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Friday, April 04, 2008

कामदेव







संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला

मूरत देखी खजुराहो में आसक्ति की माया
कत्थक हो या भरतनाट्यम वही भाव तो छाया
अनुभूति हो अभिव्यक्त तो जीवन मीठी बानी
दमन किये दिल रहा भटकता प्यासा मांगे पानी

तपती आंच में रहा उबलता फफक उठा तब छाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता

सपने में बन सांप डराये किस कुतिया को पाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

कुरेद कर भीतर से कोई व्यर्थ अड़ाये टांग
होती नादानो सी हरकत़ खाली जैसे भांग
प्रेम का स्वांग रचा कर लेता कामदेव प्रतिशोध
जोश खो गया होंश ना रहा कहां ज्ञान का बोध

दबी भावना पर शोभित था शर्म हया का ताला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला


- हरिहर झा


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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

aashish maurya का कहना है कि -

Bahut hi acchi kavita hai Harihar Ji
Dhadhakti hui Jwala ki aanch kavita se saaf aa rahi hai...aapki kosis vyarth nahi hai...shayad ye jwala bhi kisi ek hi nahi hai...
Anyway...keep writing
Have A Nice Day...

seema sachdeva का कहना है कि -

संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला

यह वास्तव मी चिंता का विषय है , यह जवाला जब जवाला मुखी का रूप ले लेती है तो विनाश ही होता है | आपकी कविता अच्छी है ........seema

SURINDER RATTI का कहना है कि -

हरिहर जी, बहुत सुंदर रचना .. कुछ पंक्तियाँ अच्छी लगी
तपती आंच में रहा उबलता फफक उठा तब छाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता
सपने में बन सांप डराये किस कुतिया को पाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
सुरिन्दर रत्ती

Kavi Kulwant का कहना है कि -

हरिहर झा जी का एल नया अद्भुत स्वरूप.. बहुत अच्छा लगा...

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

यह कोई नई बात नही कही अपने , ये सब जानते है | लेकिन जिन शब्दों मे और जिस तरह से कहा है
उसके लिए आपकी जितनी भी प्रशंसा करें, कम है | आपका अनुभव पूर्णतया झलक रहा है |

सच है काम को संतुलित और नियंत्रित ना करें तो यह सबसे विनाशकारी शत्रु है |
धन्यवाद |

अवनीश तिवारी

सतीश वाघमारे का कहना है कि -

हरिहर जी,

इस अद्भुत अभिव्यक्ती पर बधाई स्वीकार करें ! बहुत सुंदर रचना है.

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

हरिहर जी,

सुन्दर अभिव्यक्ति ह, मन मे संशय को अच्छे शब्दों में बखाना है.. काम सच में बहुत बड़ा शत्रु है यदि नियंत्रण से बाहर है तो...

"राज" का कहना है कि -

हरिहर जी,
बहुत ही अच्छी रचना है....
*****************
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला
*********************
शुभकामनायें!!!!

अल्पना वर्मा का कहना है कि -

अच्छी रचना.

VARUN ROY का कहना है कि -

कामदेव का काम है
ज्वाला को धधकाना
इसके चक्कर में भइया
लेकिन कभी न आना .
ऋषि मुनि तो ऋषि मुनि
भूतनाथ भी बच न पाये
कामदेव का बाण चले तो
वासना फ़िर पच न पाये .

रंजू का कहना है कि -

अच्छी लगी आपकी यह रचना हरिहर जी |

व्याकुल ... का कहना है कि -

harihar ji,

aapne apni kavita kamdev mein kaphi aise shabdon ka pryog kiya hai jise koi achha rachnakr hi likh sakta hai..mujhe kavita atyant pasand aayi...aasha hai aage bhi ise prakar ki rachnaye aap likhte rahenge....
प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता

bahut khub...uttem

Poonam Agrawal का कहना है कि -

Sashakt rachanaa .
Bahut khoob..
Keep writing..
Badhai....

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