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Sunday, April 13, 2008

बैसाखी…


धरती के आँचल में
सजी हैं स्वर्ण रश्मियाँ
खेतों में आज
बिखरा है सोना
जिसे देख कर महका
कृषक मन का कोना-कोना

किया धरती ने सोलह श्रृंगार
चमचमाते नयन बार-बार

धानी चूनर में मोती सजे हैं
ढोल ताशे और बाजे बजे हैं
दिल की वीणा के झंकृत हैं तार
झूमें गाए है मन बार-बार
हुए आँखों के सपने साकार
फिर से जागी उम्मीदें हज़ार

अब प्रिया भी हुई है उदार
लेके आए वो सोने का हार
उनके गालों की रंगत जो देखूँ
बिन पिए ही चढे है खुमार
तेरी पूरी करूँ हर तमन्ना
दे- दे मुझको तू बाँहों के हार

आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार


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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

mehek का कहना है कि -

बहुत सुंदर

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

शोभा जी,

रचना विवरन ही विवरन में समाप्त हो रही है। अंतिम पंक्तियों मैं पाठक और भी कुछ तलाशता रह जाता है।

आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार

शेष रचना अच्छी है। बधाई स्वीकारें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

अल्पना वर्मा का कहना है कि -

सही समय पर आप की रचना आयी है.

सभी को राम नवमी aur बैसाखी की ढेर सारी बधाई .

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सुंदर रचना है |

अवनीश तिवारी

anju का कहना है कि -

अति सुंदर शोभा जी
बैसाखी के इस मौके पर बहुत अच्छा लिखा है आपने
आपकी कविता सजीव चित्रण कराती है
badhayi

seema sachdeva का कहना है कि -

वैसाखी और राम-नवमी की शुभ-कामनाएं

रंजू का कहना है कि -

आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार

सुंदर रचना सुंदर मौके पर शोभा जी बधाई आपको

Kavi Kulwant का कहना है कि -

बहुत अच्छी लगी आप की कविता...

pooja anil का कहना है कि -

शोभा जी , अच्छा वर्णन किया है वैसाखी के त्यौहार का , स्कूल में ऐसी कवितायें पढ़ने को मिलती थी , बस आपने उस वक्त की याद ताज़ा कर दी , बहुत बहुत बधाई

^^पूजा अनिल

sahil का कहना है कि -

शोभा जी,बधाई स्वीकार करें
आलोक सिंह "साहिल"

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