फटाफट (25 नई पोस्ट):

Monday, February 23, 2009

क्योंकि....


उस हंसी का मूल्य...
उन मुस्काती आंखों का मर्म....
...कैसे जान पाता?
तन पर कपड़े न थे
धंसी आंखें...कंकाली बदनवाले पुत्र को
बदहाल पिता ने गोद में
उठा रखा था
और उसके कंधे पर सिर रखे
वो पिता के मजबूत-सुरक्षित घेरे में
शायद सबकुछ पा रहा था...
...इसलिए मुस्कुरा रहा था...
इसलिए कहकहे लगा रहा था...
पिता भी अपने साये में
पलते अपने नए रूप को देख निहाल था
उसे अपने तंगहाली का कोई मलाल नहीं
ज़िंदगी के उसर क्षणों से
जब वो इतने रस पा रहा हो...
...तो क्यो फ़िक्रमंद हो?
…तो क्यों कोई और कामना हो?
…तो क्यों झखे खुशी को?

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

12 कविताप्रेमियों का कहना है :

Shamikh Faraz का कहना है कि -

abhishek ji bahut hi sundar kavita hai. khastor par antim teen panktiyan. kabhi waqt mile to mere blog par bhi aayen.

manu का कहना है कि -

बहुत खूब,,,अभिषेक जी
आए दिन यहाँ वहाँ दिखने वाली बात को बखूबी ढाला है आपने....
सकारात्मकता के साथ....
सब के लिए उपयोगी...

शोभा का कहना है कि -

ज़िंदगी के उसर क्षणों से
जब वो इतने रस पा रहा हो...
...तो क्यो फ़िक्रमंद हो?
…तो क्यों कोई और कामना हो?
…तो क्यों झखे खुशी को?
अति सुन्दर अभिव्यक्ति।

sangeeta का कहना है कि -

अभिषेक जी ,
सुंदर अभिव्यक्ति के मध्यम से पिता -पुत्र के रिश्ते को दर्शाया है..पिता कि बाँहों में सुरक्षा की भावना और पिता का अपने बेटे में अपने रूप को देखना...
पढ़ना अच्छा लगा.
बधाई

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बहुत अच्छी रचना है |
गरीबी के बीच संबंधों का सृजन |

याद आ रहा है एक शेर -
अब मैं राशन के कतारों में नज़र आता हूँ ,
अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पता हूँ ,

इतनी महंगाई है की बाज़ार से कुछ लाता हूँ ,
अपने बच्चों में उसे बाँट शर्माता हूँ ...


बधाई

अवनीश तिएअरी

neelam का कहना है कि -

वो पिता के मजबूत-सुरक्षित घेरे में
शायद सबकुछ पा रहा था...

behad samvedansheel abhivyakti

neeti sagar का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति! बहुत-२ बधाई!

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

रिश्तों के अपनेपन में सुख ढूढती मार्मिक अभिव्यक्ति

संवेदनशील सुंदर !!!

rachana का कहना है कि -

बहुत अच्छा लिखा है आप ने एक अच्छी सोच के साथ
सादर
रचना

sumit का कहना है कि -

ज़िंदगी के उसर क्षणों से
जब वो इतने रस पा रहा हो...
...तो क्यो फ़िक्रमंद हो?
…तो क्यों कोई और कामना हो?
…तो क्यों झखे खुशी को?

कविता बहुत अच्छी लगी

vinayak goswami का कहना है कि -

प्रथम पाठक की बधाई लें.
BEAUTIFUL ..
THANKS For sharing with US.

mona का कहना है कि -

a beautiful poem on father-son relationship

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)