
धरती के आँचल में
सजी हैं स्वर्ण रश्मियाँ
खेतों में आज
बिखरा है सोना
जिसे देख कर महका
कृषक मन का कोना-कोना
किया धरती ने सोलह श्रृंगार
चमचमाते नयन बार-बार
धानी चूनर में मोती सजे हैं
ढोल ताशे और बाजे बजे हैं
दिल की वीणा के झंकृत हैं तार
झूमें गाए है मन बार-बार
हुए आँखों के सपने साकार
फिर से जागी उम्मीदें हज़ार
अब प्रिया भी हुई है उदार
लेके आए वो सोने का हार
उनके गालों की रंगत जो देखूँ
बिन पिए ही चढे है खुमार
तेरी पूरी करूँ हर तमन्ना
दे- दे मुझको तू बाँहों के हार
आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार
सजी हैं स्वर्ण रश्मियाँ
खेतों में आज
बिखरा है सोना
जिसे देख कर महका
कृषक मन का कोना-कोना
किया धरती ने सोलह श्रृंगार
चमचमाते नयन बार-बार
धानी चूनर में मोती सजे हैं
ढोल ताशे और बाजे बजे हैं
दिल की वीणा के झंकृत हैं तार
झूमें गाए है मन बार-बार
हुए आँखों के सपने साकार
फिर से जागी उम्मीदें हज़ार
अब प्रिया भी हुई है उदार
लेके आए वो सोने का हार
उनके गालों की रंगत जो देखूँ
बिन पिए ही चढे है खुमार
तेरी पूरी करूँ हर तमन्ना
दे- दे मुझको तू बाँहों के हार
आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार

वरिष्ठ पत्रकार और कवि रामकृष्ण पाण्डेय का 16 नवम्बर की शाम दिल का दौरा पड़ने से अकास्मिक निधन हो गया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुत से विद्वान याद करते हुए उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं
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इस चित्र को देखते ही आपके मन में अपने प्यारे बच्वे का ख्याल आता है ना, तो बस इस फोटो को देखकर एक बाल-कविता बनाइए और हमें भेज दीजिए।











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10 कविताप्रेमियों का कहना है :
बहुत सुंदर
शोभा जी,
रचना विवरन ही विवरन में समाप्त हो रही है। अंतिम पंक्तियों मैं पाठक और भी कुछ तलाशता रह जाता है।
आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार
शेष रचना अच्छी है। बधाई स्वीकारें।
*** राजीव रंजन प्रसाद
सही समय पर आप की रचना आयी है.
सभी को राम नवमी aur बैसाखी की ढेर सारी बधाई .
सुंदर रचना है |
अवनीश तिवारी
अति सुंदर शोभा जी
बैसाखी के इस मौके पर बहुत अच्छा लिखा है आपने
आपकी कविता सजीव चित्रण कराती है
badhayi
वैसाखी और राम-नवमी की शुभ-कामनाएं
आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें नाचें और गाएँ
रोज आती नहीं ये बहार
सुंदर रचना सुंदर मौके पर शोभा जी बधाई आपको
बहुत अच्छी लगी आप की कविता...
शोभा जी , अच्छा वर्णन किया है वैसाखी के त्यौहार का , स्कूल में ऐसी कवितायें पढ़ने को मिलती थी , बस आपने उस वक्त की याद ताज़ा कर दी , बहुत बहुत बधाई
^^पूजा अनिल
शोभा जी,बधाई स्वीकार करें
आलोक सिंह "साहिल"
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