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Friday, June 13, 2008

विलुप्त होते किसान


गाँव अब नही रहे,
प्रेमचंद की कहानियों वाले,
बैलों का जोडा - हीरा मोती,
अब नही दिखते कहीं -
वर्षा की बाट देखते,
जुम्मन और होरी,
अब वो कम ही जाते हैं,
ईट की भट्टियों की तरफ़,
जहाँ खेत थे उनके कभी,
भाडे के ठेकेदारों के,
बेरहम मजदूरों ने, नोंच लीं हैं -
हरियालियाँ सभी,
खेत अब क्या हैं -
जमीन का एक टुकडा बस,
जो काम आ जाएगा,
बिटिया की शादी में,
या किसी बुरे वक्त में,
किसी तरह पेट पाला,
लिखा-पढ़ा दिया बच्चों को,
अब कोई दिल्ली, कोई मुम्बई,
तो कोई साउदी से भेज देता है,
बैंक की किश्त,
और जरुरी खर्च,
आराम कुर्सी पर बूढी पीठ टिका कर,
पढ़ लेते हैं अब वो,
दुनिया भर की ख़बरों का अखबार,
खाध्य संकट पर हो रहा है विचार,
विकासशील देशों की खपत से,
चिंतित है अमेरिका...
होता रहे, उन्हें क्या...
सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज - मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान



( चित्र , सौजन्य बिन्जो वंगो, मेरे मित्र )

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

विकास के नाम पर मूल को नष्ट करने की प्रक्रिया..
सही कह रहें हैं सजीव जी -

खेत अब क्या हैं -
जमीन का एक टुकडा बस,
जो काम आ जाएगा,
बिटिया की शादी में,
या किसी बुरे वक्त में,
किसी तरह पेट पाला,
लिखा-पढ़ा दिया बच्चों को,


सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज - मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान

बढिया, साधूवाद्

kmuskan का कहना है कि -

bahut badiya

anitakumar का कहना है कि -

वाह, बहुत बड़िया अभिव्यक्ति

Seema Sachdev का कहना है कि -

सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज - मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान
सच्च मे संजीव जी इसे विकास कहा जाए या ह्रास लेकिन एक बात टू तय है की विकास की शुरुयात ह्रास से होती है

pooja anil का कहना है कि -

सजीव जी,

इस कविता की कुछ पंक्तियों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया --

खाध्य संकट पर हो रहा है विचार,
विकासशील देशों की खपत से,
चिंतित है अमेरिका...

बहुत सही कहा आपने, विकासशील देशों की उन्नति को देखकर विकसित देश शायद अपने ऊपर खतरा महसूस करने लगते हैं , खास तौर पर भारत और चीन इस समय बढ़ती अर्थव्यवस्था की वजह से सभी जगह चर्चा का विषय बने हुए हैं .
उन्नति और अवनति दोनों को दर्शाती है आपकी कविता , और किसान का विलुप्त होना सचमुच दुखदायी है, चिंता का विषय है . बहुत खूब

^^पूजा अनिल

Harihar का कहना है कि -

विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज - मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान

आपकी कविता में कटु यथार्थ है संजीव जी!

mehek का कहना है कि -

बहुत बड़िया

राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

भाडे के ठेकेदारों के,
बेरहम मजदूरों ने, नोंच लीं हैं -
हरियालियाँ सभी,
खेत अब क्या हैं -
जमीन का एक टुकडा बस,
जो काम आ जाएगा,
बिटिया की शादी में,
या किसी बुरे वक्त में,
किसी तरह पेट पाला,
लिखा-पढ़ा दिया बच्चों को,
अब कोई दिल्ली, कोई मुम्बई,
तो कोई साउदी से भेज देता है,
बहुत अच्छी कविता है, आज किसानों की और किसी का ध्यान नहीं है. किसान द्वारा उत्पादित खाद्यान्न के दाम बढते हैं तो चारों ओर शोर मचता है किन्तु किसान द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं के दाम आसमान छूते हैं तो किसी को चिन्ता नहीं सताती.

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

आज ऐसी कई रचनाएं लिखे जाने की ज़रूरत है....
गाँव से बहुत कुछ बटोर कर लाये हैं आप...ये भावनाएं जब तक जिंदा हैं, किसान भी जिंदा रहेंगे....एक उम्मीद के साथ...
निखिल

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहे हैं हल जोतते,
जुम्मन और होरी आज - मेरे गाँव में -
विलुप्त हो रहा हैं - किसान

कडुवा सच, आपकी रचना बाध्य करती है कि विकास को विनाश का पर्यायवाची होने से पहले एसी दिशा मिले जिससे मिट्टी भी बचे और आदमी चाँद पर भी टहल आये। संवेदनाये जगाती है आपकी रचना..

***राजीव रंजन प्रसाद

पंकज सुबीर का कहना है कि -

अच्‍छी बात उठाई है आपने सजीव जी विकास के नाम पर हमेशा ही पेड़ों को और हरियाली को ही बलिदान देना होता है । मेरे घर में कुछ काम होना था एक पानी की टंकी और एक गैरेज बनना था तो सबसे पहले मेरा प्रिय बादाम का पेड़ काटा गया और उसके बाद सेवफल और चीकू को जाना पड़ा । सचमुच विकास के पंजे बहुत क्रूर और निर्दयी हैं । आपने अच्‍छी बात उठाई आपके मेल से मिली लिंक के जरिये बहुत दिनों बाद हिन्‍द युग्‍म पर आया । आपकी कविता पढ़ी अच्‍छी लगी और संतोष भी हुआ कि मैं आज भी उस जगह पर रह रहा हूं जहां किसान भी है खेती भी है और गांव भी हैं अभी यहां विकास के हाथ कुछ उजाड़ने के लिये आए नहीं हैं । अभी किसान हैं और सुखी भी हैं अगर सुख को पैसों के तराजू से न तोलें तो । सभ्‍य होने के चक्‍कर में हम हमेशा प्रकृति के साथ ही क्‍यों खेलते हैं ये समझ से परे की बात है । आपकी वो बात अच्‍छी लगी कि जमीन का टुकड़ा बिटिया की शादी में काम आएगा । कुछ दिनों पहले जब मुझ पर एक अत्‍यंत कठिन समय आया था तब मुझे भी वही जमीन काम आई थी । आपने सटीक लिखा है बधाई ।

devendra का कहना है कि -

अच्छी कविता --अच्छा विषय ।
आपकी कविता पढ़ते-पढ़ते मन में ये भाव जगे----

कम्प्यूटर पर बैठे - बैठे
जब पैसों के पेंड़ उगेंगे
जुम्मन-होरी तब खेतों में
कहो भला फिर कहाँ मिलेंगे।
---देवेन्द्र पाण्डेय।

"VISHAL" का कहना है कि -

सभ्यता के विकास में अक्सर,
विलुप्त हो जाती हैं -
हाशिये पर पड़ी प्रजातियाँ,
विलुप्त हो रहा हैं - किसान
kavita ki prashansha k liye mujhe
shabd nahi mil pa rahe hai.
vishalvermaa.blogspot.com

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