मैं जानता हूँ तुम मुझसे क्या चाहते हो
मौन
सहमति
पर क्या तुम सुन नही पाते आवाजें यादों के उन चीथडो की
जो लटके रहतीं हैं मेरे दीवारों पर
किसी पुराने फटे कोट की तरह
क्या भूले हो तुम कभी अपने घर का रास्ता
आवाजों के जंगल में
क्या कभी किसी आवाज़ ने कैद किया है तुम्हारी परछाई को
मैं जानता हूँ तुम मुझसे क्या चाहते हो
पर
क्या तुम सुन नही पाते आवाजों के आर्तनाद को
चीखती रहती हैं जो मेरी आँखों में उस छटपटाती चुप्पी को
क्या तुमने कभी नही सुनी है मेरे सपनो की सुगबुगाहट
मैं जानता हूँ तुम मुझसे क्या चाहते हो
पर क्षमा चाहता हूँ मैं हे देव
मैं सुन नहीं पाता तुम्हारी याचना के आदेशों को
चुप्पी के शोर में
माफ़ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नही हो



























13 टिप्पणी:
पावस,
आपकी रचना में बिम्बों की गहराई बहुत होती है जिससे कथ्य जीवंत हो उठता है।
पर क्या तुम सुन नही पाते आवाजें यादों के उन चीथडो की
जो लटके रहतीं हैं मेरे दीवारों पर
किसी पुराने फटे कोट की तरह
और रचना का अंत करने की आपकी शैली उसे मुकम्मल कविता बनाती है:
चुप्पी के शोर में
माफ़ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नही हो
***राजीव रंजन प्रसाद
पावस जी आपकी लेखनी की पहचान होने लगी है हमे ,पहली ही पंक्ति से आपका आभास होने लगता है और जो बिम्ब आप चुन-चुनकर लाते है ,वो लाजवाब है
क्या कभी किसी आवाज़ ने कैद किया है तुम्हारी परछाई को
बधाई
-पर क्या तुम नहीं सुन पाते आवाजें यादों के उन चीथड़ों की
जो लटके रहती हैं मेरे दीवारों पर
किसी पुराने फटे कोट की तरह--
----------------------------
माफ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नहीं हो।
--एक सशक्त रचना के रचना के लिए बधाई।
--देवेन्द्र पाण्डेय।
मैं सुन नहीं पाता तुम्हारी याचना के आदेशों को
चुप्पी के शोर में
माफ़ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नही हो
विरोधभासों का अद्भुत प्रयोग सुंदर .. ! शुभकामना
क्या तुम सुन नही पाते आवाजों के आर्तनाद को
चीखती रहती हैं जो मेरी आँखों में उस छटपटाती चुप्पी को
क्या तुमने कभी नही सुनी है मेरे सपनो की सुगबुगाहट
बहुत ही सुंदर ढंग से बात कही है आपने पावस जी ..अच्छी लगी आपकी रचना
पावस जी,
मैं जानता हूँ तुम मुझसे क्या चाहते हो
मौन
सहमति
पर क्या तुम सुन नही पाते आवाजें यादों के उन चीथडो की
जो लटके रहतीं हैं मेरे दीवारों पर
किसी पुराने फटे कोट की तरह
बहुत सुन्दर रचना मिली आपकी कलम से
बहुत बहुत धन्यवाद
क्या तुमने कभी नही सुनी है मेरे सपनो की सुगबुगाहट
पावसजी, आप सपनो की सुगबुगाहट तक भी पहुच गए, सच कहा है जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ भी पहुंचे कवि , इस सुंदर रचना के लिए बधाई |
चुप्पी के शोर में
माफ़ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नही हो
बहुत ही सुंदर ,
YOUR POEM IS REALLY VERY TOUCHING.....IT PRESENTS A PICTURE WHICH EVERYONE FACES ON SOME PHASE OF HIS LIFE...
KYA TUMNE KABHIE NAHIN SUNI HAI MERE SAPNO KI SUBBUGAHAT..
MAF KARNA PAR TUM MERE MASEEHA NAHI HO....
CONGRATULATIONS ...GREAT WORK.....
-ISMITA
पावस जी ,
बहुत ही गहराई लिए हुए है आपकी रचना
क्या तुम सुन नही पाते आवाजों के आर्तनाद को
चीखती रहती हैं जो मेरी आँखों में उस छटपटाती चुप्पी को
क्या तुमने कभी नही सुनी है मेरे सपनो की सुगबुगाहट
और
मैं सुन नहीं पाता तुम्हारी याचना के आदेशों को
चुप्पी के शोर में
माफ़ करना
पर
तुम मेरे मसीहा नही हो
बहुत ही करुण स्वर में एक कठोर फ़ैसला , अति सुंदर
^^पूजा अनिल
सिर्फ़ एक शब्द- सुंदर!
अति सुंदर
आलोक सिंह "साहिल"
Post a Comment