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Saturday, March 08, 2008

कुछ क्षणिकाएँ


एक
रोता तो दिल भी है
पर अश्क सिर्फ़ आँखों में...
शायद दिल की आग इसे जीने नहीं देती...

दो
सच नहीं मिला
मुझको किताबों में...
ठीक कहते हो,
युवापीढ़ी बदतमीज है....

तीन
सुनती नहीं है
मजहबो-दीवार की बातें
इस बदचलन हवा के जरा कान तो पकड़ो...

चार
जो कुछ सुना,
सच दिखाई पड़ता है?
क्या आजतक तुम्हारे चश्मे का नंबर नहीं बदला??

पाँच
कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

रोता तो दिल भी है
पर अश्क सिर्फ़ आँखों में...
शायद दिल की आग इसे जीने नहीं देती...

" वाह , बहुत सुंदर, "
Regards

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत प्यारी क्षणिकायें

विशेष भायीं :

रोता तो दिल भी है
पर अश्क सिर्फ़ आँखों में...
शायद दिल की आग इसे जीने नहीं देती...

कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...

बहुत बहुत बधाई

रंजू का कहना है कि -

अच्छी लगी आपकी यह क्षणिकाएँ" ..विशेष रूप से यह बहुत पसन्द आई ...


रोता तो दिल भी है
पर अश्क सिर्फ़ आँखों में...
शायद दिल की आग इसे जीने नहीं देती..

कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

युवापीढ़ी की भावनाओ को चंद अल्फ़ाज़ मे कह दिय वाह रवि जी क्या बात है

सच नहीं मिला
मुझको किताबों में...
ठीक कहते हो,
युवापीढ़ी बदतमीज है....

आपके ये अल्फ़ाज़ भी दिल पर छाप छोडते है

कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...ज़ भी दिल पर छाप छोडते है

dr minoo का कहना है कि -

ravikant ji...bahut khoob..
sawan ab belagam rota hai...waah..

anju का कहना है कि -

बहुत खूब रविकांत जी
वैसे तो आपकी पाँचों क्षणिकाएँ पसंद है किंतु मुझे तीसरी जादा पसंद आई
सुनती नहीं है
मजहबो-दीवार की बातें
इस बदचलन हवा के जरा कान तो पकड़ो

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

जो कुछ सुना,
सच दिखाई पड़ता है?
क्या आजतक तुम्हारे चश्मे का नंबर नहीं बदला??
-- पता नही क्यों यह नही जमा ? :(

कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...
-- बहुत सुंदर

अवनीश तिवारी

RAVI KANT का कहना है कि -

सीमा जी, राघव जी, रंजना जी,बरबाद साहब, मीनू जी, अंजू जी एवं अवनीश जी, आप सबका शुक्रिया।
अवनीश जी,
जो कुछ सुना,
सच दिखाई पड़ता है?
क्या आजतक तुम्हारे चश्मे का नंबर नहीं बदला??
-- पता नही क्यों यह नही जमा ? :(

यहाँ मैं कहना चाहता हुँ कि अगर कथ्य ही नही जम रहा तो क्षमाप्रार्थी हुँ और यदि कथ्य का भाव स्पष्ट नही हो रहा हो तो इसे ऐसे देखें-कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ भीड़ के साथ बहना जानते हैं। भीड़ की हाँ में हाँ मिलाते हैं,अपने विवेक का जरा भी उपयोग नही करते। समय बितते जाता है पर उनकी मान्यताएँ नही बदलतीं। इसी संदर्भ में ईशारा किया है।

mehek का कहना है कि -

रोता तो दिल भी है
पर अश्क सिर्फ़ आँखों में...
शायद दिल की आग इसे जीने नहीं देती...बहुत सुंदर

EKLAVYA का कहना है कि -

अच्छा लिखा है विशेषकर निम्नवत पंक्तियाँ
सुनती नहीं है
मजहबो-दीवार की बातें
इस बदचलन हवा के जरा कान तो पकड़ो...

सजीव सारथी का कहना है कि -

सच नहीं मिला
मुझको किताबों में...
ठीक कहते हो,
युवापीढ़ी बदतमीज है....
सुनती नहीं है
मजहबो-दीवार की बातें
इस बदचलन हवा के जरा कान तो पकड़ो...
रवि कान्त जी, बहुत अच्छे....करारे तेवर ...

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

रवि जी ,
भावार्थ के लिए धन्यवाद |

अवनीश तिवारी

शोभा का कहना है कि -

रवि जी
अच्छी क्षणिकाएँ लिखी हैं apne
कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...
badhayi

Alpana Verma का कहना है कि -

**कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...
--वाह! खूब !

*सुनती नहीं है
मजहबो-दीवार की बातें
इस बदचलन हवा के जरा कान तो पकड़ो...

*बहुत सही लिखा है!

tanha kavi का कहना है कि -

सच नहीं मिला
मुझको किताबों में...
ठीक कहते हो,
युवापीढ़ी बदतमीज है....

कभी जिद की थी उसने
सुनने को मेरी दास्ताँ
सावन अब बेलगाम रोता है...

रविकांत जी,
उपरोक्त क्षणिकाएँ मुझे विशेष पसंद आईं। बाकी भी खूबसूरत हैं।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

Gunjan का कहना है कि -

ro lene dijiye saawan ko ...pandeyji...barasne k baad hi aasma saaf nazar ata hai...

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