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Wednesday, December 24, 2008

********है बदलना,वक्त जिनको


वो जो उलझे हैं सुलझ भी जाऍँगे
बीते पल लेकिन न फिर आ पाएँगे

सर उठाकर गर नहीं चल पाएँगे
फिर तो सब सिक्कों मे ही ढल जाएँगे

वे हमें ,हम भी उन्हें समझाएँगे
गर न समझे वो समझ हम जाएँगे

वक्त जाएगा निकल तब ,देखना
हाथ मलते लोग सब रह जायेंगे

अपना दामन साफ रखने के लिये
दाग़ दिल पर लोग कितने खाएँगे

वक्त को गर है बदलना `श्याम जी
आयें आगे वो जो सर कटवाएँगे




फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

तपन शर्मा का कहना है कि -

श्याम जी,
अच्छी गज़ल पर पहले जैसी बात नहीं दिखी...

manu का कहना है कि -

माफ़ी चाहता हूँ ....बहर....वज़न ...रुकन जैसे शब्दों का नाम भी बामुश्किल एक महीने से ही सुना है......कभी कभी सोचता भी हूँ के कोई उस्ताद ढूंढ लूँ ....क्योंके हर शख्श का यही कहना है के गुरु बिन ज्ञान नहीं ...मगर
ये मकता मुझ से पढा नहीं जा रहा है.....
और मुझे लग रहा है के मुझे अच्छा हुआ मैंने कोई तालीम नहीं ली

Anonymous का कहना है कि -

manuji aap thhahre betkhllus ?

दिगम्बर नासवा का कहना है कि -

ग़ज़ल अच्छी, ग़ज़ल के भावः सुंदर
विचार खूबसूरत, बधाई

Anonymous का कहना है कि -

manu ji ya jo bhi hain yahaan bat upnaam ki naheen kar rahe shayd,makte ki aakhri laain ya misara bahar se baahar hai aur aapne bahar ka naam bhi de rakha hai.shayd yoon kah rahe hain

shyamskha का कहना है कि -

मनुजी व् अनाम दोस्त शुक्रिया डायरी से देखकर टाइप करते हुए गलत टाइप हुआ व् एकशे`र भी टाइप करना रह गया था अब देखें

sumit का कहना है कि -

श्याम जी
काफिया रदीफ ढूढने मे कठिनाई हो रही है

काफिया=आ
रदीफ=ऍँगे

क्या मै सही हूँ?

sumit का कहना है कि -

या फिर ये बिना रदीफ की गज़ल है,मै कुछ दुविधा मे पड गया हूँ
क्योकि गुरू जी ने एक बार शैलेश जी की गजल पढकर बताया था कि इसमे 'कर' भी एक तरह से रदीफ बन गया है और 'आ' काफिया रह गया
सुमित भारद्वाज

RC का कहना है कि -

वो जो उलझे हैं सुलझ भी जाऍँगे
बीते पल लेकिन न फिर आ पाएँगे
Bahut achcha She'r!
RC

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