Monday, August 11, 2008

अंग सभी पुखराज तुम्हारे

मेरे मन के ताजमहल में
निशि-दिन गूँजें साज तुम्हारे

खजुराहो के बिम्ब सरीखे
अंग सभी पुखराज तुम्हारे

डर कर भागे चाँद सितारे
जब देखे आगाज़ तुम्हारे

अपने दिल में हमने छुपाये
पगली कितने राज़ तुम्हारे

सुनना भूले गीत-ग़ज़ल हम
सुन मीठे अल्फ़ाज तुम्हारे

कल थे हम, हां कल भी रहेंगे
जैसे हम हैं आज तुम्हारे

जब तक दिल में 'श्याम' रखो तुम
हैं तब तक सरताज तुम्हारे

-यूनिकवि श्याम सखा 'श्याम'

16 टिप्पणी:

नीरज गोस्वामी said...

श्याम जी
बहुत सार्थक प्रयास किया है आपने...कहीं कहीं अनावश्यक शब्द रचना की रवानी में बाधा पहुंचाते हैं...फ़िर भी बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...
नीरज

अवनीश एस तिवारी said...

बिकुल ले में लगा |
सुंदर रचना है |

अवनीश तिवारी

RC said...

Ati sundar rachana. Khaaskar ye pnktiyaan
अपने दिल में हमने छुपाये
पगली कितने राज़ तुम्हारे

सुनना भूले गीत-ग़ज़ल हम
सुन मीठे अल्फ़ाज तुम्हारे

कल थे हम, हां कल भी रहेंगे
जैसे हम हैं आज तुम्हारे

शोभा said...

कल थे हम, हां कल भी रहेंगे
जैसे हम हैं आज तुम्हारे
श्याम सखा जी
बहुत ही सुन्दर लिखा है। आनन्द आगया। बधाई स्वीकारें।

amar said...

गीत की सुकुमारता,और ग़ज़ल का सौष्ठव- दोनों का अद्भुत संगम। हां!'जब देखे आग़ाज़ तुम्हारे'से क्या मंतव्य है समझ नहीं पाया।

sahil said...

अद्भुत!आनंद आ गया पढ़कर.गजब की रवानी है मानो कविता न पढ़कर कोई गीत पढ़ रहे हों.मन मस्त हो गया.बधाई स्वीकार करें.
आलोक सिंह "साहिल"

rachana said...

aap ki kavita hamesha ki tarah sunder hai
saader
rachana

shyam said...

एक कहानी कोमा भी पोस्ट हुई है आज ही.नजर डालें ,मुझे आशा है आपको पसन्द आयेगी
श्यामसखा

shyam said...

मित्रो वज्न है फ़ेलुन-फ़ेलुन फ़ाल फ़ऊलुन
22 22 21 122
श्यामसखा श्याम

akash said...

महोदय
आपके द्वारा लिखित व प्रेषित ग़ज़ल की बहर
२२२२, २११२, २
होने में शंका है कृपया समाधान करें
क्योकि आपके काफिया "तुम्हारे" का वज्न २२२ निकलता है.....
सादर ......आकाश

श्याम said...

गज़ल को पसन्द करने के लिये धन्यवाद।
गोस्वामी जी वज्न लिखा है अगर कहीं अटक लगी है तो बतलाएं उसे दुरुस्त क लूंगा मेरे ख्याल से तो ठीक है बहर पर।
आकाश-तुम्हारे= को तुमारे के वज़्न पर पढ़ाजाता है याने १२२ न कि २२२ ।श्यामसखा

Anonymous said...

आगाज=आमद =आना=पदार्पण

Harkirat kalsi Haqeer said...

koun si pagli ke raaz?

Kavi Kulwant said...

ati sundar.. wah wah..samaj ke dukh dard peeda me hum log jaise prem ko bhul hi baithe the..

Kavi Kulwant said...

गर भूलोगे तो भी रहेंगे
बनकर दिल में ताज तुम्हारे

निखिल आनन्द गिरि said...

वाह..बहुत पसंद आया आपका यह अंदाज़......पढ़कर मज़ा आ गया...पूरी रचना एक ही प्रवाह में पढ़ गया..