सरकारी अनुदान
झिंगुरों से पूछते, खेत के मेंढक
बिजली कड़की
बादल गरजे
बरसात हुयी
हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा
मगर जो दिखना चाहिए
वही नहीं दीखता !
यार !
हमें कहीं,
वर्षा का जल ही नहीं दिखता !
एक झिंगुर
अपनी समझदारी दिखाते हुए बोला-
इसमें अचरज की क्या बात है !
कुछ तो
बरगदी वृक्ष पी गए होंगे
कुछ
सापों के बिलों में घुस गया होगा
मैंने
दो पायों को कहते सुना है
सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है
फटाफट सूख जाता है !
हो न हो
वर्षा का जल भी
सरकारी अनुदान हो गया होगा।
चकाचक = अत्यधिक मात्रा में
-देवन्द्र कुमार पाण्डेय



























7 टिप्पणी:
वाह वाह वाह वाह....
आलोक सिंह "साहिल"
बहुत ही सरल कविता है.
आनंद की अनुभूति होती है इसे पढ़कर
सही व्यंग है | छोटी , सुंदर रचना है |
अवनीश तिवारी
हो न हो
वर्षा का जल भी
सरकारी अनुदान हो गया होगा।
बहुत बढ़िया लिखा है। बधाई स्वीकारें।
अच्छा व्यंगय है
सुमित भारद्वाज
बहुत प्यारी रचना।
aap ki rachna bahut hi achchi hai mujhe achchhi lagi
saader
rachana
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