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Thursday, September 25, 2008

अंजामे-बेइत्ख्तियारी है ......


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दोराहे पे अलग हुए, कब तक पर हम जुदा चलेंगे
इसी धरती के रस्ते, कहीं न कहीं ज़रूर मिलेंगे

ये दरवाज़े बहुत सालों से बंद है तुम इनपर
दस्तक और न दो अब ये टूट कर ही खुलेंगे

बीज दुआओं के उसके दर पर छोड़ आई हूँ
मेरे जाने के कुछ दिन बाद ये फूल खिलेंगे

दोनों यूँ घर में रहते हैं जैसे उला* और सानी*
मिस्रों-से* संग चलेंगे पर ग़ज़ल में नहीं मिलेंगे

अभी बच्चों के कमरे में ज़िन्दगी समेट आई हूँ
देखना कुछ देर में ये खिलौने फिर बिखरेंगे

मेरा दर्द देखकर लोग क्यों कफ़न खरीद लाये
उसके सितम बाकी हैं अभी ये और तडपाएंगे

रूह-फजां शाइरी अंजामे-बेइत्ख्तियारी है वरना
हुजूमे-अल्फाज़ तो हर चौराहे पर मिलेंगे**

~ RC

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जानकारी के लिए - ये रचना बेहर में नहीं है इसलिए ग़ज़ल नहीं कहला सकती
अगर इस रचना को ग़ज़ल बना देते हैं, तो इसमे रदीफ़ न होने की वजह से ये "refrainless ग़ज़ल" कहलाएगी
* उला, सानी, मिस्रा - जैसा कीहम जानते हैं, शे'र की हर लाइन को मिस्रा कहते हैं,
पहली लाइन मिस्रा-उला कहलाती है और दूसरी मिस्रा-सानी
रूह-फजां =प्राण-वर्धक,

अंजामे-बेइत्ख्तियारी=मजबूरियों का अंजाम,
हुजूमे-अल्फाज़=शब्दों के झुंड
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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

रूपम जी,
रचना के नीचे की जानकारी क्यूँ दी.....उसके बगैर ही रचना में डूबने देते तो क्या बुरा था....

खैर..
"रूह-फजां शाइरी अंजामे-बेइत्ख्तियारी है वरना
हुजूमे-अल्फाज़ तो हर चौराहे पर मिलेंगे**"
बहुत बेहतरीन...

Kavi Kulwant का कहना है कि -

achchi rachna.. sundar bhav...

sumit का कहना है कि -

वैसे बहर के बारे मे तो मुझे भी ज्यादा जानकारी नही है, पर काफिये की बात की जाए तो वो 5 और 6 शे'र मे बिगडा है।
ये बिना रदीफ की गजल है जैसा कि आपने बताया भी है।

पूरी गज़ल पसंद आयी अंतिम शे'र कुछ ज्यादा पसंद आया ।

sumit का कहना है कि -

सुमित भारद्वाज

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

अंतिम शेर बहुत पसंद आया। आपकी बातों में दम है। रचना गज़ल है या नहीं बता नही सकता। लेकिन अगर आपको बहर के बारे में सीखना हो(जैसा कि मैं भी सीख रहा हूँ) , तो कृप्या यहाँ जाएँ।

http://subeerin.blogspot.com/

बधाईयाँ।

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

अभी बच्चों के कमरे में ज़िन्दगी समेट आई हूँ
देखना कुछ देर में ये खिलौने फिर बिखरेंगे

रूह-फजां शाइरी अंजामे-बेइत्ख्तियारी है वरना
हुजूमे-अल्फाज़ तो हर चौराहे पर मिलेंगे**

-उप्रोक्त शे'र अत्यधिक पसन्द आये..

उला हो सानी हो रदीफ हो या मिसरा..
शे'र शहर में आ जाता है कभी तो भूला बिसरा..

बहुत अच्छे भाव युक्त लेखन..
शुभकामनायें

neelam का कहना है कि -

मेरा दर्द देखकर लोग क्यों कफ़न खरीद लाये
उसके सितम बाकी हैं अभी ये और तडपाएंगे

ye shaayri ke niymaon ka jhanjhat

to hume maloom nahi ,jo dil ko choo jaay wo achcha hai ,chaahey jo bhi ho

neelam का कहना है कि -

रूह-फजां शाइरी अंजामे-बेइत्ख्तियारी है वरना
हुजूमे-अल्फाज़ तो हर चौराहे पर मिलेंगे**"

yebhi samajh me aa hi gaya ,naayab hai ,kya kamaal ka likhti ho ,neelam tumhe jhuk kar salaam karti hai

"SURE" का कहना है कि -

मेरा दर्द देखकर लोग क्यों कफ़न खरीद लाये
उसके सितम बाकी हैं अभी ये और तडपाएंगे

बहुत ही वजनी रचना है ..तकनीकी रूप से चाहे गजल न हो जैसा की आप ने कहा है पर इसकी रूह में तो गजल ही गजल है .अच्छी रचना

rachana का कहना है कि -

पूरी रचना ही बहुत सुंदर है विशेष कर ये

बीज दुआओं के उसके दर पर छोड़ आई हूँ
मेरे जाने के कुछ दिन बाद ये फूल खिलेंगे
अभी बच्चों के कमरे में ज़िन्दगी समेट आई हूँ
देखना कुछ देर में ये खिलौने फिर बिखरेंगे
saader
rachana

तपन शर्मा का कहना है कि -

गज़ल की तकनीक में न ही पड़ूँ तो अच्छा... :-)

ये दरवाज़े बहुत सालों से बंद है तुम इनपर
दस्तक और न दो अब ये टूट कर ही खुलेंगे

अभी बच्चों के कमरे में ज़िन्दगी समेट आई हूँ
देखना कुछ देर में ये खिलौने फिर बिखरेंगे

मेरा दर्द देखकर लोग क्यों कफ़न खरीद लाये
उसके सितम बाकी हैं अभी ये और तडपाएंगे

मज़ा आ गया रूपम जी...

deepali का कहना है कि -

दोराहे पे अलग हुए, कब तक पर हम जुदा चलेंगे
इसी धरती के रस्ते, कहीं न कहीं ज़रूर मिलेंगे

ये दरवाज़े बहुत सालों से बंद है तुम इनपर
दस्तक और न दो अब ये टूट कर ही खुलेंगे
बहुत खूब.....आपकी रचना में डूब जाने को मन करता है.

Anonymous का कहना है कि -

सम्पादक की कैंची ?तिप्न्नी हटा दी ,यही तो कहा था की यह तो ग़ज़ल नहीं है जैसा लेखक ने माना है ,मगर लेखक का मिजाज गज़लियत का है ,याने अच्छी ग़ज़ल लिख सकतें हैं बस छंद सीख लें

RC का कहना है कि -

Sabka bahut bahut shukriya.

-RC

sahil का कहना है कि -

rupam ji,
akhir ka sher to gajab likha hai.
ALOK SINGH "SAHIL'

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अंदाज़-ए-बयाँ थोड़ा और निखारें।

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