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Monday, January 18, 2010

चौकी सब जानती है


चौकी जानती है
कि आदमी
जब तक उस पर सोता है
पलंग के लिए रोता है

पलंग क्या जाने
आदमी क्या होता है!

वह तो
चार-पांच इंच मोटे 'डनलप' के तले
सुन भी नहीं सकता
आदमी की धड़कन
वह क्या जाने
उसका
तन-मन!

चौकी सब जानती है।

पतले गद्दे के तले
सांस रोके सुनती है
एक-एक धड़कन

सावन में भीगना
गरमी में तपना
जाड़े में उधड़ जाना
जानती है गद्दे का
दिन-दिन
फटते चले जाना

रूई का रूठना
ऐंठना
गाँठ पड़ जाना

गठ्ठर में बंधना
धुनना
नई खोली में
तगा जाना

चौकी
गद्दे के मुँह
आदमी का हर दर्द
रोज महसूस करती है

सावन में पसीजती
गर्मी में तपती
जाड़े में खिल जाती है

चौकी
आदमी के संघर्ष की साथी होती है
चौकी सब जानती है।

तड़पती तो तब है
जब पलंग के मिलते ही
आदमी
उसे बेच देता है

दूसरे दिन
उस पर
नया आदमी
अपने पतले गद्दे दे साथ
पलंग का ख्वाब लिए
दुःखी-दुःखी सोता है।

पलंग क्या जाने
आदमी क्या होता है !


--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

चौकी
आदमी के संघर्ष की साथी होती है
चौकी सब जानती है।

तड़पती तो तब है
जब पलंग के मिलते ही
आदमी
उसे बेच देता है

दुसरे दिन
उस पर
नया आदमी
अपने पतले गद्दे दे साथ
पलंग का ख्वाब लिए
दुखी-दुखी सोता है।
चौकी और पलंग के माध्यम बहुत गहरी बात - देवेन्द्र जी आभार.
संपादक कृपया टाइपिंग की गलतियों को सुधारें.

neelam का कहना है कि -

चौकी
आदमी के संघर्ष की साथी होती है
ji devendra ji hmaare ghar me bhi ek chouki hai ,par uske khareedte samay ka juda vaakya aaj bhi muskaan laata hai chehre par isliye hm use kabhi nahi bechenge .(apvaad to har jagah maujood hote hi hain .)
kavita ke maadhyam se bhoutiktavaad ki aalochna achchi lagi ,hindi me n likh paane ke liye haath jod kar maafi maangti hoon .

Anonymous का कहना है कि -

ati sunder rachana...chouki jiski taraf aksar han dhyan nahi dete uski yaad dilane ke liye devendra je badhai.

rachana का कहना है कि -

kitna sunder likha hai .nai soch chouki ke madhyam se ap ne bahut kuchh kahdiya .kya manvikaran hai
bahut achchha laga padh ke
badhai
rachana

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

चौकी
गद्दे के मुँह
आदमी का हर दर्द
रोज महसूस करती है

सावन में पसीजती
गर्मी में तपती
जाड़े में खिल जाती है

एक खूबसूरत भाव ..बहुत बढ़िया कविता...धन्यवाद देवेन्द्र जी इस सुंदर प्रस्तुति के लिए..

Anonymous का कहना है कि -

ठण्ड के वजह से कोम्मंत नहीं किया बहुत दिनों से,,,,,,
शैलेसने तो अच्छा लोगो को फ़साये रखा हे ख़ास कर महिला को जीने कहीं जगह ना मिले उनको याहा मिलाती हे ....,,,

क्या कोई एडिटर का काम नहीं जानता यहाँ ...,,, बिला एडिटिंग के कविता छापना गुनाह हे ....,,,,

अपूर्व का कहना है कि -

चौकी से पलंग का यह सफ़र इन्सान के संघर्षों से सफ़लताओं के सफ़र का प्रतीक है. व्यक्ति के कष्टपूर्ण दिनों के साथी उसे ज्यादा अच्छी तरह से समझ पाते हैं..मगर जैसे पर्वत पर चढ़ने के बाद बाकी स्रष्टि छोटी नजर आने लगती है.वैसा ही दृष्टिभ्रम अक्सर सफ़लता के नशे के प्रभाव से भी होता है..यहाँ चौकी हमारे बचपन के अध्यापक, दोस्त और अभिवावकों का रूपक भी हो सकती है..जो हमारे संघर्षों के साक्षी और संबल रहे होते हैं..
एक आँखें खोलने वाली जरूरी कविता के लिये आभार!!

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