
अनेकता में एकता
मेरे भारत की विशेषता
यही पाठ पढ़ा-
और यही पढ़ाया
किन्तु प्रत्यक्ष में
एकता का
कहीं दर्शन ना पाया
कभी धर्म के नाम पर
खुले आम घर जले
मन्दिर मस्ज़िद टूटे
लाखों बर्बाद हो गए,
फिर भी हमने…….
धर्म निरपेक्षिता की
डींगे हाँकी….
प्रान्तीयता के आधार पर
देश के सर्वोच्च पद का निर्धारण
राष्ट्रीयता के हृदय पर
एक बड़ा आघात
और सारा देश चुप…..
पद का सही उम्मीदवार
अपमान सह गया
और राष्ट्र मूक रह गया
और आज फिर..
एक ओर……..
प्रान्तीयता की आवाज़
कानों में शीशा डाल रही है
देश के हर नागरिक को
किंकर्तव्य विमूढ़ बना रही है
आशा की किरणें बहुत
क्षीण होती जा रही हैं
और हम गर्व से
राष्ट्रीयता का…..
राग आलाप रहे हैं
डींगें हाँक रहे हैं
दूसरी ओर……
आरक्षण का राक्षस
अपनी बाँहें फैला रहा है
और सारा देश विवशता से
कैद में कसमसा रहा है
यह आरक्षण की माँग है या
सुरसा का मुँह....
जो निरन्तर....
बढ़ता ही जा रहा है
कोई भी आश्वासन
काम नहीं आ रहा है।
भारत माता शर्मिन्दा है
अपनी सन्तान के
कुकृत्यों पर
उसका अंग-अंग
पीड़ा से कराह रहा है
ना जाने कौन ये
जहर फैला रहा है
कोई भी उपाय
काम नहीं आ रहा है
मेरे देश की आशाओं
देश को यूँ ना जलाओ
माँ के घावों पर
थोड़ा सा मरहम भी लगाओ
हम सब एक हैं
ये प्रतिज्ञा दोहराओ
दे दो विश्वास
जो खोता जा रहा है
देश के हर कोने से
यही आग्रह
यही स्वर आ रहा है

वरिष्ठ पत्रकार और कवि रामकृष्ण पाण्डेय का 16 नवम्बर की शाम दिल का दौरा पड़ने से अकास्मिक निधन हो गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुत से विद्वान याद करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं
क्या आप इस सप्ताहांत फिल्म देखने जाने की योजना बना रहे हैं तो सप्ताह की बड़ी रीलिज पर पढ़िए फिल्म समीक्षक प्रशेन ह. क्यावल की राय
इस चित्र को देखते ही आपके मन में अपने प्यारे बच्वे का ख्याल आता है ना, तो बस इस फोटो को देखकर एक बाल-कविता बनाइए और हमें भेज दीजिए।










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14 कविताप्रेमियों का कहना है :
भारत माता शर्मिन्दा है
अपनी सन्तान के
कुकृत्यों पर
उसका अंग-अंग
पीड़ा से कराह रहा है
ना जाने कौन ये
जहर फैला रहा है
कोई भी उपाय
काम नहीं आ रहा है
बहुत अच्छे शोभा जी |भारत की आज की समस्याओं का आपने बखूबी चित्रण किया है
अपने देश की समस्याओं पर paini निगाह..
alok singh "sahil"
दूसरी ओर……
आरक्षण का राक्षस
अपनी बाँहें फैला रहा है
और सारा देश विवशता से
कैद में कसमसा रहा है
यह आरक्षण की माँग है या
सुरसा का मुँह....
जो निरन्तर....
बढ़ता ही जा रहा है
कोई भी आश्वासन
काम नहीं आ रहा है।
वाह.. सटीक रचना ..
बधाई
शुरूवात की दो लाइन पढने पर लगा कि कविता मे व्यंग्य होगा, पर पूरी कविता पढने पर भाव समझ आये
बहुत ही सुन्दर रचना लिखी आपने..
सुमित भारद्वाज
कविता तीखे स्टेट्मेंट्स देती है जो रचना को सशक्तता प्रदान करते हैं। सच को लिखने में जो तलखी होती है वह आपके शब्दों में झलक भी रही है। आपकी लीक से हट कर यह रचना है, बधाई स्वीकारें...
***राजीव रंजन प्रसाद
good one,
AVaneesh
bilkul sahi chitran kiya hai shobha ji,na jane saat rangon ko ek saath bandh ke rakhnewala hamara desh phir kab gagan mein bhikhare ga,bahut hi sundar rachana,bahut badhai
samayik kavita..
apna sandesh dene mein safal rahi..
badhayee..
देश की सिथ्ती को बताती अच्छी रचना आज की समस्याओं का अच्छा चित्रण किया है !1
शोभा जी
स्पंदित कर देने वाली सामयिक रचना ..... शुभकामना
"आरक्षण का राक्षस अपनी बाँहें फैला रहा है ..........", कितनी सही बात कही है आपने. धन्त्वाद मेरे ब्लाग पर आने के लिए और यह टिप्पणी करने के लिए.
शोभा जी,
एक कटू सत्य को उजागर करती व प्रशन्सनीय आग्रह भरी रचना के लिये बधाई
बहुत अच्छी कविता है शोभा जी ..सामयिक दौर की हवा से बचकर शब्दों को निकल जाने नहीं दिया ...सुंदर प्रस्तुति ...........
सुनीता
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