-------------------------------------------------------------
नज़र में तेरी उन कातिलों के अघलात* क्यों नहीं
खुदा, अब तुझमें वो खुदाओं-वाली बात क्यों नहीं
फिर खबर सुनी धमाकों ने बेगुनाहों की जानें लीं
मुझ गुनहगार पर, खुदा, तेरे इल्तिफात* क्यों नहीं
मेरे इश्क के खिलाफ तो उसने कई सबब दिए
उसकी बेवफाई के मेरे पास इसबात* क्यों नहीं
कभी तो ख़ुद सवालों में ही जवाब छुपा होता है
मगर तेरे जवाबों में भी ऎसी बात क्यों नहीं
वो कहता है के मुझसे दूर रहकर भी खुश है
सच है तो फिर दिखते उसके ऐसे हालात क्यों नहीं
बे-तार फोन से गर इंसानों में गुफ्तगू है मुमकिन
तो मुमकिन बेदार* दिल से दिल की बात क्यों नहीं
ऐ औरत, हर कदम से पहले तू जमीन परखती है
दिल रखने के मुआमले में ये एहतियात क्यों नहीं
ये रिश्ते, अहबाब* और हम, सब खत्म हो जायेंगे
पर क्यों नहीं मरते कमबखत जज़्बात, क्यों नहीं
मेरा अंजामे-इश्क* भी हश्रे-आम* होगा खुदा ?
तुझसे मिलने से पहले उससे मुलाक़ात क्यों नहीं
सब गुनाहों-फजलों* की आकिबत* कभी और क्यों
यही जीस्त*, यही जिन्दगी, यही हयात क्यों नहीं
~ RC
-------------------------------------------------------------
~ग़ज़ल है तो बहर में क्यों नहीं !? :-)
अघलात - ग़लत का बहुवचन, इसबात- सबूत का बहुवचन, इल्तिफात- मेहेरबानियाँ,
जीस्त - ज़िन्दगी, बेदार - जागरूक, अहबाब- करीबी लोग, आक़िबत- परिणाम,
गुनाहो-फजलों = पाप और पुण्य की
-------------------------------------------------------------








आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)
8 कविताप्रेमियों का कहना है :
"बे-तार फोन से गर इंसानों में गुफ्तगू है मुमकिन
तो मुमकिन बेदार* दिल से दिल की बात क्यों नहीं"
ये मजेदार है....
बाकी ग़ज़ल भी अच्छी है....बिना वज़न के शेर/शेरों से बचा जाए तो और भी मज़ा आएगा....
कभी तो ख़ुद सवालों में ही जवाब छुपा होता है
मगर तेरे जवाबों में भी ऎसी बात क्यों नहीं
वाह! रूपम जी! एक एक शेर लाजवाब है
किस किस की चर्चा करुं
निखिल भाई की आपत्ति मुझे समझ नहीं आती.
सुंदर गजल,लगभग सारे ही शे'र लाजवाब
आलोक सिंह "साहिल"
गजल अच्छी लगी पर कुछ शब्दो के कारण गजल से ध्यान हट रहा था जिनके अर्थ काफी कठिन थे हालाकि अपने उनके अर्थ दिए हुए थे
मै आपको एक सलाह देना चाहता हूँ आपकी गजले बहुत ही सुन्दर अर्थ समेटे होती है पर आप बहुत ही कठिन शब्दो का चयन करती हो जिससे गजल की खूबसूरती कुछ कम हो जाती है
कृपया उनके प्रयोग से बचे और सरल शब्दो मे गजल कहें तो गजल का मजा दोगुना हो जाएगा
सुमित भारद्वाज
बे-तार फोन से गर इंसानों में गुफ्तगू है मुमकिन
तो मुमकिन बेदार* दिल से दिल की बात क्यों नहीं
ऐ औरत, हर कदम से पहले तू जमीन परखती है
दिल रखने के मुआमले में ये एहतियात क्यों नहीं
ये दो शेर तो लाजवाब है.
बहुत बढ़िया लिखा है आपने पर मुझे भी लगा की कुछ जगहों पे शब्द कुछ कठिन थे जो ग़ज़ल की एकरसता को भंग करते है.
न ग़ज़ल का व्याकरण आता है न ही उर्दू..
पर रूपम जी, आपके शे’र मुझे बहुत पसंद आये..
कठिन शब्दों की जहाँ तक बात है.. गज़ल की सरलता तो कम होती है पर पाठकों को उर्दू के लफ्ज़ सीखने को मिल जाते हैं...
लिखती रहें...
नीचे आपने लिखा : "~ग़ज़ल है तो बहर में क्यों नहीं !? :-)"
इसने सारे सवाल खत्म कर दिये.. :-)
आप का शब्द कोष बहुत बड़ा है कुछ शब्द हम को भी सिखने को मिलगये .ग़ज़ल बहुत ही सुंदर है
बधाई
रचना
आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)