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Monday, August 11, 2008

स्रष्टा


उसकी बनाई मूर्त्तियां
सजीव-सी दिखतीं
ताज्जुब की बात ये
कि....मूर्त्तियों की विकृतियां भी
स्वाभाविक लगती
बिल्कुल मानव - सादृश्य
चेहरे पर तमाम भाव
निःसंदेह भ्रम पैदा करते

कलाकार की कला साधना...
उसकी शैली देखने....
मैंने एक पूरा दिन
उसके साथ गुजारा...

वह दिन के दूसरे पहर तक
सोकर उठा
फिर सिरहाने रखे दारु की
कुछ घूंट हलक से उतार
दिनचर्या से निवृत्त हुआ
नाश्ते में दारु ही ज्यादा थी चबैना से
उसके बाद मिट्टी के लिए
सीधा श्मशान गया...
मिट्टी लाकर उसे देर तक
पैरों तले रौंदता रहा
और दिन भर नशे में
बेफिक्री के साथ
तमाम तरह की मूर्त्तियां
गढ़ता रहा....पीता रहा...
बीच में शायद कुछ खाया हो!
इस तरह रात के तीसरे पहर तक
जब वह काम करने और पीने से
थक कर चूर हो गया....सो गया

कई दिनों तक मैं सोचता रहा
उसकी मूर्त्तियों की सजीवता के बारे में
और जोड़ता रहा....
मूर्त्तियों के भावों को
कभी श्मशान की मिट्टी....
....मद्यपान...
....और कभी उसकी बेफिक्री से
पर ढ़ूंढ़ न पाया सही आधार
खैर! जो हो
अपनी तमाम मूर्त्तियों के लिए
वो कलाकार तो
भगवान ही है........

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

gunjte swar का कहना है कि -

धरती को कागज बना
सागर को स्याही
और लिख....लिख मार
जो भी दिल में आये
मेरे भाई।
वेदना में लिख
भावना में लिख
कभी क्षुब्ध हो जा
फिर उत्तेजना में लिख
तेरी विस्फोटक प्रतिभा
से आतंकित कर दे , समाज को
लिख दे कुछ भी रॉकेट छाप
मिला दे धरती आकाश
लोग कहें... छाती पर हाथ धर
वो मारा
भाई वाह, लिख दिया जहां सारा।
दांत किटकिटा
सिर के बल खड़ा हो जा
कलाबाजियां खाते- खाते लिखा कर
सरेआम मत बोल
बस वक्राकार हँस
बुद्घिजीवी दिखा कर
और कुछ भी लिखा कर

बेटे,आसाराम बन
रामचरित लिख
गुलशन को गुरू बना
कटी पतंग लिख
ब्लॉगर बन
पुण्यात्माओं की पूजा कर
खबरिया चैनल से रोटी जुगाड़ के
उनकी ही मां—बैन कर।
खबर की मौत हो
चाहे मौत की खबर
बेरहम और बाजारू
पत्रकारिता को लानत भेज
टेसू बहाया कर , नैतिकता पेला कर
जमी जमाई दूकान की मसलंद पर टिककर
निर्भय पादा कर ।
लेकिन,एक छोटी सी अरज है भाई
चाहे कुछ भी लिख- पोत
उखाड़-पछाड़
हमे कोई फर्क नहीं पड़ता मगर
सिर्फ लिखने के लिए
कविता मत लिख चिरकुट
हमारी जातीय संवेदना
सिहर जाती है।

नीरज गोस्वामी का कहना है कि -

अपनी तमाम मूर्त्तियों के लिए
वो कलाकार तो
भगवान ही है........
सच कहा आपने...बहुत अच्छी रचना है आप की...बधाई.
नीरज

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

ईस्वर ने विविधता से सृजन तो किया है | इसे मूर्तिकार के रूप में प्रस्तुत कराने के लिए बधाई |

अवनीश तिवारी

sahil का कहना है कि -

आज तो आपने बिल्कुल ही अलग रुख अख्तियार कर लिया.मैं समझ नही पा रहा हूँ,क्या लिखूं........खैर,स्तरीय रचना.
आलोक सिंह "साहिल"

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

आपकी रचना काफी संजीदा होती है....दो-तीन बार पढ़नी पड़ती हैं सार समझने के लिए..यही आपकी खूबी भी है और खामी भी.....और आपकी यूनिक पहचान भी....वैसे, रचना अच्छी है.....

mamta का कहना है कि -

is rachna ko padkar yun laga jaise ki kisi sarabi ne sarab ke nashe me das barah santano ko to janam de diya par use khud bhi nahi pata ki uska ye karm ishwar ke saman hai. pharak hai to bas itna is ishwar apni rachna ka dhyan rakhta hai or sarabi nahi

mona का कहना है कि -

All poems written by this poet have a deep meaning. All of them are not easy to understand by a person who does not have good understanding of such intricacies. For the poet and his poems I wud like to say :

उसकी बनाई मूर्त्तियां
सजीव-सी दिखतीं
ताज्जुब की बात ये
कि....मूर्त्तियों की विकृतियां भी
स्वाभाविक लगती

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