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Sunday, November 16, 2008

बेलिबासों की गली में सर झुकाते रह गए...


और क्या करते भला, मुस्कुराते रह गए,
बेलिबासों की गली में सर झुकाते रह गए...

जिससे जितना बन पडा,फासला रखता रहा,
और हम उनकी तरफ़ बाहें बढाते रह गए...

चाँद, तारे, ख्वाब, रातें, हर जगह जो शख्स था,
जब वो आया सामने, हम छटपटाते रह गए....

राम फ़िर बनवास पर हैं, औ' खुदा भी लापता,
आप मस्जिद तोड़ते, मन्दिर बनाते रह गए....

आई दीवाली तो घर की रौनकें खामोश थीं,
शहर के सारे मकां, जगमगाते रह गए.....

निखिल आनंद गिरि

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23 कविताप्रेमियों का कहना है :

"अर्श" का कहना है कि -

हर शे'र उम्दा है बहोत खूब लिखा है आपने .........बहोत खूब ढेरो बधाई ..

मीत का कहना है कि -

बहुत ख़ूब. कुछ शेर तो लाजवाब हैं. बधाई आप को.

Divya Prakash का कहना है कि -

बहुत बढ़िया निखिल भाई हर बार की तरह इस बार भी लाजवाब ...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

भई निखिल,
हम तो तुम्हारे फैन हो गए. लगातार इतनी सुंदर, गहरी, मर्म से भरी और फ़िर भी इतनी सरल और सहज शब्दों में कही गयी कवितायें पढ़ना अच्छा लगता है. न भारी भरकम शब्द और न ही ज़बरदस्ती बिठाए गए तुकबंदी या ग़ज़ल के नियम - बस सहज, सुंदर काव्य! बहुत खूब, जारी रखिये!

Manoshi का कहना है कि -

राम फ़िर बनवास पर हैं, औ' खुदा भी लापता,
आप मस्जिद तोड़ते, मन्दिर बनाते रह गए....

वाह!

devendra का कहना है कि -

--वाह!
--देवेन्द्र पाण्डेय।

sumit का कहना है कि -

गज़ल नुमा रचना पसंद आयी, हर शे'र अच्छा लगा

सुमित भारद्वाज

sumit का कहना है कि -

निखिल जी,
यदि आप हर शे'र के बाद एक पंक्ति छोडते तो पढने मे और मजा आता

Bhuwan का कहना है कि -

बेहतरीन

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

जब वो सामने, हम छटपटाते रह गए....
में पहला भाग कुछ छोटा लगा ?

शेष सब सुंदर है | बधाई |

-- अवनीश तिवारी

दिगम्बर नासवा का कहना है कि -

जिससे जितना बन पडा,फासला रखता रहा,
और हम उनकी तरफ़ बाहें बढाते रह ए...

लाजवाब शेर, ग़ज़ल पड़ कर मजा अ गया

Harkirat Haqeer का कहना है कि -

यूँ तो सारे शे'र असरदार हैं बस इस पंक्‍ति ऐसा लगता है जैसे कुछ छूट गया है-

जब वो सामने, हम छटपटाते रह गए....

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

सभी आदेश मान लिए गए हैं....
शेरों के बीच की दूरी बढ़ा दी गई है....
"जब वो सामने..." वाला शेर भी सुधार दिया है....
"चाँद, तारे, ख्वाब,रातें, हर जगह जो शख्स था,
जब वो आया सामन,हम छटपटाते रह गए...."
इसे ऐसे पढ़ें...
हौसला देने वालों का शुक्रिया....

निखिल

शोभा का कहना है कि -

राम फ़िर बनवास पर हैं, औ' खुदा भी लापता,
आप मस्जिद तोड़ते, मन्दिर बनाते रह गए....

आई दीवाली तो घर की रौनकें खामोश थीं,
शहर के सारे मकां, जगमगाते रह गए.....
वाह! क्या बात है. बहुत खूब.

rachana का कहना है कि -

इस के हर शेर लाजवाब है
राम फ़िर बनवास पर हैं, औ' खुदा भी लापता,
आप मस्जिद तोड़ते, मन्दिर बनाते रह गए...
इस को पढ़ के तो बस मजा ही आगया
सादर
रचना

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

वाह भई वाह..
पूरी हुई एक और चाह..

क्या गजल लिखी है..
एक एक शे'र जबर है
या यूँ कहो कि शेर बबर है

बहुत ही शानदार गजल..

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

निखिल जी!
अगर आपने जरूरी परिवर्त्तन नहीं किये होते तो बहर की तलवार थामकर मैं मैदान-ए-जंग में कूद गया होता।
अब आप विजेता हैं :)

बधाई स्वीकारें।

vinay k joshi का कहना है कि -

बहुत खूब |
.
बधाई |
.
विनय

neelam का कहना है कि -

आई दीवाली तो घर की रौनकें खामोश थीं,
शहर के सारे मकां, जगमगाते रह गए.....

wllaaaaaaaaaaaaaaah

neelam का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
elan का कहना है कि -

dil par ghar kar gaya aapka ek ek sher...

baar baar padhene ka man kiya

tahe dil se shukriya itni achhi shayari padhane ke liye..


shailesh

sahil का कहना है कि -

SHAYAD aajtak aapki padhi sabhi rachnaaon mein,behatar.jordaar sheron se gunthi hui behatarin gajal.
ALOK SINGH "SAHIL"

सजीव सारथी का कहना है कि -

राम फ़िर बनवास पर हैं, औ' खुदा भी लापता,
आप मस्जिद तोड़ते, मन्दिर बनाते रह गए....
excellent nikhil

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