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Monday, November 30, 2009

फैलता बाज़ार...!!!


वो चेहरा नहीं....
बाज़ार है
आंखें आवाज़ लगाती हैं...
आंखें एहसास जगाती हैं...
आंखें अपने पास बुलाती हैं...

क़रीब जाने पर ही पता लगता है
कि कैसे बदल जाती है...
उसके चेहरे के हर हिस्से की भूमिका

वो आंखें जो अब तक...आवाज़ दे रही थीं
पास जाते ही नापने में जुट गई औक़ात

वो लब जो खामोश थे...
जो चेहरे पर बस चिपके हुए-से मालूम पड़ रहे थे
और जो आवाज़ लगाती आंखों के साथी जान पड़ते थे
अब वो भी खुल गए...मोल-भाव के लिए

हां उसका चेहरा बाज़ार ही है...


कमोबेश यही हाल उस जिस्म का है
जिसका वो चेहरा हिस्सा है...
वो घर...गली...और वो मोहल्ला

वो शहर जिसका हिस्सा है...वो मोहल्ला
वो सूबा जिसमें वो शहर बसता है...
और वो देश जिसके सीने में धड़कता है वो सूबा....

यक़ीन नहीं होता...
एक चेहरा...
पूरी दुनिया तक
यूं भी फैल सकता है...!!!

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

यक़ीन नहीं होता...
एक चेहरा...
पूरी दुनिया तक
यूं भी फैल सकता है...!!!
सही है । धन्यवाद्

राकेश कौशिक का कहना है कि -

जिसको पाठक या श्रोता आसानी से समझ सकें मैं उसे अच्छा मानता हूँ. मुझे कविता मुश्किल लगी, या या फिर मैं इसे समझ नहीं सका.

मनोज कुमार का कहना है कि -

अच्छी रचना। बधाई।

Apoorv का कहना है कि -

एक नयी और प्रयोगवादी कल्पना दिखी आपकी इस रचना में

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

चेहरा जब भीड़ जुटाने लगे और अनेक प्रकार के साज सामानों से खुद को सजाने लगे साथ ही साथ अपना दाम भी लगाए तो यही कहाँ पड़ेगा की ये चेहरा नही बाजार है..

बढ़िया रचना..धन्यवाद!!!!!!

pukhraaj का कहना है कि -

एक ऐसे बाज़ार का जिक्र किया है अभिषेक ने जहाँ कपडे- लत्ते या सब्जी नहीं जिस्म बिकता है ... जहाँ सिर्फ चेहरा ही नहीं पूरा जिस्म ही बाज़ार बन जाता है .... जो आंखे प्यार से बुलाती नज़र आती थी पास आते ही मोल भाव करने में जुट जाती हैं ..... ये कैसी विडंबना है हमारे समाज की कि जहाँ औरत को देवी माना जाता है वहीँ बाज़ार में कोई खरीदार उसे वास्तु कि तरह खरीदता है ....
बहुत ख़ूबसूरती और बेबाकी से अपने ख्यालों से अवगत कराया आपने अभिषेक ...अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें

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