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Thursday, December 18, 2008

नजर अब नीर नही रखती


मुहब्बत अब
हीर नही रखती
गजल अब
मीर नही रखती
जठर की आग से
भाप बन उड गया
नज़र अब
नीर नहीं रखती
दौलते फ़रेब
साथ हो तो आना
राजनीति अब
फ़कीर नही रखती
भीष्म सोये है
बारुद के ढेर पर
सियासत अब
तीर नही रखती
हरण क्या करेगा
दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती

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19 कविताप्रेमियों का कहना है :

मीत का कहना है कि -

Bahut khuub. Waah !

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

वाह!वाह!
बहुत बढिया!बेहद उम्दा!
मज़ा आ गया।
-तन्हा

manu का कहना है कि -

हद तक के दर्जे का ..
लाजवाब......
तारीफ़ से बाहर की चीज ..

विनय का कहना है कि -

बहुत बढ़िया!

तपन शर्मा का कहना है कि -

गजब... वाह..
एक एक पंक्ति लाजवाब..ये तीन तो जबर्दस्त लगीं:

दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती

क्या बात है विनय जी...

rachana का कहना है कि -

हरण क्या करेगा
दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती
आप की लेखिनी को,सलाम .क्या लिखूं सब छोटा लगता है
तो बस सलाम लिख दिया
सादर
रचना

neeti sagar का कहना है कि -

जैसा मैं pahale bhi kah chuki hun, ki aap bahut achcha likhte hai isme koi 2 ray nahi! mujhe rachna bahut achchi lagi! bahut-bahut badhi!

दिगम्बर नासवा का कहना है कि -

मन की भावनाओं को अच्छी तरह से पिरोया है आपने
हर लाइन लाजवाब है

शारदा अरोरा का कहना है कि -

बहुत सटीक चित्रण है , कितने यांत्रिक हो गए हैं हम , नजर अब नीर नहीं रखती और नई पीढी अब धीर नहीं रखती

सीमा सचदेव का कहना है कि -

har shabd aur usame nihit bhaav laajavaab hai

रंजना का कहना है कि -

आज जितना पढ़ा उसमे से सबसे सुंदर रचना लगी यह....... बहुत बहुत बहुत ही सुंदर.......प्रशंशा को शब्द नही सूझ रहे......क्या कहूँ........बेजोड़

रंजना का कहना है कि -

aapkee lekhni ne natmastak kar diya.......
aise hi likhte rahen.shubhkamnayen.

pooja anil का कहना है कि -

विनय जी ,

बहुत अच्छा लिखा है आपने और बहुत अच्छे भावों के साथ. बधाई.

^^पूजा अनिल

संजीव सलिल का कहना है कि -

आचार्य संजीव 'सलिल', सम्पादक दिव्या नर्मदा
संजीवसलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

हीर न रखती मुहब्बत, गजल न रखती मीर
जठराग्नि से उड़ गया, नजर न रखती नीर.

ला फरेब की दौलतें, सियासत नहीं फकीर.
हैं बारूदी ढेर पर, भीष्म त्यागकर तीर.

विवश सुयोधन क्या करे, कृष्णा रखे न चीर.
कुतिया में सब पधारें, सीता तजें लकीर.

सीढ़ी तज है लिफ्ट पर, युवजन तजकर धीर,
कत्ल हुआ चौराहे पर, रखे न इनसां पीर.

"SURE" का कहना है कि -

मुहब्बत अब
हीर नही रखती
गजल अब
मीर नही रखती
*************
बहुत ही शानदार लिखा गया है विनय जी बधाई के पात्र है

akhilesh का कहना है कि -

सहज सब्द, सुंदर कविता.अभी अभी हिंद युग्म का पता चला.तलाश पूरी हुई. बधाई .
विस्तार देखिये.
निष्टा का तुक मिला दो
विस्टा से
हिंदी अब कबीर नहीं रखती.
खंजर है
तुम पीठ लाओ
दोस्ती जमीर नहीं रखती.
कुछ नया लिखे
सब मिलकर
पुरानी किताबे उमीदे
समीर नहीं रखती.
तुम अगवा करो
हम अफजल छोडेंगे
तख्ते दिल्ली
नजीर नहीं रखती.
कल फिर जला असफाक
का झंडा
मादरे वतन
कश्मीर नहीं रखती.
लेखो को करनो दो
जिस्म फरोशी का धंधा
कविता रूह है
सरीर नहीं रखती.

अखिलेश श्रीवास्तव
सिनिओर इंजिनियर
जे ओ यल

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती

अद्भुत, अर्थपूर्ण ,भावपूर्ण
सादर !!

nitin jain का कहना है कि -

उत्कृष्ट कविता.... बहुत सी बधाईयाँ ...
अखिलेश जी और संजीव जी की रचनाएं भी अच्छी लगीं..

दो पंक्तियाँ मेरी ओर से -

आतंक का तांडव
चोरी से फैलाएं
कुछ सरकारें अब
वीर नहीं रखतीं
नवजात के मुख में बोटल
फिगर की चाह में
माएँ अब
क्ष्हीर नहीं रखतीं


धन्यवाद
नितिन जैन

Anonymous का कहना है कि -

realy creative wrighting,i do not have words for my feeling कुछ राजनीति के बारे मैं ............................
राजनीति हर इंसान के अन्दर थोड़ा न थोड़ा, किसी न किसी रूप मैं छुपी रहती है. बस सही वक्त का इन्तजार करता है हर इन्सान का चरित्र. अतः राजनीति और राजनेताओं को कोसने से कोई फायदा नहीं क्योंकि राजनीति का अपना कोई चरित्र नहीं होता बल्कि इसका चरित्र उसका वरण करने वाले के चरित्र पर निर्भर करता है :

ये राम के लिए भक्ति का साधन थी,
तो कृष्ण के लिए युक्ति का साधन,
गांधी के लिए शक्ति का साधन थी,
तो सुभाष-भगत के लिए मुक्ति का साधन !!
पर अफ़सोस आज ये लोगों के सिर्फ़ सम्पति का साधन है....
......................................................

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