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Sunday, July 12, 2009

निर्मिति ....


नीला आसमान नरम धूप
सफ़ेद बादल व पंछी का गान
और अचानक
जीवंत पर्वतों की धमक भरी साँस ...
तभी तुम्हारी निर्मिति ....

किस मिट्टी में.....?
भय के बीज में
अंकुरित साहस की भांति
या किसी बन्दूक की नली से झांकती
चांदनी की भांति
या किसी घातक की आँखों की
दहलीज में अटके लहू की भांति.....

उस समय मैंने गुहार किया ..
तब जब सड़कें खून से धोयी जा रही थी
नन्हें शिशु की अस्थियों से व टूटे बंदूकों से
दीवारें खड़ी की जा रही थीं .....
उग रहे थे नस-नस में लहू खींचते वृक्ष
राख की ढेरी से उग रही थी नई सत्ता
हवा में हुंकारी भरता उसका माथा ...

पूछती रह गयी ईश्वर का पता
जिस्म से ...इज्जत से ...
तूफ़ान से..तकदीर से ...
लहू से ..लोगों से ..
लाशों से व क्षणों से

देखा निरुत्तर
निर्विकार
स्थिरता में त्रिशंकु के तीन पैर
जन्म पर ,जिस्म पर मौत पर ....


सुनीता यादव

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

अर्चना तिवारी का कहना है कि -

देखा निरुत्तर
निर्विकार
स्थिरता में त्रिशंकु के तीन पैर
जन्म पर ,जिस्म पर मौत पर ....

अत्यंत मार्मिक भावपूर्ण रचना...बधाई

M Verma का कहना है कि -

उस समय मैंने गुहार किया ..
तब जब सड़कें खून से धोयी जा रही थी
नन्हें शिशु की अस्थियों से व टूटे बंदूकों से
====
अत्यंत मार्मिक.
भय के बीच साहस का अंकुरण" बेहद खूबसूरत

Manju Gupta का कहना है कि -

शीर्षक को सार्थक करती कविता लाजवाब है .

Disha का कहना है कि -

बहुत ही मार्मिक वर्णन है
सुन्दर रचना

Nirmla Kapila का कहना है कि -

बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है आभार्

Shamikh Faraz का कहना है कि -

मुझे आपकी कविता का ये हिस्सा सबसे अच्छा लगा.
पूछती रह गयी ईश्वर का पता
जिस्म से ...इज्जत से ...
तूफ़ान से..तकदीर से ...
लहू से ..लोगों से ..
लाशों से व क्षणों से


खासतौर पर ये लाइन "राख की ढेरी से उग रही थी नई सत्ता" मेरी नज़र में कविता कि सबसे अच्छी लाइन है. कविता के पीछे की सोच बहुत अच्छी है.

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

उस समय मैंने गुहार किया ..
तब जब सड़कें खून से धोयी जा रही थी
नन्हें शिशु की अस्थियों से व टूटे बंदूकों से
दीवारें खड़ी की जा रही थीं .....
उग रहे थे नस-नस में लहू खींचते वृक्ष
राख की ढेरी से उग रही थी नई सत्ता
हवा में हुंकारी भरता उसका माथा ...

मार्मिक एवं भावपूर्ण रचना, बधाई |

Harihar का कहना है कि -

उग रहे थे नस-नस में लहू खींचते वृक्ष
राख की ढेरी से उग रही थी नई सत्ता
हवा में हुंकारी भरता उसका माथा ...

पूछती रह गयी ईश्वर का पता

सुनीता जी ! दर्द है आपकी रव्चना में

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ का कहना है कि -

जीवंत पर्वतों की धमक भरी साँस ...
तभी तुम्हारी निर्मिति ....

किस मिट्टी में.....?
...........

उस समय मैंने गुहार किया ..
.............
राख की ढेरी से उग रही थी नई सत्ता
हवा में हुंकारी भरता उसका माथा ...
..........
देखा निरुत्तर
निर्विकार
स्थिरता में त्रिशंकु के तीन पैर
जन्म पर ,जिस्म पर मौत पर ....

सुनीता जी !

लगता है युग जैसे बीत गये आपकी रचनाओं का मार्मिक स्पर्श हुये. किन्तु आज यह सौभाग्य प्राप्त करके पुनर्निर्मिति सी अनुभव कर रहा हूं. निर्मिति संभवतः तेजी से बदलते हुये परिवेश में रचना के साथ साथ रचनाकार की निर्मिति भी है. बिम्बों का वही जाना पह्चाना सुनीतामय प्रयोग और संवेदनशीलता के धरातल पर कटु यथार्थ से उपजती रचना का अंकुरण मानो पत्थर तोड़्कर फूट्ता भावनाओं का प्रपात.

एक सुझाव ... गुहार किया का प्रयोग व्याकरणीय दृष्टि से अट्पटा सा लगता है. कृपया ध्यान दें

आगामी समय की एक संभावित कालजयी पद्चाप से सक्षात्कार करवाने के लिये आभार. शुभकामनायें

sada का कहना है कि -

किस मिट्टी में.....?
भय के बीज में
अंकुरित साहस की भांति

भावपूर्ण रचना...बधाई

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) का कहना है कि -

भावों को समेटे सुन्दर रचना.
बधाई

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