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Wednesday, September 23, 2009

देख कर लोग मुझे रश्क किया करते हैं .


देख कर लोग मुझे रश्क किया करते हैं .
क्या पता उनको छुपे गम मुझमें रहते हैं .

जी लिया है लगता जिंदगी ने हमको बहुत,
हर घड़ी को अब हम बोझ समझ सहते हैं .

जिसको भी अपना समझ दिल में बसाया हमने,
चेहरा खुद का दिखाने से भी वह डरते हैं .

कितने आंसू हैं बहाए अपनों की खातिर,
अब तो आंखों से दो आंसू भी नही बहते हैं .

घाव इतने हैं दिये उसने हमें छलनी किया,
शान से फिर भी देखो अपना हमें कहते हैं .

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं .

कवि कुलवंत सिंह

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं .

Behatreen..kulwanr ji bahut badhayi..

डॉ टी एस दराल का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं .

रावण भी हम हैं, और हमीं हैं राम
जो अंतररावण को मारे, वही कहलाये श्रीराम.

सुन्दर रचना.

M VERMA का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं .
बहुत खूब लिखा है. बेहतरीन

Manju Gupta का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं .


बढिया रचना .बल्ले बल्ले

वाणी गीत का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं ...
बहुत सही ...
आपकी रचनाये पढ़ कर भी लोग रश्क किया करें बहुत शुभकामनायें ...!!

Harihar का कहना है कि -

घाव इतने हैं दिये उसने हमें छलनी किया,
शान से फिर भी देखो अपना हमें कहते हैं .
वाह कुलवन्त जी ! बहुत शानदार !

neeti sagar का कहना है कि -

achchhi rachna badhai!

Sumita का कहना है कि -

क्या पता उनके छुपे गम मुझ्में रहते हैं...वाह! बहुत खूब रचना.बधाई।

Anonymous का कहना है कि -

घाव इतने हैं दिये उसने हमें छलनी किया,
शान से फिर भी देखो अपना हमें कहते हैं .

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं

बहुत ही सुन्दर पंकतिया बहुत बहुत बधाई एवं धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

rachana का कहना है कि -

राम हर युग में नही पैदा हैं होते लेकिन,
हर गली कूचे में रावण तो यहां रहते हैं
क्या बात कही है कितनी सच्चाई है
बहुत सुंदर
सादर
रचना

Shamikh Faraz का कहना है कि -

कुलवंत जी मं खुन्ग्गा यह ग़ज़ल मुझे साधारण सी लगी
बस यह शे'र ठीक लगा.
जी लिया है लगता जिंदगी ने हमको बहुत,
हर घड़ी को अब हम बोझ समझ सहते हैं .

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