायात से तो मैं बिलकुल नावाकिफ़ हूँ पर इस्तेमाल में 'गरीबों के आह' कुछ खटक सा रहा है. क्या 'गरीबों की आह' कहने में कुछ रदीफ़ या काफ़िया गलत हो जाता?
अवध लाल

दिपाली "आब" का कहना है कि -

badhiya gazal, khaayal acche lage, aap ab zara lay par dhyaan dena shuru karein.

manu का कहना है कि -

achchhi rachnaa...


badhaai...

Anonymous का कहना है कि -

यहाँ सबको चाहिए ग़रीबों की दुआएँ मगर
गरीबों की आह की फिक्र रत्ती भर नहीं है
बहुत अच्छी रचना है। गरीबों की आह को शब्दों में पिरोने का हुनर भी हर किसी के पास कहां है

निर्मला कपिला का कहना है कि -

एक शाम वो कि तेरे होने का एहसास था
शाम अभी भी है पर उतना असर नहीं है

जो बारिशों से महफूज़ रखे बलाओं से नहीं
वो मकान ही हो सकता है वो घर नहीं है

यहाँ सबको चाहिए ग़रीबों की दुआएँ मगर
गरीबों की आह की फिक्र रत्ती भर नहीं है

वाह बहुत सुन्दर गज़ल है। हर एक शेर दिल को छूता हुया। बधाई

सदा का कहना है कि -

जो बारिशों से महफूज़ रखे बलाओं से नहीं
वो मकान ही हो सकता है वो घर नहीं है

यहाँ सबको चाहिए ग़रीबों की दुआएँ मगर
गरीबों की आह की फिक्र रत्ती भर नहीं है

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

M VERMA का कहना है कि -

जो बारिशों से महफूज़ रखे बलाओं से नहीं
वो मकान ही हो सकता है वो घर नहीं है
सुन्दर अल्फाज
सुन्दर गज़ल

Anonymous का कहना है कि -

सुन्दर बहुत सुन्दर ....सभी शेर उम्दा..बधाई आलोक जी!

Unknown का कहना है कि -

I would like to say for alok upadhaya/He is awesome writer no dout...He is very young man ,and he have thay kind of thinking ,is superve....
Mr.alok i am your fan.......

By Mohd.naved.Mirza
Allahabad

Unknown का कहना है कि -

Alok sahab ki ye kavita k meri maa mjhepe aaj bhi gumaa karti hai/bohot jyada hi hum logon ko sochne pe majboor karti hai/k ye wehsi pana hamara hi laya hua jo galiyan aaj bhi sunsaan hai/aur masoomiyat khud ko khidki pe jaww karti hai///Alok sahab jabardast likha hai aapne great janab....
By Mohd Naved Mirza
Allahabad

Unknown का कहना है कि -

Avadh ji aapne apna verdict diya hai /k garibon kim aah pe but mai apni baat kehna chaunga k aap uske meaning pe gaur farmaye k writer kehna kya chata hai/wahan pe aah word bilkul sahi hai......mjhe koi khami nazar nhi aati..Mr.Alok ne bohot kum waqt me khud ko sabit kiya hai ...unki sarim rachnaiyen sahi hai aur ye sab galtiyan koi galtiyan nhi hoti....
From Naved
Allahabad

adidas nmd का कहना है कि -

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