Wednesday, August 20, 2008

हवा में टंगे लोग

सुना था
घर-घर होता है
जिसमें बैठा
सुख अक्सर होता है।
उम्र के पचपन वर्ष
काट दिये थे
किराये के कमरों में
सो सोचा
किसी तरह एक घर बनाया जाए।
ले-देकर
यानी भविष्य निधि से उधार
बैंक के होकर कर्जदार
हमने खरीदा
दो शयनकक्ष वाला फ्लैट
मगर यहाँ आकर
फिर हुआ सपना चकना चूर
क्योंकि
न तो पाँव तले
जमीन थी ना सर पर छत
फ्लैट की छत थी
ऊपरवालों का फर्श
और हमारे पाँव थे टिके
किसी की छत पर
इस तरह हमें टंगे थे हवा में
मगर हवा भी कहाँ अपनी थी
खिड़कियों से
बेंध रही थी सामने वाले
ब्लॉक से बेशरम नजरें
इसलिये खिड़कियाँ परदों से ढँकनी थी
न आँगन था
न तुलसी
इस तरह फिर उम्र थी झुलसी
रात को ऊपर वाले नाचते-गाते हैं
अपने फर्श व हमारी छत पर
धमाल मचाते हैं
हम इस शोर गुल से जगे हैं।
क्या नहीं सचमुच
हवा में टंगे हैं।

-श्याम सखा 'श्याम'

6 टिप्पणी:

sumit said...

न तो पाँव तले
जमीन थी ना सर पर छत
फ्लैट की छत थी
ऊपर बालों का फर्श
और हमारे पाँव थे टिके
किसी की छत पर
इस तरह हमें टंगे थे हवा में
मगर हवा भी कहाँ अपनी थी
खिड़कियों से
बेंध रही थी सामने वाले
ब्लॉक से बेशरम नजरें
इसलिये खिड़कियाँ परदों से ढँकनी थी
न आँगन था
न तुलसी
इस तरह फिर उम्र थी झुलसी

बहुत बढिया लिखा।

सुमित भारद्वाज

rachana said...

kya baat kya sahi chitran hain bahut khoob
saader
rachana

तपन शर्मा said...

सच में हवा में टंगे हैं श्याम जी...
बिल्कुल सही कहा है...

BRAHMA NATH TRIPATHI said...

श्याम जी आप सच में एक महँ कवि है मैंने हिंद युग्म पर आपकी कई कविताएं पढ़ी सब एक से बढ़कर एक छोटे शब्दों में बड़ी बात कहना कोई आप से सीखे
सच में हिंद युग्म गगन के सितारे है आप

seema,"simriti" said...

शुक्र मानिये हवा में टंगे है लोग,वरना कितनों का सपना तो हवा मे टंगे रहने का भी ना पूर्ण हो पता है,सपना केवल सपना रह,हकीकत के धरातल फिसल जाता है

shyamskha said...

त्रिपाठी जी व् आप सभी को धन्यवाद श्याम सखा श्याम